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भावाक्षर : संवेदनाओं और जीवन के यथार्थ की काव्यात्मक अभिव्यक्ति

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 20, 2026
in विशेष
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poetic expression
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डॉ. लोकेन्द्र सिंह


नई दिल्ली: साहित्य का मूल उद्देश्य मनुष्य की संवेदनाओं को शब्द देना है। जब एक संवेदनशील मन अपने परिवेश, राष्ट्र, समाज और निजी अनुभूतियों को शब्दों के धागे में पिरोता है, तो ‘भावाक्षर’ जैसा संग्रह जन्म लेता है। युवा कवि और संस्कृत के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. कपिल भार्गव का काव्य संग्रह ‘भावाक्षर’ महज कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि जीवन के विविध रंगों का एक कोलाज है। जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपने भावों को काव्य के रूप में प्रस्तुत करने का कौशल इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। कुल 77 कविताओं के इस गुलदस्ते में कवि ने सामाजिक सरोकारों से लेकर मानवीय पहलुओं, और राष्ट्रभक्ति से लेकर पर्यटन तक के विषयों को स्पर्श किया है।

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संस्कृत के विद्वान होने के नाते डॉ. कपिल की भाषा में सहज संयम और संस्कार दिखाई देता है। उन्होंने समाचारपत्र में प्रकाशित बुजुर्ग की तस्वीर पर कविता लिखी है तो प्रकृति पर हो रहे आघात पर अपनी पीड़ा को शब्द दिए हैं, यह उनके संवेदनशील कवि होने का प्रमाण है। ‘महानायक चार्ली चैपलिन’ और ‘विवाह की तृतीय वर्षगाँठ’ जैसी कविताएं बताती हैं कि कवि का मन छोटी-बड़ी हर घटना से प्रभावित होता है।

काव्य संग्रह ‘भावाक्षर’ में राष्ट्रभक्ति का स्वर बहुत मुखर है। ‘अपना भारत’ कविता में कवि शहीदों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए लिखता है-

“लिखा है शहीदों के लहू से, मौन बलिदान देकर,
नाम तेरा,
ओ मेरे भारत!
है असंख्यों का बहा शोणित,
तेरी अक्षुण्णता हेतु!”

ये पंक्तियाँ पाठक के मन में देशप्रेम का ज्वार उठाती हैं और उन अज्ञात बलिदानियों की याद दिलाती हैं, जिनकी नींव पर स्वतंत्र भारत खड़ा है। इसके अलावा भी उन्होंने अपनी अन्य कविताओं में अपने प्यारे देश के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।

आज के दौर में रोजगार के लिए घर छोड़ना युवाओं की नियति बन गया है। ‘मैं घर से दूर’ कविता में कवि डॉ. कपिल भार्गव ने इस पीड़ा को बहुत ही मार्मिक बिम्बों के माध्यम से उकेरा है। एक पक्षी (मोर) से मनुष्य की तुलना करते हुए कवि की यह वेदना दिल को छू जाती है- “सोचता हूँ, होता मोर, तो घर रहकर ही नाचता रहता।” यह महज कुछ पंक्तियाँ नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं का अनकहा दर्द है जो ‘दाने’ (आजीविका) के लिए अपने ‘घोंसले’ से दूर हैं।

कवि डॉ. कपिल भार्गव केवल भावुक ही नहीं, बल्कि एक दार्शनिक की भांति शब्दों की सत्ता पर भी विचार करता है। ‘शब्दजाल’ कविता में वे लिखते हैं –

“शब्दों के इस जाल में मानव उलझ गया,
जब तक समझा शब्दों को,
भावों में जीवन बीत गया।
शब्द बड़े ही सुन्दर ढंग से बोले जाते हैं,
कभी शब्द आनंदित करते कभी घाव कर जाते हैं।”

डॉ. कपिल भार्गव की यह सहज अभिव्यक्ति हमें अपनी वाणी के प्रति सचेत करती है। उन्होंने संदेश दिया है कि हमें शब्दों को तोल-मोल कर बोलना चाहिए। कहते भी हैं कि चाकू-छुरी के घाव भर जाते हैं लेकिन शब्दों से हुए घाव लंबे समय तक हरे रहते हैं।

हिन्दी साहित्य में यात्रा-वृत्तांत प्रायः गद्य में लिखे जाते हैं, लेकिन डॉ. कपिल ने ‘तमिलनाडु दर्शन’ और ‘वेंकटेश्वर धाम’ जैसी कविताओं के माध्यम से पद्य में यात्रा-वृत्तांत लिखकर एक नया प्रयोग किया है। साथ ही, अपने गृह नगर दतिया और ‘हे नर्मदा’ जैसी कविताओं में जड़ों से जुड़ाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। अपने प्यारे शहर दतिया को याद करते हुए कवि लिखता है-

“जब भी कोई बात करेगा दतिया की पावन माटी की,
सबसे पहले बात करेगा वह शक्ति के संन्यासी की।”

अपनी कविताओं के संदर्भ में कवि डॉ. कपिल भार्गव ने लिखा है कि “कविता वास्तविक रूप से भावनाओं की गहरी अभिव्यक्ति है”। उनका यह कथन इस संग्रह के पन्ने-पन्ने पर चरितार्थ होता है। हमारा अवचेतन मन, हृदय और चित्त, अपने परिवेश में जो भी अच्छा, बुरा, सुंदरतम, नैसर्गिक आदि आनन्द का अनुभव करता है उसे ही वह प्रेम, करुणा, दया भाव से या फिर आक्रोश, क्रोध, रौद्र आदि भावों के साथ व्यक्त करता है। सरल भाषा में यही कविता है, यही काव्य है, यही गाथा है।

डॉ. कपिल भार्गव ने अपने काव्य संग्रह का विन्यास बहुत सोच-समझकर किया गया है। पहली कविता ‘नारी’ शक्ति और सृजन का प्रतीक है, तो अंतिम कविता ‘पथिक’ जीवन की निरंतरता का संदेश देती है। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित यह कृति हिन्दी काव्य जगत में एक सार्थक हस्तक्षेप है। डॉ. कपिल भार्गव की लेखनी में सरलता है, जो पाठक से सीधा संवाद करती है। यह पुस्तक उन सभी के लिए पठनीय है जो कविताओं में जीवन का प्रतिबिंब देखना चाहते हैं।

poetic expression

  • पुस्तक : भावाक्षर
  • कवि: डॉ. कपिल भार्गव
  • प्रकाशक: ब्लू रोज वन (साहित्य अकादमी म.प्र. के सहयोग से)
  • पृष्ठ: 90
  • मूल्य: 200 रुपये

समीक्षक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

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