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Home राष्ट्रीय

काश! मोदी काम भी करते!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 16, 2022
in राष्ट्रीय
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pm modi
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हरिशंकर व्यास

इस सप्ताह प्रधानमंत्री मोदी की जुबानी एक और गजब डायलॉग सुनने को मिला। खबर पढ़ मुझे बहुत खेद हुआ और सोचा जो बात कही है यदि उस पर उनकी सरकार ने पांच प्रतिशत भी काम किया होता तो कम से कम यह संतोष बनता कि हिंदू राजनीति, हिंदू आइडिया ऑफ इंडिया पर दुनिया यह जानती तो सही कि संघ परिवार में ‘इंटेलेक्चुअल स्पेस’ लायक कुछ बौद्धिकता है। प्रधानमंत्री ने देश की बौद्धिकता में अंग्रेजी के वर्चस्व के सत्य में कहा, ‘क्यों इंटेलेक्चुअल स्पेस किसी विशेष भाषा को जानने वाले कुछ लोगों तक ही सीमित रहना चाहिए? सवाल सिर्फ इमोशन का नहीं है, बल्कि साइन्टिफिक लॉजिक का भी है। यानी इंटेलेक्ट का, एक्सपर्टीज का दायरा निरंतर सिकुड़ता गया। जिससे इन्वेंशन और इनोवेशन का पुल भी लिमिटेड हो गया। गुलामी के वक्त भारतीय भाषाओं के विस्तार को रोका गया। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, रिसर्च को इक्का-दुक्का भाषाओं में सीमित कर दिया गया। भारत के बहुत बड़े वर्ग की उन भाषाओं तक, उस ज्ञान तक एक्सेस ही नहीं था। कोई भी भारतीय बेस्ट इंफॉर्मेशन, बेस्ट नॉलेज, बेस्ट स्किल और बेस्ट अपॉर्चुनिटी से सिर्फ भाषा के कारण वंचित ना रहे, ये हमारा प्रयास है। इसलिए हमने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं में पढ़ाई को प्रोत्साहन दिया है’।

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लाजवाब भाषण। यदि इसके साथ वाराणसी के शिक्षा समागम में दिए भाषण के इस अंश पर गौर करें कि अंग्रेजों की शिक्षा नीति नौकर पैदा करने के लिए थी और हम उसे बदले रहे हैं तो अपना सवाल है कि सरकार का आठ सालों में कुछ करने का प्रमाण क्या है? सोचें, भारत की पूरी सरकार, कई प्रदेशों में भाजपा की सत्ता लेकिन आठ वर्षों में मराठी, गुजराती, या कन्नड़ भाषाओं की बात तो दूर संघ परिवार ने हिंदी में एक भी बौद्धिक पैदा किया है? संघ परिवार को पता नहीं होगा लेकिन जानना चाहिए कि इंदिरा गांधी के राज में वामपंथियों ने घुसपैठ बनाकर, शिक्षा मंत्री नुरूल हसन जैसों की कमान बनवा कर शिक्षा, सामाजिक संस्थाओं, कला-विज्ञान सब जगह अपने लोग बैठा कर वह बौद्धिक लेखन, पुस्तक लेखन बनवाया, जिसकी छाप दुनिया में बनी। तभी दुनिया के बौद्धिक उनकी नजर से भारत को देखते हैं और लिखते हैं।

सरकार में ऐसी बौद्धिक कमान, संस्थानों में बौद्धिक नियुक्तियां क्या हैं? सही है कि संघ-भाजपा के पास बौद्धिक हैं कहां जो वे नियुक्तियां हों जिनके लिखने और ज्ञान से कुछ खिले। पिछले आठ वर्षों में क्या हुआ? अंग्रेजी, हिंदी, मराठी आदि किसी भी भाषा में संघ और मोदी राज की मिंमासा का क्या एक भी बुद्धिजीवी उभरा है, जिसकी लेखनी से मोदी, शाह, संघ परिवार के दिमाग, सोच का वस्तुपरक, लॉजिकल खुलासा देश-दुनिया का रेफरेंस बना हो? जब सरकार बिना ‘इंटेलेक्चुअल स्पेस’ के है, उसकी संस्थाएं बिना बौद्धिक दिमाग के हैं और आठ सालों में कहीं भी बौद्धिक काम नहीं है तो देश न केवल अंग्रेजी में बौद्धिक दिवालिया हुआ पड़ा है, बल्कि हिंदी में तो और जहालत-काहिली भर गई है। शर्म आती है संघ-भाजपा परिवार की ओर से हिंदी में लेखन करने वाले थोथे चेहरों और थोथे विषयों पर!

सही है अंग्रेजों ने अंग्रेजी से गुलाम बनाया। शिक्षा नीति नौकरी वाली बनाई। पर आठ वर्षों से उसे बदलने के लिए हिंदी में सरकार ने क्या काम कराया? कितनी किताबें लिखवाई? सरकार में सारा काम अभी भी हिंदी में अनुवाद व अनूदित हिंदी किताबों की प्राथमिकता का है। इंजीनियरिंग-डॉक्टरी की हिंदी में पढ़ाई के कोर्स की किताबें ऐसी अनुदित हिंदी में बनी हैं कि हिंदी भाषी नौजवान सिर पीट लेगा। आठ सालों में यदि सरकार ने पांच-आठ सुधीजनों को पैसा देकर, उनकी संस्थाएं बनवा कर मौलिक किताबें लिखवाने का काम बनवाया होता तब भी कुछ हो सकता था। हिंदी में ‘इंटेलेक्चुअल स्पेस’ तब बन सकता है जब बौद्धिक पत्रिकाओं, थिंक टैंक और वैचारिकता का सत्य विमर्श बने। पठनीय, बौद्धिक किताबें छपें न की प्रायोजित जीवनियां, सोवियत संघ के वक्त की प्रोपेगेंडा पुस्तकें। कम से कम पाठ्य पुस्तकों को तो कायदे से लिखवाना-बनवाना चाहिए। कितनी बड़ी बात कि नई शिक्षा नीति का मकसद नौकर और नौकरी का नहीं तो बौद्धिकता से बताए तो सही कि नई शिक्षा नीति से नौजवान क्या बनेंगे? क्या नई शिक्षा नीति में इसका बौद्धिक खाका, उसकी इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन कोई है?

बहरहाल, अब भी वक्त है। नरेंद्र मोदी को महात्मा गांधी का यह वाक्य ध्यान में रखना चाहिए कि ‘अगर मेरे हाथ में तानाशाही सत्ता हो तो मैं आज से ही विदेशी माध्यम के जरिए अपने लडक़े और लड़कियों की शिक्षा बंद कर दूं और सारे शिक्षकों और प्रोफेसरों से यह माध्यम तुरंत बदलवा दूं या उन्हें बरखास्त करा दूं। मैं पाठ्य पुस्तकों की तैयारी का इंतजार नहीं करूंगा। वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे पीछे चली आएंगी’। हिंदी, ‘इंटेलेक्चुअल स्पेस’, सरकारी नौकर नहीं बनाने जैसे जुमलों में यदि प्रधानमंत्री मोदी तनिक भी कुछ कर दिखाएं तो कोई काम तो स्थायी तौर पर खाते में दर्ज होगा!

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