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बिहार में मतदाता सूची संशोधन… बाढ़ में बहे कागजात, बीएलओ पर दबाव और नाम कटने का डर; क्या है पूरा विवाद?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 17, 2025
in राज्य
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स्पेशल डेस्क/पटना : बिहार में मतदाता सूची संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर चल रहा अभियान कई विवादों और चुनौतियों के बीच सुर्खियों में है। यह प्रक्रिया, जो विधानसभा चुनाव 2025 से पहले शुरू की गई है, मतदाता सूची को शुद्ध करने और अवैध या डुप्लिकेट प्रविष्टियों को हटाने के उद्देश्य से चल रही है। हालांकि, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में कागजातों का अभाव, बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) पर दबाव और लोगों के बीच अपने नाम कटने का डर इस प्रक्रिया को जटिल बना रहा है। आइए इस मुद्दे का विस्तृत विश्लेषण एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से समझते हैं।

बाढ़ में बहे कागजात… एक बड़ी चुनौती

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बिहार देश का सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य है, जहां इसके भूगोल का 73% हिस्सा बाढ़ की चपेट में रहता है। बाढ़ के कारण हर साल लोगों के महत्वपूर्ण दस्तावेज, जैसे जन्म प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, और अन्य पहचान पत्र, नष्ट हो जाते हैं। यह स्थिति विशेष रूप से सीमांचल और अन्य बाढ़-प्रभावित क्षेत्रों में गंभीर है, जहां लोग आर्थिक रूप से कमजोर और अशिक्षित हैं।

प्रियंका नाम की एक महिला ने प्रकाश मेहरा को बताया, “सारा कागज़ तो पिछली बाढ़ में बह गया। सरकार अब कौन सा कागज़ खोजती है? अभी पानी आ गया है और हम जान-माल, बाल-बच्चा छोड़कर कागज़ का इंतजाम करें?”

दस्तावेजों की कमी

सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में केवल 71.6% लोगों ने जन्म के 21 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन करवाया है, जिसका मतलब है कि कई लोगों के पास जन्म प्रमाण पत्र जैसे बुनियादी दस्तावेज नहीं हैं।

चुनाव आयोग ने 11 दस्तावेजों की सूची जारी की है, जिनमें से एक को जमा करना अनिवार्य है। 1 जुलाई 1987 के बाद जन्मे लोगों को अपने और अपने माता-पिता के जन्म प्रमाण पत्र या निवास प्रमाण पत्र जमा करने हैं। आधार, पैन या मौजूदा वोटर आईडी स्वीकार्य नहीं हैं, जिससे फॉर्म अधूरे रह जाते हैं।

बीएलओ पर दबाव तकनीकी और चुनौतियां

बिहार में 77,895 बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) और 20,603 अतिरिक्त बीएलओ इस अभियान में लगे हैं, जिन्हें 25 जुलाई 2025 तक सभी फॉर्म और दस्तावेज अपलोड करने हैं। हालांकि, बीएलओ कई समस्याओं का सामना कर रहे हैं:

धीमे इंटरनेट और ईसीआईनेट मोबाइल ऐप की तकनीकी खामियां बीएलओ के लिए रोजमर्रा की चुनौती हैं। कुछ क्षेत्रों में नेटवर्क के लिए “पहाड़ चढ़ने” की सलाह दी जाती है। बीएलओ सुबह से गांव-गांव जाकर फॉर्म बांटते हैं और देर रात तक उन्हें अपलोड करते हैं। एक बीएलओ ने बताया कि 1,200 मतदाताओं वाले बूथ में वे अब तक केवल 50 फॉर्म अपलोड कर पाए हैं।

बार-बार बदलते नियमों ने बीएलओ को असमंजस में डाल दिया है। पहले 2003 की सूची में नाम होने वालों को दस्तावेजों से छूट थी, फिर इसे बदला गया, और फिर 24 जून 2025 के निर्देशों को मान्य बताया गया। कुछ बीएलओ ने बताया कि “बिना दस्तावेजों के फॉर्म अपलोड करने का दबाव बनाया जा रहा है, जिससे प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।”

नाम कटने का डर, विपक्ष और जनता की चिंता

विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस प्रक्रिया को “अलोकतांत्रिक” और “साजिश” करार दिया है, जिसमें गरीब, दलित, मुस्लिम, और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के वोटरों के नाम कटने का खतरा बताया जा रहा है।

विपक्षी गठबंधन (इंडिया) ने दावा किया है कि “यह प्रक्रिया सत्तारूढ़ सरकार को लाभ पहुंचाने की साजिश है।” तेजस्वी यादव, राहुल गांधी, और असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं ने इसे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को बैकडोर से लागू करने की कोशिश बताया।

आंकड़ों का खतरा

एक X पोस्ट के अनुसार, अब तक 35.6 लाख नाम अयोग्य पाए गए हैं, जिनमें अवैध मतदाता, डुप्लिकेट, और मृत व्यक्तियों के नाम शामिल हैं। विपक्ष का दावा है कि “इससे 2 करोड़ वोटरों के नाम कट सकते हैं।”

भारत जोड़ो अभियान की कामायनी स्वामी ने कहा कि “63% लोगों के पास मांगे गए दस्तावेज नहीं हैं, जिसका सबसे अधिक असर दलित, वंचित, महिलाओं, प्रवासी मजदूरों, और ट्रांसजेंडर समुदायों पर पड़ेगा।” आयोग का कहना है कि “यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत जरूरी है ताकि केवल योग्य भारतीय नागरिक ही मतदान करें। उनका दावा है कि 80% से अधिक मतदाताओं ने फॉर्म जमा कर दिए हैं, और अंतिम सूची 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित होगी।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में 10 जुलाई को सुनवाई हुई, जहां याचिकाकर्ताओं ने प्रक्रिया की वैधता और व्यावहारिकता पर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “वोटर लिस्ट संशोधन संवैधानिक प्रक्रिया है और इसे रोका नहीं जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने इसकी टाइमिंग पर सवाल उठाए और पूछा कि इसे चुनाव से पहले क्यों शुरू किया गया।

कोर्ट ने पूछा कि “आधार को स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची से क्यों हटाया गया, जबकि यह अन्य दस्तावेजों का आधार है। आयोग ने जवाब दिया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है।”

वकील कपिल सिब्बल और गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि “यह प्रक्रिया भेदभावपूर्ण है और कई मतदाताओं को वोटिंग के अधिकार से वंचित कर सकती है।”

अशिक्षिता और जागरूकता की कमी

बिहार में अशिक्षित आबादी की बड़ी संख्या के कारण लोग दस्तावेजों की आवश्यकता और प्रक्रिया को समझने में असमर्थ हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि “बिहार जैसे राज्य, जहां पलायन और गरीबी आम है, वहां ऐसी जटिल प्रक्रिया लागू करना अव्यवहारिक है।

क्या है प्रक्रिया का वर्तमान स्थिति ?

अंतिम तिथि 25 जुलाई तक बीएलओ को फॉर्म और दस्तावेज अपलोड करने हैं। अब तक 88% मतदाताओं का सत्यापन हो चुका है, और 35.6 लाख नाम हटाए जाने की संभावना है। 2.5 लाख वॉलेंटियर्स और 1.5 लाख बूथ स्तरीय एजेंट प्रक्रिया में सहायता कर रहे हैं।

बिहार में वोटर लिस्ट संशोधन अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, लेकिन बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में दस्तावेजों की कमी, बीएलओ पर दबाव, और अस्पष्ट नियमों ने इसे विवादास्पद बना दिया है। विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इससे हाशिए पर रहने वाले समुदायों के मताधिकार पर खतरा है, जबकि चुनाव आयोग इसे संवैधानिक मानता है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दी है, लेकिन इसकी टाइमिंग और व्यावहारिकता पर सवाल बरकरार हैं।

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