नई दिल्ली। भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी बनाने के लिए जरूरी लिथियम अब समुद्र के पानी से निकालने की दिशा में बड़ी वैज्ञानिक कामयाबी मिली है. भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी केमिकल टेक्निक डेवलप की है, जिससे प्राकृतिक समुद्री पानी में घुले लिथियम का करीब 90% हिस्सा निकाला जा सकता है. इससे भारत की लिथियम के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, इस टेक्निक को बड़े लेवल पर इस्तेमाल करने और इसकी लागत का आकलन करना अभी जरूरी होगा.
दुनियाभर में इलेक्ट्रिक गाड़ियों और रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल बढ़ रहा है. इसके साथ ही ऐसी बैटरियों की मांग भी बढ़ रही है, जिनमें बिजली स्टोर की जा सके. लिथियम-आयन बैटरी अपनी ज्यादा एनर्जी स्टोरेज कैपेसिटी, लंबी उम्र और बेहतर परफॉर्मेंस के कारण इलेक्ट्रिक गाड़ियों, मोबाइल फोन और एनर्जी स्टोरेज सिस्टम में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती हैं.
भारत में भी EV का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन लिथियम और बैटरी बनाने के लिए जरूरी सेल के मामले में भारत की इंपोर्ट पर निर्भरता काफी ज्यादा है. ऐसे में इंटरनेशनल मार्केट में लिथियम की कीमत बढ़ने या सप्लाई प्रभावित होने का असर बैटरी और इलेक्ट्रिक गाड़ियों की लागत पर पड़ सकता है.
समुद्र के पानी से लिथियम कैसे निकालेगा BARC?
BARC के वैज्ञानिकों ने समुद्री पानी से लिथियम निकालने के लिए एक खास केमिकल प्रोसेस डेवलप किया है. इसमें सबसे पहले सोडियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम कार्बोनेट की मदद से पानी का pH लेवल धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है. इससे पानी में मौजूद मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे दूसरे तत्वों को हटाने में मदद मिलती है.
रिसर्च के मुताबिक, इस प्रोसेस में 99% से ज्यादा अवांछित तत्व हट गए, जबकि ज्यादातर लिथियम पानी में बना रहा. यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि समुद्री पानी में लिथियम के साथ कई दूसरे तत्व भी मौजूद होते हैं. ऐसे में लिथियम को बचाते हुए बाकी तत्वों को अलग करना इस टेक्नीक की अहम चुनौती है.
कम सॉल्वेंट में 90% लिथियम रिकवरी
कम सॉल्वेंट का इस्तेमाल: पानी और ऑर्गेनिक सॉल्वेंट का रेशियो 10:1 रखा गया. यानी 1 लीटर पानी के लिए करीब 100 मिलीलीटर सॉल्वेंट की जरूरत पड़ी.
कम केमिकल की जरूरत: MIBK सॉल्वेंट लिथियम केमिकल कॉम्प्लेक्स को स्थिर रखने में मदद करता है, जिससे अतिरिक्त केमिकल मिलाने की जरूरत कम हो सकती है.
मिक्सिंग टाइम का असर: पानी और सॉल्वेंट को कितनी देर मिलाया जाता है, इसका लिथियम रिकवरी पर असर पड़ता है. सही समय तक संपर्क से रिकवरी बेहतर होती है.
90% तक लिथियम रिकवरी: लिथियम को अलग करने के लिए तनु नाइट्रिक एसिड का इस्तेमाल किया गया. पांच बार प्रोसेस दोहराने पर करीब 90% रिकवरी मिली.
सॉल्वेंट का दोबारा इस्तेमाल: लिथियम निकालने के बाद सॉल्वेंट को फिर इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, हर साइकल में करीब 10% सॉल्वेंट कम हुआ, जो बड़े स्तर पर लागत बढ़ा सकता है.
भारत कितना लिथियम इंपोर्ट करता है?
भारत में लिथियम और लिथियम-आयन बैटरी से जुड़े इंपोर्ट में पिछले कुछ सालों में तेजी आई है. दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2018 में इनका इंपोर्ट करीब 3,532 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 25,458.6 करोड़ रुपये हो गया.
वित्त वर्ष 2026 में अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के 11 महीनों के दौरान इंपोर्ट का आंकड़ा 37,624.6 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. यह पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले करीब 48% ज्यादा है. भारत रिफाइंड लिथियम और बैटरी-ग्रेड लिथियम-आयन सेल के लिए इंपोर्ट पर निर्भर है. इस सप्लाई में चीन की बड़ी हिस्सेदारी है.
क्या समुद्र से लिथियम मिलने पर सस्ती होंगी EV?
अगर BARC की टेक्नीक को बड़े लेवल पर सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा सका, तो भारत के लिए लिथियम का घरेलू सोर्स तैयार करने का रास्ता खुल सकता है. इससे इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने और बैटरी सप्लाई को मजबूत करने में मदद मिल सकती है.
हालांकि, समुद्र के पानी में लिथियम की मात्रा कम होती है. इसलिए सिर्फ 90% रिकवरी हासिल करना ही काफी नहीं है. यह भी देखना होगा कि एक तय मात्रा में लिथियम निकालने के लिए कितना समुद्री पानी, कितने केमिकल, कितनी एनर्जी और कितना पैसा खर्च होता है. इसके अलावा, टेक्नीक को लैब से बड़े इंडस्ट्रियल लेवल तक ले जाने की लागत और पर्यावरण पर असर का आकलन भी जरूरी है.







