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‘हजार ग्राम, हजार धाम’ संदेश के साथ संपन्न हुई जौनसार-बावर एवं यमुनोत्री की पजल धाम यात्रा

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 21, 2026
in राज्य
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मुरार सिंह कंडारी


देहरादून/जौनसार-बावर। “हजार ग्राम, हजार धाम — हमारी भाषा, हमारी पहचान” के सांस्कृतिक संदेश के साथ पजल सम्राट जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’ के नेतृत्व में 7 से 11 मई 2026 तक जौनसार-बावर एवं यमुनोत्री क्षेत्र की 9वीं और 10वीं  पजल धाम यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न हुई।

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पांच दिवसीय इस विशेष सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक यात्रा में जगमोहन सिंह रावत ‘जगमोरा’, सुशील बुड़ाकोटी ‘शैलांचली’, डॉ. पृथ्वी सिंह केदारखंडी, सतीश रावत, पूनम तोमर तथा सुल्तान सिंह तोमर सहित कई साहित्यकार, लोकसंस्कृति प्रेमी और पजल साधक सहभागी रहे। यात्रा के सारथी के रूप में चंडी प्रसाद गौड़ निरंतर साथ रहे।

यह यात्रा केवल धार्मिक दर्शन तक सीमित नहीं रही, बल्कि जौनसार-बावर क्षेत्र की लोकभाषा, संस्कृति, परंपरा, इतिहास और लोकदेव आस्था को पजल गीतों एवं साहित्यिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण प्रयास बनी। यात्रा प्रारंभ होने से पहले ही जगमोरा द्वारा जौनसार-बावर क्षेत्र पर अनेक पजल गीत और शोधपरक रचनाएँ तैयार की गई थीं।

यात्रा का शुभारंभ कालसी स्थित काली माता मंदिर और सम्राट अशोक के ऐतिहासिक शिलालेख से हुआ। इसके बाद थैना, कचटा, नागथात, बिसोई, चौलीथात, सहिया, मलेथा, लखवाड़, लाखामंडल, बड़कोट, यमुनोत्री, लखस्यार और मसूरी स्थित संतुरा माता मंदिर सहित कुल 16 प्रमुख धामों में पूजा-अर्चना, पजल वाचन, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं साहित्यिक गोष्ठियां आयोजित की गईं।

कचटा में चालदा महासू देवता की बरांश यात्रा विशेष आकर्षण का केंद्र रही, जहां हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में महासू देवता की लोकपरंपराओं, जौनसार की सामाजिक संरचना और विभिन्न खतो की सांस्कृतिक एकता को पजल गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। यात्रा के दौरान महासू देवता की परंपरा, वीर सेड़कुड़िया, घंडुवा तथा जौनसार-बावर की न्याय व्यवस्था और लोकआस्था पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

चौलीथात में आजाद हिंद फौज के वीर स्वतंत्रता सेनानी केसरी चंद को श्रद्धांजलि अर्पित की गई, जबकि सहिया और मलेथा में वीर नंतराम नेगी की स्मृतियों को पजल गीतों और लोकगाथाओं के माध्यम से जीवंत किया गया। जगमोरा का लोकप्रिय पजल गीत “जौनसारौ गुलदार” यात्रा के दौरान विशेष आकर्षण बना रहा।

लखवाड़ स्थित विद्यालय में विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए। छात्र-छात्राओं ने हारुल नृत्य, कविता और लोकगीत प्रस्तुत किए। इस अवसर पर विद्यार्थियों को डायरी, पेन और शब्दकोश वितरित किए गए। कार्यक्रम में स्थानीय शिक्षकों और ग्रामीणों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई।

यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव लाखामंडल रहा, जहां पांडवकालीन लाक्षागृह और प्राचीन शिव मंदिर का दर्शन किया गया। इसके बाद यात्रा बड़कोट होते हुए यमुनोत्री धाम पहुंची। भारी भीड़ और कठिन चढ़ाई के बावजूद यात्रियों ने श्रद्धापूर्वक मां यमुना के दर्शन कर पूजा-अर्चना की।

लखस्यार में ग्रामीणों द्वारा पारंपरिक आतिथ्य, स्थानीय व्यंजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने यात्रियों को विशेष रूप से प्रभावित किया। यात्रा का समापन मसूरी स्थित संतुरा माता मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ हुआ।

पूरी यात्रा के दौरान यह संदेश प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया कि जौनसार-बावर की लोकभाषा, लोकसंस्कृति, सामुदायिक एकजुटता और अतिथि सत्कार की परंपरा आज भी जीवंत है। पजल धाम यात्रा ने क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊर्जा प्रदान करने का कार्य किया।

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