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Home दिल्ली

NGT के इस फैसले को दिल्ली सरकार ने SC में दी चुनौती!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 25, 2023
in दिल्ली
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NGT
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दिल्ली : दिल्ली सरकार ने उपराज्यपाल को यमुना पर बनी उच्च-स्तरीय समिति का बतौर अध्यक्ष नियुक्त करने के NGT के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. याचिका दायर कर दिल्ली सरकार ने कोर्ट से NGT के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए कहा है कि यह आदेश दिल्ली में शासन की संवैधानिक व्यवस्था के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के 2018 और 2023 के आदेशों का भी उल्लंघन करता है.

दरअसल, 9 जनवरी 2023 को NGT ने एक आदेश जारी कर यमुना नदी में प्रदूषण की समस्या को हल करने के लिए दिल्ली में अलग-अलग अथॉरिटीज वाली हाई लेवल कमेटी का गठन किया था और LG को उस कमेटी का अध्यक्ष बनाया था जबकि दिल्ली सरकार का दावा है कि LG दिल्ली के मात्र औपचारिक प्रमुख भर हैं.

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कमेटी में कौन-कौन शामिल?

इस कमेटी में दिल्ली के मुख्य सचिव, सरकार के सिंचाई, वन और पर्यावरण, कृषि और वित्त विभागों के सचिव, जल बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, केंद्रीय कृषि मंत्रालय, वन महानिदेशक या पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से उनके नॉमिनी, जल शक्ति मंत्रालय या MoEF और CC के एक प्रतिनिधि, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष और दिल्ली सरकार के एक प्रतिनिधि शामिल हैं.

एलजी को दी गई कार्यकारी शक्तियों पर आपत्ति

याचिका में कहा गया है कि दिल्ली सरकार यमुना के प्रदूषण को दूर करने और उपचारात्मक उपायों को लागू करने के लिए अंतर-विभागीय समन्वय की आवश्यकता को स्वीकार करती है, लेकिन NGT के आदेश के जरिए एलजी को दी गई कार्यकारी शक्तियों पर कड़ी आपत्ति जताती है. एलजी को दी गई शक्तियां विशेष रूप से दिल्ली की चुनी हुई सरकार के अधिकार क्षेत्रों पर अतिक्रमण करती हैं.

निर्वाचित सरकार को किया दरकिनार

दिल्ली सरकार ने याचिका में तर्क दिया कि दिल्ली में प्रशासनिक ढांचे और संविधान के अनुच्छेद 239एए के प्रावधानों के मुताबिक भूमि, सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस से संबंधित मामलों को छोड़कर एलजी नाममात्र के प्रमुख के रूप में कार्य करते हैं और वे संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हैं. दिल्ली सरकार ने एक समन्वित दृष्टिकोण के महत्व देते हुए इस बात पर जोर दिया है कि NGT के आदेश में इस्तेमाल की गई भाषा निर्वाचित सरकार को दरकिनार करती है. दलील दी गई है कि एक ऐसे प्राधिकरण को कार्यकारी शक्तियां प्रदान की गई हैं, जिनके पास उन शक्तियों को रखने का संवैधानिक अधिकार का अभाव है और यह चुनी हुई सरकार के अधिकार क्षेत्र को भी कमजोर करता है.

मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह

दिल्ली सरकार की याचिका में यह दलील दी गई है कि एक ऐसा प्रशासनिक व्यक्ति जिसके पास संवैधानिक जनादेश नहीं है. उसे कार्यकारी शक्तियां देना, असल में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के अधिकार क्षेत्र को कमजोर करता है. संविधान के अनुच्छेद 239AA के मुताबिक LG पूरी तरह से मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के आधार पर कार्य करने के लिए बाध्य है. यह संवैधानिक सिद्धांत पिछले 50 वर्षों से रहा है कि राज्य के एक नामांकित और अनिर्वाचित प्रमुख में पास मौजूद शक्तियों का प्रयोग केवल मंत्रिपरिषद की “सहायता और सलाह” के तहत ही किया जाना चाहिए.

LG दिल्ली के मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य

दिल्ली सरकार ने इस बात पर भी जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने राज्य (NCT ऑफ दिल्ली) बनाम भारत संघ (2018) 8 SCC 501 के मामले में अपने फैसले में साफ किया था कि दिल्ली की चुनी हुई सरकार के पास भूमि, पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था को छोड़कर राज्य और समवर्ती सूची में शामिल सभी विषयों पर कार्यकारी शक्तियों का विशेष अधिकार है. 4 जुलाई, 2018 को जारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पैरा 284.17 में कहा गया है कि अनुच्छेद 239-एए (4) में लिखे हुए “सहायता और सलाह” का अर्थ यह माना जाना चाहिए कि NCT के LG दिल्ली के मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से बाध्य हैं.

स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति

यह स्थिति तब तक के लिए सही है, जब तक LG अनुच्छेद 239-एए के खंड (4) के प्रावधान के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं करते हैं. उपराज्यपाल को किसी भी विषय पर स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति नहीं सौंपी गई है. उन्हें या तो मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना होता है या वह उनके द्वारा राष्ट्रपति को दिए जा रहे संदर्भ पर लिए गए निर्णय को लागू करने के लिए बाध्य हैं.

लोकतांत्रिक रूप में निर्णय लेने का अधिकार

इसी फैसले के 475.20 में कहा गया है कि सरकार के कैबिनेट रूप में निर्णय लेने की मूल शक्ति मंत्रिपरिषद के पास है, जिसके मुखिया मुख्यमंत्री होते हैं. अनुच्छेद 239-एए (4) के मूल 38 भाग में दिया गया सहायता और सलाह का प्रावधान इस सिद्धांत को मान्यता देता है. जब एलजी मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के आधार पर कार्य करता है, तो यह मानता है कि सरकार के लोकतांत्रिक रूप में वास्तविक निर्णय लेने का अधिकार कार्यपालिका में निहित है. यहां तक कि जब एलजी प्रावधान के तहत जब राष्ट्रपति को संदर्भ देते हैं, तब भी राष्ट्रपति द्वारा लिए गए निर्णय का पालन करना होता है, एलजी के पास निर्णय लेने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है.

इसके अलावा, पांच जजों की संविधान पीठ ने 2017 की सिविल अपील 2357 (सेवा निर्णय) में 11 मई 2023 के अपने आदेश में इस स्थिति को बरकरार रखा है. इसके आलोक में अनुच्छेद 239एए और 2018 के सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले में दोहराया गया है कि LG दिल्ली के विधायी दायरे में आने वाले मामलों में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से काम करने के लिए बाध्य हैं.

निर्वाचित सरकार की भूमिका जरूरी

अपनी अपील में दिल्ली सरकार ने तर्क दिया है कि NGT के प्रस्तावित उपचारात्मक उपाय जैसे कि कृषि, बागवानी या औद्योगिक उद्देश्यों के लिए उपचारित जल का, इस्तेमाल करना, अपशिष्ट निर्वहन और डंपिंग को रोकना, बाढ़ के मैदान क्षेत्रों की रक्षा करना, ड्रेजिंग प्रवाह को बनाए रखना, वृक्षारोपण करना और नालियों की डीसिल्टिंग करने के लिए बजट आवंटन की जरूरत होती है, जिसे विधानसभा द्वारा अनुमोदित किया जाता है. इसलिए इन उपायों की देखरेख में निर्वाचित सरकार की भूमिका जरूरी है.

यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध

साथ ही कहा गया है कि चुनी हुई सरकार यमुना को प्रदूषण मुक्त कर स्वच्छ नदी बनाने और उसके लिए जरूरी धन आवंटित करने के लिए प्रतिबद्ध है. जबकि NGT के आदेश में उल्लिखित वर्तमान योजना दिल्ली की निर्वाचित और जवाबदेह सरकार को दरकिनार करते हुए एक अनिर्वाचित व्यक्ति के नेतृत्व में कमेटी गठित करता है. हालांकि इसके समन्वय के लिए एक अंतर- एजेंसी कमेटी की जरूरत है. इसलिए इसकी देखरेख चुनी हुई सरकार के प्रमुख यानी मुख्यमंत्री द्वारा की जानी चाहिए. आखिर में दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 2023 के मूल आवेदन संख्या 21 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की मुख्य बेंच द्वारा 9 मई 2023 के पारित अंतिम आदेश को रद्द करने की मांग की है.

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