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Home राज्य

राजनीतिक दल कैसे तैयार करते हैं जनता को लुभाने वाला घोषणा पत्र?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 7, 2024
in राज्य, राष्ट्रीय
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neta cartun
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नई दिल्ली: देश में लोकसभा चुनाव नजदीक हैं और राजनीतिक दल अपनी-अपनी तैयारियों में जुटे हैं. इस बीच, कांग्रेस ने एक खास बैठक की. उद्देश्य था लोकसभा चुनाव के लिए मेनिफेस्टो यानी घोषणा पत्र का मसौदा तैयार करना. इसका जिम्मा संभालने वाली कांग्रेस की समिति ने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करने के लिए अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा की. साथ ही यह भी दावा किया कि कांग्रेस का मेनिफेस्टो जनता तैयार करेगी.

अब सवाल उठता है कि आखिर यह मेनिफेस्टो होता क्या है? इसे तैयार करने के मानक क्या हैं? क्या नियम-कानून बनाए गए हैं? आइए जानते हैं.

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मेनिफ़ेस्टो यानी घोषणा पत्र यानी वादों का पिटारा

मेनिफेस्टो यानी घोषणा पत्र, यह नाम किसी भी चुनाव से पहले चर्चा में आ जाता है. यह वह दस्तावेज होता है जो चुनाव लड़ने वाले सभी राजनीतिक दल जारी करते हैं. इसमें वे जनता के सामने अपने वादे रखते हैं. इसके जरिए बताते हैं कि वे चुनाव जीतने के बाद जनता के लिए क्या-क्या करेंगे. उनकी नीतियां क्या होंगी. सरकार किस तरह से चलाएंगे और उससे जनता को क्या फायदा मिलेगा.

हालांकि, वास्तविकता में घोषणा पत्र वादों का पिटारा मात्र होता है, जिनसे जनता को लुभा कर वोट मांगा जाता है. ये वादे कितने पूरे होते हैं, यह अलग चर्चा का विषय है.

दुनिया भर में जारी किए जाते हैं घोषणा पत्र

चुनावी घोषणा पत्र तैयार करने के लिए पार्टियां काफी मेहनत करती हैं. इसके लिए बाकायदा टीम का गठन किया जाता है जो पार्टी की नीतियों के अनुसार मुद्दों को चुनती है. इस पर पार्टी पदाधिकारियों के बीच चर्चा होती है और इसके बाद इसे प्रकाशित किया जाता है. सिर्फ अपने देश में ऐसा किया जाता है, ऐसा नहीं है. घोषणा पत्र जारी करने की परंपरा दुनिया भर में हैं. आमतौर पर घोषणा पत्र में आर्थिक, सामाजिक और सामाजिक मुद्दों पर पार्टी की नीति और कार्यक्रमों को पेश किया जाता है.

इसलिए तय करनी पड़ी गाइडलाइन

अमेरिका जैसे देश में आमतौर पर घोषणा पत्र में आर्थिक-विदेश नीति, स्वास्थ्य की देखभाल, शासन में सुधार, पर्यावरण से जुड़े मुद्दों और इमिग्रेशन आदि को शामिल किया जाता है. इनमें किसी तरह के खास लाभ की बात नहीं की जाती है. भारत में मुद्दों को तो शामिल किया ही जाता है, घोषणा पत्र में विशेष फायदों को भी मिलाने की परंपरा सी देखी जाती है. यहां कई बार राजनीतिक दल मुफ्त रेवड़ियां (फ्रीबीज) तक को अपने घोषणा पत्र में शामिल कर लेते हैं, जिसका मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक में उठ चुका है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर भारतीय चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों के लिए घोषणा पत्र जारी करने को एक निश्चित गाइडलाइन तय कर दी हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने दिया था फैसला

सुप्रीम कोर्ट में एस सुब्रमण्यम बालाजी वर्सेज तमिलनाडु सरकार और अन्य के मामले की सुनवाई हुई. साल था जुलाई 2013. जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस पी सतशिवम की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि कोई भी मुफ्त वितरण (फ्रीबीज) वास्तव में सभी लोगों पर असर डालता है. ऐसे में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव नहीं हो पाते. साथ ही देश में ऐसा कोई प्रावधान भी नहीं है जिससे मेनिफेस्टो में की जाने वाली घोषणाओं को कंट्रोल किया जा सके.

इसलिए कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि राजनीतिक दलों से बात करके गाइडलाइन तैयार करे. यह भी कहा था कि इस गाइडलाइन को राजनीतिक पार्टियों और चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों के लिए चुनाव आचार संहिता में भी सम्मिलित किया जा सकता है.

2013 में जारी की गई गाइडलाइन

इसके बाद 2013 में ही पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता में चुनाव घोषणा पत्र से जुड़ी गाइडलाइन भी जोड़ दी. इन गाइडलाइन में कहा गया है कि घोषणा पत्र में संविधान के आदर्शों और सिद्धांतों के खिलाफ कुछ भी नहीं होगा और यह आदर्श आचार संहिता का पालन करेगा. राजनीतिक पार्टियों को उन वादों से बचना होगा, जो चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता को कम कर सकते हैं या मतदाताओं पर गलत प्रभाव डाल सकते हैं.

इस गाइडलाइन में यह भी कहा गया है कि राजनीतिक दल घोषणा पत्र में किए गए वादों की जरूरत को बताएंगे और वही वादे किए जाएंगे जो पूरे किए जा सकते हैं. यह भी बताना होगा कि इन वादों को पूरा करने के लिए वित्तीय जरूरतें किस तरह पूरी होंगी?

घोषणा पत्र जारी करने की समय सीमा भी तय

राजनीतिक दलों के लिए घोषणा पत्र जारी करने के लिए समय सीमा भी तय कर दी गई. इसमें कहा गया है कि चुनाव के लिए घोषणा पत्र प्रोहिबिटरी पीरियड में नहीं जारी किया जाएगा. यह निर्देश जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 की धारा 126 के अनुसार दिया गया है. इसी अधिनियम के अनुसार यह भी कहा गया है कि अगर चुनाव कई चरणों में होते हैं तो भी निषेधात्मक अवधियों (प्रोहिबिटरी पीरियड) में घोषणा पत्र नहीं जारी किया जाएगा. बताते चलें कि आरपी अधिनियम की धारा 126 के अनुसार यह प्रोहिबिटरी पीरियड चुनाव खत्म होने से पहले के 48 घंटे हैं यानी मतदान के 48 घंटे पहले से घोषणा पत्र जारी करने पर रोक लग जाती है.

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