Upgrade
पहल टाइम्स
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
No Result
View All Result
पहल टाइम्स
No Result
View All Result
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • ईमैगजीन
Home विशेष

इतिहास

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 31, 2022
in विशेष
A A
1
VIEWS
Share on FacebookShare on Whatsapp

हरिशंकर व्यास

सोचें, पृथ्वी के करोड़ों साल पुराने इतिहास में मनुष्य के पांच हजार वर्षों पर! इन पांच हजार वर्षों का निचोड़ क्या है? कथित मानव सभ्यता का लब्बोलुआब क्या है? तीन सत्य। मनुष्यों का लगातार आपस में लड़ते रहना। झूठी कहानियां बना कर उनमें जीवन को जीना! जीवन के लिए हर तरह के पिंजरों का निर्माण और उन्हीं में आधुनिक मनुष्य का जीवन!ज्इतिहास मनुष्य प्रवृत्ति के व्यवहार की घटनाओं की दास्तां है। यदि सभी घटनाओं का वर्गीकरण करें तो होमो सेपियन सचमुच शिकार-शिकारी (युद्ध), टोलों-बाड़ों (व्यवस्था, देश, पिंजरों), गपोड़ कहानियों (अहंकार, धर्म), औजारों (प्रस्तर अस्त्र से परमाणु अस्त्र तक) के निर्माण के पांच-आठ वर्गों में वर्गीकृत हुआ मिलेगा।

इन्हें भी पढ़े

india export

भारत को डराया नहीं जा सकता, यह नया भारत है!

September 22, 2026
ABVP's dominance in DUSU elections

विश्लेषण : डूसू चुनाव में एबीवीपी का दबदबा, जेन ज़ी के वोट पर क्यों छिड़ी बहस?

September 20, 2026
Dattatreya Hosabale

श्रम साधक मजबूत होंगे तो समाज और भविष्य दोनों मजबूत होंगे : दत्तात्रेय होसबाले

September 20, 2026
retail prices

बढ़ती खुदरा कीमतों पर लगाम की कवायद, नोएडा में ₹35 किलो प्याज की बिक्री शुरू

September 17, 2026
Load More

प्रलय का मुहाना-20: इतिहास मनुष्य का सत्य है। उसकी पशुताओं का दो टूक सत्य। कैसे? आम मान्यता है कि मनुष्य का होना, उसकी पहचान दिमाग है। तब सोचें मनुष्य इतिहास कैसे लिखा होना था? मानव दिमाग के विचारों, आइडिया, तपस्वी साधकों की सत्य खोज की तारीखों और उपलब्धियों का लिखा होना था। लेकिन मानव इतिहास और उसकी टाइम लाइन में क्या उल्लेखित है? पशुगत प्रवृत्तियों से पैदा हुई लड़ाइयों की तारीखें!  मनुष्य का कथित सभ्यतागत जीवन ईस्वी पूर्व सन् 5,500 में मेसोपोटामिया की पहली मनुष्य बस्ती से आरंभ है। तब से अब तक के 7,720 वर्षों की तारीखें क्या बताती हुई हैं? कौन राजा हुआ, कौन जीता और कौन हारा? किसने किसको गुलाम बनाया और कितने लोग मौत के घाट उतरे। आंकड़ा है पिछले 34 सौ सालों में सिर्फ 268 साल शांति के थे। केवल 268 साल मनुष्य लड़ाई लड़ते हुए नहीं थे।

जरा तुलना करें पृथ्वी और उसके पैदा किए गए पशुओं (उनमें मानव भी) की पैदाइश व उसके इतिहास पर। पृथ्वी के अस्तित्व का करोड़ों साल पुराना इतिहास प्रामाणिक है। इस इतिहास में बायोमास के तमाम जीव, कछुए से लेकर डायनोसार, मनुष्य आदि पृथ्वी पर पैदा हुए। उनमें कई पशु प्रजातियां परिवेश की परिस्थियों में विलुप्त हुईं। पृथ्वी के इतिहास अनुसार मनुष्य की जैविक रचना, होमो सेपियन दो लाख साल पुरानी रचना है। इसमें मनुष्यों का आधुनिक कृषि जीवन सिर्फ आठ हजार साल पुराना। उसकी व्यवस्थाओं व सभ्यता का इतिहास मुश्किल से चार-पांच हजार साल पुराना।

सोचें, पृथ्वी के करोड़ों साल पुराने इतिहास में मनुष्य के पांच हजार वर्षों पर! इन पांच हजार वर्षों का निचोड़ क्या है? कथित मानव सभ्यता का लब्बोलुआब क्या है? तीन सत्य। मनुष्यों का लगातार आपस में लड़ते रहना। झूठी कहानियां बना कर उनमें जीवन को जीना! जीवन के लिए हर तरह के पिंजरों का निर्माण और उन्हीं में मनुष्य का जीवन!

रिपीटेशन निरंतर
तभी मनुष्य ने जो इतिहास लिखा है वह बेमतलब है। इतिहास शब्द ही गलत है। इतिहास, याकि “हिस्तरी” का स्थान-विषयवार, कालक्रमानुसार घटनाओं का ब्योरा मतलब वाली बात नहीं है। इससे मनुष्य को क्या फायदा है? यह इतिहास यही तो बताता है कि मनुष्य बार-बार गलतियां करता है। मनुष्य वह पशु है, जिसका आदिम शिकारी-शिकार का स्वभाव, जंगली व्यवहार स्थायी है। उस व्यवहार का रिपीटेशन निरंतर है। यदि इंसान किंगडम एनिमेलिया से अलग और खास होता तो क्या वह बार-बार उन्हीं गलतियों, व्यवस्थाओं, कहानियों को रिपीट करते हुए होता, जैसे पशु अपने स्वभावों में करते हैं।
उस नाते इतिहास नहीं रिपीट होता है, बल्कि मनुष्य का स्वभाव पशुगत यांत्रिकता में पुनरावृत्त होता है।
बाड़ों की व्यवस्था, कबीला प्रमुख, राजा-रानी, युद्ध, औजार निर्माण और उनके उपयोग की इतिहास घटनाएं चिम्पांजी के वंशानुगत अतीत की पुनरावृत्ति बार-बार है। इसलिए यदि विज्ञान और मनोविज्ञान मनुष्य के पशु व्यवहार का रहस्योद्घाटन है तो उस पशु व्यवहार की मेमोरी इतिहास है। इतिहास वंशानुगत डीएनए और उनके परिवेश से क्रमिक विकसित होने के इवोल्यूशन की परोक्ष दास्तां है। यह ह्यूमन विकास किस बात का? क्या युद्ध की संहारक शक्तियों, झूठी कहानियों, पिंजरों और भस्मासुर बनाने वाला क्या नहीं?

इतिहास का सार
मनुष्य प्रवृत्ति के व्यवहार की घटनाओं की दास्तां है इतिहास। यदि इतिहास की टाईमलाइन की सभी घटनाओं का वर्गीकरण करें तो होमो सेपियन सचमुच शिकार-शिकारी (युद्ध), टोलों-बाड़ों (व्यवस्था, देश, पिंजरों), गपोड़ कहानियों (अहंकार, धर्म), औजारों (प्रस्तर अस्त्र से परमाणु अस्त्र तक) के निर्माण के पांच-आठ वर्गों में वर्गीकृत हुआ मिलेगा। पूरे इतिहास का समुच्चय है कि सभ्यता के विकास में मनुष्य का न केवल एक-दूसरे के लिए भस्मासुर बनना हुआ, बल्कि पृथ्वी के लिए भी वह भस्मासुर बना। तब सभ्य होना, सभ्यताओं का निर्माण क्या?  क्या मै गलत हूं?
सवाल है पांच हजार सालों में मनुष्य ने वह क्या बनाया है, जिससे पृथ्वी की सुंदरता बढ़ी? पृथ्वी की दीर्घायुता, उसकी सेहत बढ़ी हो? तभी दार्शनिकों के मनुष्य के जन्मजात दुष्ट होने या अच्छे होने के सवाल का पृथ्वी के संदर्भ में जवाब सोचें तो वह यही होगा कि मनुष्य प्राइमरी तौर पर पृथ्वी का सबसे बड़ा दुष्ट प्राणी है! और इस सत्य को इतिहास की तारीखें प्रमाणित करते हुए हैं।

तभी 21 वीं सदी का संकट ‘इंसान’ है। वह इंसान, जिसके व्यवहार से पृथ्वी की प्राणवायु सूखते हुए है, जिसके अतीत के ‘निशान’ लगातार मनुष्यों में महा कलह और लड़ाइयां बनाते हुए हैं। खोपड़ी के डीएनए और वंशानुगत मेमोरी दोनों ने मनुष्य को आत्महंता व भस्मासुर बनाया है। तभी सभ्यतागत संघर्ष अनिवार्य है। आठ अरब लोगों में बहुसंख्यकों को निरंतर लावारिस जिंदगी जीते जाना है, वही पृथ्वी को भी फडफ़ड़ाती मौत की दिशा की और बढ़ते जाना है!
पर मनुष्य दिमाग ऐसा नहीं मानता है। उसका इतिहास लड़ाइयों की लाठी से उत्तरोत्तर प्रगति हुई देखता है। उसके श्रेष्ठ होते जाने का अहंकार परमाणु हथियारों और ऊर्जाओं का विकास है। वह अब कदं-मूल का वनमानुषी खाना नहीं, बल्कि छप्पन भोग की थाली से पेट भरता है। उसका आदिम औजार निर्माण, उसका पहिया अब अंतरिक्ष में मनुष्य ग्रह बनवाने वाले यान में परिवर्तित है।
सब सही बात! बावजूद इसके सोचें कि इंसान के निज-आम जीवन की दशा में क्या? इक्कीसवीं सदी के मनुष्यों में बहुसंख्यक क्या आदिम अवस्था से अधिक भयाकुलता, भूख, झूठ और अंधेरों में जीते हुए नहीं है?

क्या पृथ्वी पर अब तक जिदंगी जीए 108  अरब लोगों ने स्वर्ग पाया?
इतिहास का सत्य है कि संख्या में होमो सेपियन बढ़ते गए। वह खोपड़ी के आकार, परिणाम, संख्या और विविधता व भिन्नताओं में बढ़ता गया। लेकिन लोगों ने स्वर्ग तो नहीं भोगा!  उन्हें भूख, भय, झूठ और अंधकार से मुक्ति तो नहीं मिली! सात हजार साल या पांच, तीन, दो हजार साल पहले पृथ्वी पर पचास लाख, करोड़, दो करोड़ जितने भी मनुष्य थे वे आज के मुकाबले तब कम भूख, कम खौफ (राजा का या तलवार का) और अधिक सुकून व संतोष से क्या जिंदगी जीते हुए नहीं थे? यदि धीरे-धीरे मनुष्य विकास, डार्विन की विकासवाद की थ्योरी में इवोल्यूशन हुआ तो वह विकास कहां है, जिससे मूल चिम्पांजी प्रवृत्ति, मनोवृत्ति बदली हुई होती और मनुष्य सुखी, समझदार, सत्यवादी स्वभाव का बनता? क्या यह कोई दावा कर सकता है कि पहले इतने प्रतिशत मनुष्यों का जीवन लावारिस व पिंजरों में दुख भोगता हुआ था, जबकि इक्कीसवीं सदी की आठ अरब लोगों की आबादी में तब के मुकाबले कम अनुपात में लोग दुखी हैं!

तर्क, यथार्थ, विकास के परम वैभव के पिछले ढाई सौ सालों का सत्य त्रासद है। विकास की छलांगों से पृथ्वी और मनुष्य दोनों का जीवन रेड जोन में आया है। आठ अरब की आबादी में 95 प्रतिशत मनुष्य अमानवीय जिंदगी जीते हुए हैं। पशु से अलग होने की पहचान में मनुष्य जिंदगी के जितनी तरह के पैरामीटर हैं उनकी कसौटी में 95 प्रतिशत मनुष्य आबादी उसी घुटन भरी अवस्थाओं में जिंदगी गुजारते हुए है, जैसे मध्य काल में लोग जीवन जीते थे।

इतिहास रिपीट नहीं होता है, बल्कि इतिहास में, उससे चली आ रही लकीर में ही मनुष्य जीवन जीता है। उसके दिमाग को अतीत की मेमोरी, वंशानुगत डीएनए चलाए रहते हैं। अतीत और मानववृत्ति का चोली-दामन का नाता है। मनुष्य कहीं चला जाए, कुछ भी हो जाए, उसकी वजह, उसके साथ और अंत में नियति, डीएनए प्रकृति व इतिहास से सब तय होता है। तभी भाग्य और नियति का मामला मनुष्य प्रकृति से स्वचालित लगता है।

चिंतकों का महा बलंडर!
सहस्त्राब्दियों से विचारक, दार्शनिक, धर्माचार्य, इतिहासकार मनुष्य पर सोचते चले आ रहे हैं। वह कैसे सुसंस्कृत, सभ्य और मानवीय हो? कैसे वह जंगली अवस्था के स्वभाव, अवशेषों, पिंजरों से मुक्त हो कर स्वतंत्रचेता मानव बने? और इसी की उधेड़बुन में चिंतकों ने महा बलंडर किया। मनुष्य दिमाग का रियल विकास कराने, उनके पंख बनाने के बजाय उसकी बेडिय़ां बनवा डाली। मनुष्य को नियंत्रित, दुरूस्त करने के जादू-टोने-टोटके सोचे और उनसे धर्म और व्यवस्थाएं बनाईं। सत्ता के तंत्र-मंत्र बनाए। कथानक, नायक-खलनायक, देव-असुर की शाखाओं-प्रशाखाओं की कहानियां बनाईं। नतीजतन मनुष्य बनाम मनुष्य को लड़ाने, बांटने, भटकाने, मालिक-गुलाम और साम्राज्य-सभ्यता की तारीखों का इतिहास बनता गया।

आश्चर्य नहीं जो आठ अरब लोगों की भीड भिन्नताओं-विचित्रताओं में सांस लेती हुई है। अधिकांश लोगों के पंख कतरे हुए है। पालतू जीवन की उनकी प्रवृत्ति है। मनुष्य की व्यक्तिगत और सामूहिक चेतना चित, वृत्ति, रूढ़ी में जड़ है। निश्चित ही डार्विन का विकासवाद आदि मानव चिम्पांजी के भौतिक मनुष्य बनने की गजब थीसिस है। पर इस पहलू पर चिंतन नहीं के बराबर है कि मनुष्य चेतना के जागने-जगाने, उसे परफेक्ट बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद समझदारियों में मनुष्य क्यों नहीं पूर्ण, परफेक्ट मानव है?
इतिहास दिलचस्प विषय है। इसमें मनुष्य प्रकृति व अस्तित्व के राज है। सवाल है इतिहास ऐसा कैसे जो मनुष्य को बांधने, लडाईयों, विनाश की तारीखों से भरा है? ध्यान रहे, युद्ध और लड़ाइयों के कारण ही मनुष्य के आदिम डीएनए याकि भय, भूख-लालच, अहंकार, झूठ उत्तरोत्तर बढ़ते गए।

इतिहास में जकड़ा भारत
बतौर उदाहरण भारत पर गौर करें। आबादी इतिहास में जकड़ी हुई है। लोगों की प्रकृति कहानियों, अनुभव और उनसे बने दिमागी निशान से बाहर प्रभावित है। इसलिए कि ढाई हजार साल के ज्ञात इतिहास में कहानियों, लड़ाइयों और गुलामी में ही लोग जीवन गुजारते रहे। इतिहास की तमाम भारत थ्योरियों, मान्यताओं का सत्व-तत्व है कि अराजक-अंधकार युग में भी मनुष्य जीवन लावारिस था तो वैभव काल के अश्वमेध यज्ञों में भी प्रजा की स्वतंत्रता की गारंटी बनाने वाला, इहलोक को स्वर्गलोक बनाने का चिंतन नहीं था। जो था वह परलोक का चिंतन था या पलायन और वैराग्य का। रामायण-महाभारत से लेकर राजे-रजवाड़ों की लड़ाइयों व ईश्वर अवतार के भरोसे मनुष्य की कलियुगी जिंदगी थी। डेढ़ हजार साल पहले विदेशी हमलों का सिलसिला जब शुरू हुआ तो उसके बाद भारत में वह हुआ जो पूरे मानव इतिहास में और कहीं नहीं हुआ। लोग तलवार, गुलामी, पिंजरों और सरकार की बेडिय़ों से सैकड़ों साल सतत भूख, भय, भक्ति, चाकरी, माई-बाप सरकार की कृपा में जिंदगी जीते चले आ रहे है। शोषण, लूट, जख्म और उनके निशान के इतिहास में ही भारत का वर्तमान है। डीएनए व मनोवृत्ति के वंशानुगत, इतिहासजन्य अनुभव में मनुष्य कैसे सतत एक सी जिंदगी जीता आया है इसकी पृथ्वी पर नंबर एक मिसाल भारत के 140 करोड़ लोग हैं।

ऐसे ही इस्लामी देश और 1.90 अरब मुस्लिम इतिहास में जीते हुए है। वहीं डेढ़ अरब चाइनीज भी वैभव पा कर उस वक्त से चिपके हैं जब चीन के पृथ्वी के मिडिल किंगडम होने की कहानी बनी थी। ध्यान रहे कहानी का अर्थ है युद्ध और मनुष्य बनाम मनुष्य की लड़ाई। स्वामित्व या गुलामी। शोषक और शोषित। दूसरे शब्दों में वह इतिहास जिस पर होमो सेपियन सभ्यता जैसी जुमलेबाजियों में इतराता है।

आश्चर्य नहीं जो मनुष्य अब पृथ्वी को अपने इतिहास का हिस्सा बना रहा है। मनुष्य अपने व्यवहार से वह विध्वंस किए हुए है, जिससे पृथ्वी की घड़ी का अंतकाल आता हुआ है। वैज्ञानिक, विचारक और भविष्यदृष्टा लोग वे टाइम कैप्सूल, वे कालजयी घडिय़ां बनाने लगे हैं ताकि पृथ्वी व मानव सभ्यता का अंत हो तब भी इस इहलोक की याद में चलती रहे। यह ख्याल मजेदार है कि कुछ यांत्रिक वस्तुओं से मनुष्य और पृथ्वी की स्मृति प्रलय के बाद भी बनी रहनी चाहिए। मतलब यांत्रिकता से इतिहास को जिंदा रखना।

ऐसा ही मनुष्य का पांच हजार वर्षों से अपने साथ और पृथ्वी के साथ व्यवहार हुआ है। इतिहास की तारीखों को मनुष्यों ने हमेशा यांत्रिक भाव याद रखा। बिना इस बोध के, इस समझदारी के कि ये जो तमाम तारीखें हैं, घटनाएं हैं उनका मतलब दिमाग के स्वभाव के लिए हैं। अधिकतम मनुष्यों का इतिहास के साथ बिना समझदारी व बिना बोध के व्यवहार था।

इन्हें भी पढ़ें

  • All
  • विशेष
  • लाइफस्टाइल
  • खेल

सीएम धामी ने वर्षा प्रभावित क्षेत्रों का किया औचक निरीक्षण, निर्देश ये दिये

July 11, 2023
जदयू विधायक गोपाल मंडल

‘सिर्फ डांस ही नहीं करता, चुम्मा भी लेता हूं;’ JDU एमएलए बोले- ‘बुरा नहीं मानिएगा’

March 11, 2025
Big tricolor hoisted on Indian High Commission in London

खालिस्तानियों को करारा जवाब है लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग पर लहराता विशाल तिरंगा

March 20, 2023
पहल टाइम्स

पहल टाइम्स का संचालन पहल मीडिया ग्रुप्स के द्वारा किया जा रहा है. पहल टाइम्स का प्रयास समाज के लिए उपयोगी खबरों के प्रसार का रहा है. पहल गुप्स के समूह संपादक शूरबीर सिंह नेगी है.

Learn more

पहल टाइम्स कार्यालय

प्रधान संपादकः- शूरवीर सिंह नेगी

9-सी, मोहम्मदपुर, आरके पुरम नई दिल्ली

फोन नं-  +91 11 46678331

मोबाइल- + 91 9910877052

ईमेल- pahaltimes@gmail.com

Categories

  • Uncategorized
  • खाना खजाना
  • खेल
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • दिल्ली
  • धर्म
  • फैशन
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • विश्व
  • व्यापार
  • साक्षात्कार
  • सामाजिक कार्य
  • स्वास्थ्य

Recent Posts

  • ED का बड़ा ऐक्शन, जालंधर से दिल्ली तक ताबड़तोड़ पढ़े छापे
  • भारत पर ऐक्शन से पहले सोच लेना’, रूस से तेल खरीदारी पर US को किसने दिखाया आईना
  • दिल्ली के इस 160 साल पुरानी इमारत का होगा कायाकल्प, दिखेगा विरासत और संस्कृति का मेल

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.

  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.