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Home धर्म

भूलकर भी ना करें ये काम, हमेशा के लिए नाराज हो जाएंगी मां सरस्वती

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 5, 2022
in धर्म
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Basant Panchami
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नई दिल्ली l हर साल माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है. इस दिन मां सरस्वती की पूजा और अर्चना की जाती है. मां सरस्वती को विद्या की देवी माना गया है. माना जाता है कि इस दिन मां सरस्वती के मंत्र, आरती और वंदना का पाठ करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. विद्यार्थियों के लिए बसंत पंचमी का दिन काफी अच्छा माना जाता है. इस दिन कुछ बातों का खास ख्याल रखना होता है. ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि बसंत पंचमी के दिन कौन से कार्य नहीं करने चाहिए. इन कार्यों को करने से मां सरस्वती आपसे नाराज हो सकती हैं. आइए जानते हैं इन कार्यों के बारे में-

बसंत पंचमी के दिन ना करें ये काम

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– इस दिन काले और लाल रंग के वस्त्र बिल्कुल ना धारण करें. बसंत पंचमी के दिन पीले, सफेद या धानी रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए.

– यह प्रकृति का त्योहार है और हरियाली का उत्सव. अत: इस दिन फसल काटने के काम को टाल देना चाहिए. साथ ही घर में भी किसी भी पेड़ की छंटाई भी नहीं करनी चाहिए

– इस दिन किसी को भी अपशब्द नहीं बोलने चाहिए. कहा जाता है कि इस दिन सरस्वती जुबान पर होती हैं. इसलिए अपनी वाणी पर संयम रखें और गुस्सा ना करें. किसी को बुरे बोल ना बोलें.

– इस दिन पितृ तर्पण भी किया जाता है इसलिए घर में भूलकर भी कलह नहीं करनी चाहिए. इससे पितरों को कष्ट होता है.

– इस दिन बिना स्नान किए भोजन नहीं खाना चाहिए. पहले सरस्वती वंदना करें और मां सरस्वती को भोग लगाएं.

– बसंत पंचमी के दिन मांसाहार और शराब का सेवन नहीं करें. केवल सात्विक भोजन का सेवन करें.

– सरस्वती पूजा के दिन व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए.

इस तरह करें बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा

सरस्वती पूजा करते समय सबसे पहले सरस्वती माता की प्रतिमा अथवा तस्वीर को सामने रखना चाहिए. इसके बाद कलश स्थापित करके गणेश जी तथा नवग्रह की विधिवत् पूजा करनी चाहिए. इसके बाद माता सरस्वती की पूजा करें. सरस्वती माता की पूजा करते समय उन्हें सबसे पहले आचमन और स्नान कराएं. इसके बाद माता को फूल, माला चढ़ाएं. सरस्वती माता को सिन्दूर, अन्य श्रृंगार की वस्तुएं भी अर्पित करनी चाहिए. वसंत पंचमी के दिन सरस्वती माता के चरणों पर गुलाल भी अर्पित किया जाता है. देवी सरस्वती श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, इसलिए उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाएं. सरस्वती पूजन के अवसर पर माता सरस्वती को पीले रंग का फल चढ़ाएं. प्रसाद के रूप में मौसमी फलों के अलावा बूंदियां अर्पित करनी चाहिए. इस दिन सरस्वती माता को मालपुए और खीर का भी भोग लगाया जाता है. माघ शुक्ल पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा के बाद षष्ठी तिथि को सुबह माता सरस्वती की पूजा करने के बाद उनका विसर्जन कर देना चाहिए. संध्या काल में मूर्ति को प्रणाम करके जल में प्रवाहित कर देना चाहिए.

सरस्वती पूजा करने बाद सरस्वती माता के नाम से हवन करना चाहिए. हवन के लिए हवन कुण्ड अथवा भूमि पर सवा हाथ चारों तरफ नापकर एक निशान बना लेना चाहिए. अब इस भूमि को कुशा से साफ करके गंगा जल छिड़ककर पवित्र करें और यहां पर हवन करें. हवन करते समय गणेश जी, नवग्रह के नाम से हवन करें. इसके बाद सरस्वती माता के नाम से ‘ओम श्री सरस्वत्यै नम: स्वहा” इस मंत्र से एक सौ आठ बार हवन करना चाहिए. हवन के बाद सरस्वती माता की आरती करें और हवन का भभूत लगाएं.

वसंत पंचमी सरस्वती वंदना

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना.

या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता,

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं,

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌.

हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌,

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

सरस्वती पूजन के पीछे पौराणिक मान्यताएं:

इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करने के पीछे भी पौराणिक कथा है. इनकी सबसे पहले पूजा श्रीकृष्ण और ब्रह्माजी ने ही की है. देवी सरस्वती ने जब श्रीकृष्ण को देखा, तो उनके रूप पर मोहित हो गईं और पति के रूप में पाने की इच्छा करने लगीं. भगवान कृष्ण को इस बात का पता चलने पर उन्होंने कहा कि वे तो राधा के प्रति समर्पित हैं. परंतु सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि प्रत्येक विद्या की इच्छा रखने वाला माघ मास की शुक्ल पंचमी को तुम्हारा पूजन करेगा. यह वरदान देने के बाद स्वयं श्रीकृष्ण ने पहले देवी की पूजा की.

ब्रह्माजी ने की सरस्वती की रचना-
सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्माजी ने जब धरती को मूक और नीरस देखा तो अपने कमंडल से जल लेकर छिड़क दिया. इससे सारी धरा हरियाली से भर गई, पर साथ ही देवी सरस्वती का उद्भव हुआ, जिसे ब्रह्माजी ने आदेश दिया कि वीणा और पुस्तक से इस सृष्टि को आलोकित करें. तभी से देवी सरस्वती के वीणा से झंकृत संगीत में प्रकृति विहंगम नृत्य करने लगती है.

कुंभकर्ण की निद्रा का कारण बनीं सरस्वती-

कहते हैं देवी वर प्राप्त करने के लिए कुंभकर्ण ने दस हजार वर्षों तक गोवर्ण में घोर तपस्या की. जब ब्रह्मा वर देने को तैयार हुए, तो देवों ने निवेदन किया कि आप इसको वर तो दे रहे हैं, लेकिन यह आसुरी प्रवृत्ति का है और अपने ज्ञान और शक्ति का कभी भी दुरुपयोग कर सकता है. तब ब्रह्मा ने सरस्वती का स्मरण किया. सरस्वती राक्षस की जीभ पर सवार हुईं. सरस्वती के प्रभाव से कुंभकर्ण ने ब्रह्मा से कहा- ‘मैं कई वर्षों तक सोता रहूं, यही मेरी इच्छा है.’ इस तरह त्रेता युग में कुंभकर्ण सोता ही रहा और जब जागा तो भगवान श्रीराम उसकी मुक्ति का कारण बने.

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