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Home विश्व

H-1B वीजा पर जारी है बवाल, कितना अहम है सैलरी का सवाल?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 4, 2025
in विश्व
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H-1B
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नई दिल्ल्ली: H-1B वीजा को लेकर अमेरिका में जहां एक खेमा प्रवासियों, खासतौर से भारत से गए लोगों के खिलाफ जहर उगल रहा है, वहीं अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर इस वीजा सिस्टम का समर्थन किया है। पिछले राष्ट्रपति कार्यकाल में H-1B वीजा पर बंदिशें लगाने वाले ट्रंप ने हाल में इस सिस्टम को उपयोगी बताया था। माना जा रहा है कि चुनाव में पैसे से बड़ा सपोर्ट देने वाले टेस्ला के मालिक एलन मस्क के वीजा समर्थक रुख को देखते हुए ट्रंप ने अपना नजरिया बदला।

इस बदलाव के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने न्यू ईयर सेलिब्रेशन से पहले कहा, ‘मैंने अपना रुख नहीं बदला। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि हमारे देश में सबसे सक्षम लोग होने चाहिए। हमारे देश में स्मार्ट लोगों का आना जरूरी है। ऐसे ढेरों लोगों की जरूरत है। यहां ऐसी जॉब्स के मौके बनेंगे, जो पहले कभी नहीं थे।’

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ट्रंप भले ही जॉब्स के ढेरों अवसरों की बात कर रहे हों, लेकिन उनकी रिपब्लिकन पार्टी का ही एक खेमा H-1B वीजा के चलते अमेरिकी लोगों के लिए जॉब के मौके घटने और उनके वेतन पर आंच आने की दलीलें दे रहा है। उनका कहना है कि कंपनियां H-1B वीजा के जरिए कम वेतन पर लोगों को लाती हैं।

वेतन का क्या हाल है?

अमेरिकी कानून के मुताबिक, किसी इलाके में किसी खास काम के लिए अमेरिकी लोगों को जो औसत वेतन मिल रहा हो, उससे कम वेतन पर उसी काम के लिए H-1B वीजाधारक को वहां नहीं नियुक्त किया जा सकता। मोटे तौर पर 60000 डॉलर सालाना से कम नहीं दिया जा सकता। हालांकि न्यूयॉर्क जैसे इलाकों में मिनिमम सैलरी इससे ज्यादा होने पर कंपनियां H-1B वीजा वालों को ज्यादा पेमेंट करती हैं। साल 2023 में कंप्यूटर से जुड़े कार्यों में H-1B वीजा वालों का औसत सालाना वेतन 1,32,000 डॉलर था और मीडियन वेज 1,22,000 डॉलर था। यानी ऐसे आधे वीजाधारक 1,22,000 डॉलर से अधिक सैलरी पर थे।

चार्जेज क्या हैं?

इस वीजा सिस्टम के समर्थक एलन मस्क ने पिछले दिनों यह भी कहा था कि इस सिस्टम में गड़बड़ियां हैं, जिन्हें वीजाधारकों के लिए मिनिमम सैलरी बढ़ाकर और वीजा की एनुअल मेंटेनेंस कॉस्ट बढ़ाकर ठीक किया जा सकता है क्योंकि तब विदेश से हायरिंग महंगी हो जाएगी। फिलहाल कंपनियों को नए H-1B वीजा या पहले के वीजा के एक्सटेंशन से जुड़े आवेदन में करीब 35 हजार डॉलर की फीस देनी होती है। अगर वे एंप्लॉयी के परमानेंट रेजिडेंस के लिए आवेदन देती हैं तो यह लागत 50 हजार डॉलर से अधिक हो जाती है।

कॉस्ट बढ़ाने से कैसा असर होगा?

अमेरिकी नियमों के मुताबिक, जारी होने वाले कुल वीजा में किसी भी कंपनी को 2.7% से अधिक वीजा नहीं दिया जा सकता। वित्त वर्ष 2024 में कुल वीजा में अमेजन का हिस्सा सबसे अधिक 2.7% था। उसके बाद कॉग्निजेंट 2%, इंफोसिस 1.8%, TCS 1%, IBM 1%, HCL टेक और माइक्रोसॉफ्ट 0.9% और गूगल 0.7 का नंबर रहा। नए जारी वीजा में भारतीय कंपनियों को केवल 7299 वीजा मिले थे। पिछले एक दशक में कॉस्ट 2000% तक बढ़ने के साथ भारतीय कंपनियों ने इस वीजा का उपयोग 55% तक घटा दिया है।

विदेश जाने वाले छात्रों को गाइड करने वाले करियर काउंसलर मोहन तिवारी ने कहा, ‘मिनिमम सैलरी बढ़ाने से अमेरिका जाने वाले स्किल्ड लोगों को फायदा ही होगा लेकिन यह भी हो सकता है कि अमेरिकी कंपनियां अमेरिका में बुलाकर काम कराने के बजाय भारत सहित दूसरे देशों में ऑफशोरिंग बढ़ा दें।’

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