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Home दिल्ली

दिल्ली चुनाव में कितना काम आएगा केजरीवाल का दांव?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
September 23, 2024
in दिल्ली, राजनीति, राज्य
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नई दिल्ली: अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है, और आम आदमी पार्टी (AAP) ने अपनी खोई जमीन को फिर से हासिल करने, उनकी छवि को मजबूत करने और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में सत्ता बरकरार रखने की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए आतिशी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया है. हालांकि, भ्रष्टाचार के आरोप और दिल्ली में हुए आम चुनावों के दौरान अरविंद केजरीवाल के प्रति सहानुभूति की कमी से संकेत मिलता है कि AAP की “अलग तरह की पार्टी” वाली छवि को झटका लगा है.

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने केजरीवाल के इस्तीफे को पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ अपने आरोपों की पुष्टि के रूप में देखा है, जिससे राज्य चुनावों में उसकी संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं. वहीं, कांग्रेस, जोकि AAP के साथ INDIA गठबंधन का हिस्सा है, इसे दिल्ली में खुद को पुनर्जीवित करने का अवसर मान रही है. AAP का विकास दिल्ली में कांग्रेस और अन्य पार्टियों की कीमत पर हुआ है, और इसके वोट बैंक में मुख्य रूप से दलित, गरीब और अल्पसंख्यक शामिल हैं. AAP और कांग्रेस दोनों ही बीजेपी विरोधी वोट ही हासिल करते हैं.

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केजरीवाल के इस्तीफे का क्या होगा असर?

इंडिया टुडे मूड ऑफ द नेशन सर्वे की मानें तो केजरीवाल भारत के दूसरे सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं. हालांकि, उनकी लोकप्रियता फरवरी 2024 में 19.6 प्रतिशत से घटकर अगस्त 2024 में 13.8 प्रतिशत पर आ गई है. इसके अलावा, केजरीवाल के काम से संतुष्ट लोगों का प्रतिशत भी अगस्त 2023 के 58 प्रतिशत से घटकर अगस्त 2024 में 44 प्रतिशत हो गया है, जो उनकी छवि पर आरोपों के कुछ असर को दर्शाता है.

इंडिया टुडे के पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज सर्वे के अनुसार, 49 प्रतिशत लोगों का मानना है कि केजरीवाल को जेल जाने से पहले इस्तीफा दे देना चाहिए था, 40 प्रतिशत का मानना है कि उन्हें विधानसभा भंग कर देनी चाहिए थी, और 31 प्रतिशत का मानना है कि उनका इस्तीफा दिल्ली चुनावों को प्रभावित करेगा. यहां तक कि AAP के 32, 33, और 19 प्रतिशत वोटर्स ने भी यही महसूस किया. एक चतुर राजनेता माने जाने वाले केजरीवाल ने इसे समझा और जनता की अदालत में लड़ाई जीतने का फैसला किया.

क्या केजरीवाल की छवि पर पड़ा असर?

जब लोगों से पूछा गया कि क्या केजरीवाल की “कट्टर ईमानदार” छवि पर असर पड़ा है तो 37 प्रतिशत ने हां और 37 प्रतिशत ने नहीं कहा, जबकि 32 प्रतिशत का मानना था कि उनका इस्तीफा बीजेपी को मजबूत करेगा, वहीं 30 प्रतिशत का मानना था कि इससे AAP को मजबूती मिलेगी.

दिल्ली में लोग विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अलग-अलग तरीके से मतदान करते हैं. विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों और आम चुनावों में राष्ट्रीय पार्टियों को समर्थन मिलता है. 2024 के आम चुनावों में, बीजेपी ने कांग्रेस और AAP के गठबंधन के बावजूद सभी सात सीटों पर कब्जा बरकरार रखा, जबकि AAP ने इसे “जेल का जवाब वोट से” बना दिया. बीजेपी को 54 प्रतिशत वोट मिले, AAP को 24 प्रतिशत और कांग्रेस को 19 प्रतिशत वोट मिले.

आम चुनावों में क्या रहा वोटों का गणित?

पहले के रुझानों के अनुसार, AAP ने 2024 के आम चुनावों में 2020 विधानसभा चुनावों की तुलना में 30 प्रतिशत वोट खोए, जबकि बीजेपी को 16 प्रतिशत और कांग्रेस को 15 प्रतिशत वोटों का फायदा हुआ. 2019 के लोकसभा चुनावों में, AAP ने 2015 के विधानसभा चुनावों की तुलना में 36 प्रतिशत वोट शेयर खो दिया था. हालांकि, AAP ने 2020 के विधानसभा चुनावों में इस 36 प्रतिशत की भरपाई कर ली, जिसमें 54 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया, और यह कांग्रेस और बीजेपी की कीमत पर हुआ, दोनों पार्टियों से AAP को 18-18 प्रतिशत वोट मिले.

यह दिखाता है कि दिल्ली में लगभग 30 प्रतिशत मतदाता किसी भी पार्टी के प्रति विचारधारात्मक रूप से प्रतिबद्ध नहीं हैं और वे चुनाव के प्रकार के आधार पर AAP, बीजेपी, और कांग्रेस के बीच स्विच करते रहते हैं. यही मतदाता तय करेंगे कि AAP 2025 में दिल्ली में जीतेगी या नहीं. यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि भ्रष्टाचार के आरोप इन मतदाताओं को कितना प्रभावित करते हैं. यदि AAP को इन मतदाताओं में से आधे का समर्थन मिलता है, तो बीजेपी और AAP का वोट शेयर 39 प्रतिशत पर बराबर हो जाएगा, जिससे चुनाव में कड़ी टक्कर होगी.

AAP और कांग्रेस के वोटों का ट्रांसफर

जब AAP और कांग्रेस ने दिल्ली में आम चुनावों के लिए गठबंधन किया, तो कुछ विश्लेषकों को उनके वोट एक-दूसरे के उम्मीदवारों को ट्रांसफर होने पर संदेह था. आखिरकार, AAP की शुरुआती राजनीति पूरी तरह से कांग्रेस विरोधी थी. हालांकि, दोनों पार्टियों के वोटिंग सेगमेंट एक जैसे हैं, दलित, अल्पसंख्यक, और गरीब. अब, राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव के कारण, दोनों ही बीजेपी विरोधी वोट हासिल करते हैं. नतीजतन, दोनों पार्टियों के बीच 100 प्रतिशत वोट ट्रांसफर हुआ. 2019 में, दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ते हुए 41 प्रतिशत वोट शेयर प्राप्त किया. 2024 में यह बढ़कर 43 प्रतिशत हो गया.

2025 का दिल्ली चुनाव कौन जीतेगा?

AAP, INDIA गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन कांग्रेस के साथ इसका रिश्ता थोड़ा पेचीदा है. AAP दो राज्यों में सत्ता में है, और दोनों में उसने कांग्रेस को हराकर जीत हासिल की थी. हरियाणा में गठबंधन वार्ता विफल होने और केजरीवाल के इस्तीफे के बाद कांग्रेस के प्रदेश इकाई की तीखी प्रतिक्रिया से संकेत मिलता है कि सहयोगियों के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. कांग्रेस के संदीप दीक्षित ने केजरीवाल के फैसले की आलोचना करते हुए इसे राजनीति से अधिक व्यवसाय से जुड़ा बताया, जबकि AAP के सौरभ भारद्वाज ने कांग्रेस को ऐसा प्रतिद्वंद्वी बताया जो हमेशा बीजेपी को AAP के खिलाफ आरोप लगाने में मदद करता रहा है. फिलहाल, दिल्ली चुनावों में दोनों के बीच गठबंधन की संभावना कम दिखती है.

राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत कांग्रेस AAP के लिए अच्छी खबर नहीं है, क्योंकि यह दलित, मुस्लिम और गरीब मतदाताओं का एक हिस्सा खींच सकती है. 2017 के नगर निगम चुनावों में, AAP, 2015 के विधानसभा चुनावों में जीत के बावजूद, बीजेपी से हार गई थी. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस और अन्य को AAP की कीमत पर 11 और 13 प्रतिशत वोट मिले, जिससे AAP का वोट शेयर 26 प्रतिशत पर आ गया, जो 2015 की तुलना में 28 प्रतिशत की गिरावट थी.

2022 के नगर निगम चुनावों में, AAP ने बीजेपी के खिलाफ एक करीबी मुकाबला जीता. उसे 2020 के विधानसभा चुनावों में 15 प्रतिशत की बढ़त के मुकाबले सिर्फ तीन प्रतिशत की बढ़त मिली. यह इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस को आठ प्रतिशत वोट मिले, जो 2020 में चार प्रतिशत थे, और यह AAP की कीमत पर हुआ. नतीजतन, AAP ने सिर्फ 54 प्रतिशत MCD सीटें जीतीं, जबकि 2020 के विधानसभा चुनावों में उसकी 89 प्रतिशत सीटें थीं.

वोट प्रतिशत का क्या है गणित?

यदि कांग्रेस AAP से पांच प्रतिशत वोट शेयर हासिल करती है, तो AAP 10 सीटें बीजेपी को खो सकती है, लेकिन फिर भी 52 सीटों के साथ एक आरामदायक बहुमत हासिल कर सकती है. यदि कांग्रेस AAP से 10 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करती है, तो AAP 15 सीटें बीजेपी को खो सकती है, लेकिन फिर भी 47 सीटों के साथ बहुमत प्राप्त कर सकती है, जिसमें 36 सीटें आधे से अधिक होती हैं. यदि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही AAP से 2.5 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करते हैं, तो AAP 11 सीटें बीजेपी को खो सकती है, लेकिन फिर भी 51 सीटों के साथ बहुमत प्राप्त कर सकती है. यदि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही AAP से पांच प्रतिशत वोट शेयर हासिल करते हैं, तो AAP अपनी 2020 की आधी सीटें खो सकती है, और बीजेपी 39 सीटों के साथ विजेता बन सकती है.

बीजेपी केवल कांग्रेस पर निर्भर नहीं रह सकती है कि वह AAP की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाए. उसे सत्ता विरोधी वोटों को अपनी ओर खींचने की जरूरत है ताकि केजरीवाल को फिर से जमीन हासिल करने से रोका जा सके. दस साल का समय सत्ता विरोधी लहर को स्वाभाविक रूप से पैदा करने के लिए काफी होता है. दिल्ली AAP की “कर्मभूमि” रही है, क्योंकि यहीं से पार्टी ने देश के अन्य हिस्सों में विस्तार किया था. AAP की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह राज्य में लगातार तीसरी बार जीत दर्ज करे, जिससे वह शीला दीक्षित के रिकॉर्ड की बराबरी कर सके.

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