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Home राज्य

चमोली: विकास के दावों के बीच दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था, थराली विधानसभा बना सरकारी उदासीनता की मिसाल!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 30, 2026
in राज्य, विशेष
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जिला चिकित्सालय
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प्रकाश मेहरा
उत्तराखंड डेस्क


चमोली (उत्तराखंड)। उत्तराखंड सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के बड़े-बड़े दावे करती नहीं थकती, लेकिन हकीकत आज भी पहाड़ों में वही है—बीमार को अस्पताल नहीं, अस्पताल तक पहुंचने के लिए पहले किस्मत चाहिए। चमोली जिले की थराली विधानसभा इसका सबसे जीवंत उदाहरण बन चुकी है, जहाँ दशकों में सरकारें बदलीं, मंत्री आए-गए, घोषणाएं हुईं, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत आज भी बद से बदतर बनी हुई है।

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इलाज के लिए 35–40 किलोमीटर की मजबूरी

थराली विधानसभा क्षेत्र के कई गांवों में आज भी बेहतर अस्पताल की सुविधा उपलब्ध नहीं है। गंभीर बीमारी या आपात स्थिति में मरीजों को लगभग 35 से 40 किलोमीटर दूर अस्पताल ले जाना पड़ता है। इस दौरान रास्ते, मौसम और साधनों की स्थिति मरीज की हालत से ज्यादा खतरनाक साबित होती है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यहाँ इलाज नहीं, संघर्ष शुरू होता है—और कई बार यह संघर्ष जानलेवा साबित हो चुका है।

सवाड़ गांव..घोषणाओं का तीर्थ, विकास कागजों तक सीमित

इसी विधानसभा क्षेत्र के सवाड़ गांव में हर वर्ष केंद्र से लेकर राज्य और क्षेत्रीय स्तर के मंत्रियों का आगमन होता है। मंच सजते हैं, माइक लगते हैं और घोषणाओं की बारिश होती है।

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि विकास सिर्फ फाइलों और भाषणों तक सीमित है। चाहे शिक्षा हो या स्वास्थ्य—समस्याएं आज भी जस की तस हैं।

देवाल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र…नाम का अस्पताल

सवाड़ गांव से लगभग 15 किलोमीटर दूर देवाल में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र क्षेत्र की सेहत की जिम्मेदारी उठाए हुए है—कम से कम कागजों में।

हकीकत यह है कि “डॉक्टर सीमित समय के लिए ही उपलब्ध रहते हैं। दवाइयाँ समय पर नहीं मिलतीं। एम्बुलेंसों की हालत ऐसी है कि उन पर घास जम गई है

यानी अस्पताल है, डॉक्टर हैं, एम्बुलेंस है— बस चलती व्यवस्था नहीं है। वाकई, गजब का सिस्टम है!

पर्यटन विकास का सच…पालकी में मरीज, पैदल पर्यटक

सरकार जिस पर्यटन विकास की बात करती है, उसकी असल तस्वीर देवाल ब्लॉक के ग्वीला क्षेत्र में देखी जा सकती है। यहाँ आज भी लोग पैदल चलने को मजबूर हैं। यदि किसी को स्वास्थ्य समस्या हो जाए तो मरीज को लगभग 15 किलोमीटर दूर तक पालकी में बिठाकर ले जाना पड़ता है। इसे विकास कहें या व्यवस्था का मज़ाक—यह सवाल खुद-ब-खुद खड़ा होता है।

“सवाल पूछो तो जवाब…“जरा इंसानियत दिखाइए”*

जब जिम्मेदार अधिकारियों से इन हालातों पर सवाल किए जाते हैं, तो जवाब व्यवस्था सुधारने का नहीं, बल्कि भावनात्मक भाषणों का मिलता है— “जरा इंसानियत तो दिखाइए।”

मानो सवाल पूछना गुनाह हो और जवाब देना वैकल्पिक।

RTI के खुलासे…विकास के नाम पर काले पन्ने

हाल ही में दाखिल एक RTI में भी कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। स्वास्थ्य सुविधाओं और विकास से जुड़े सवालों के जवाब में काले पन्ने, अधूरी जानकारी और टालमटोल देखने को मिली। विकास के नाम पर पारदर्शिता की जगह अंधेरा परोसा गया।

सरकारी सिस्टम पर सवाल

इन हालातों में सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या पहाड़ के लोगों की जान की कीमत घोषणाओं से कम है ? क्या विकास सिर्फ चुनावी भाषणों और फाइलों तक सीमित रहेगा? और क्या “इंसानियत” की दुहाई देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच सकती है ?

थराली विधानसभा आज सिर्फ एक क्षेत्र नहीं, बल्कि उत्तराखंड की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना बन चुकी है—जहाँ विकास दिखता नहीं, लेकिन उसकी कमी हर रोज किसी न किसी की जिंदगी पर भारी पड़ती है।

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