नई दिल्ली। देवदार के घने जंगलों और जटागंगा नदी के किनारे बसा जागेश्वर धाम अपनी प्राचीन मंदिरों और धार्मिक मान्यताओं के लिए खास पहचान रखता है. यहां करीब 125 छोटे-बड़े मंदिरों का समूह श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. भगवान शिव के बाल जागेश्वर स्वरूप और महामृत्युंजय मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के कारण देशभर से भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. शांत प्राकृतिक वातावरण के बीच सदियों पुरानी मंदिर वास्तुकला जागेश्वर धाम को धार्मिक आस्था के साथ पर्यटन के लिहाज से भी खास बनाती है.
कुमाऊं के अल्मोड़ा जिले में देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित जागेश्वर धाम कुमाऊं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है. शांत और प्राकृतिक वातावरण के कारण यहां पहुंचते ही श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति होती है. जटागंगा नदी के किनारे बसे इस धाम में प्राचीन पत्थर से निर्मित अनेक मंदिर श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं. यहां करीब 125 छोटे-बड़े मंदिरों का समूह बताया जाता है.
जागेश्वर धाम को लेकर धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में कई मान्यताएं प्रचलित हैं. श्रद्धालुओं की आस्था है कि यह क्षेत्र भगवान शिव के नागेश स्वरूप और प्रथम शिवलिंग से जुड़ा हुआ है. यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से शिव भक्त यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. मंदिर परिसर में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों की पूजा होती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार जागेश्वर क्षेत्र में शिव आराधना करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है.
पंडित कैलाश उपाध्याय बताते हैं कि जागेश्वर धाम में भगवान शिव के बाल स्वरूप बाल जागेश्वर की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. धार्मिक आस्था के अनुसार यहां भगवान शिव को बाल रूप में पूजने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है. मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालु भगवान बाल जागेश्वर के दर्शन कर सुख-समृद्धि और मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं. जागेश्वर की धार्मिक पहचान केवल बड़े मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां अलग-अलग शिव स्वरूपों से जुड़े मंदिर भी हैं.
जागेश्वर धाम की पहचान कई पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है. सप्तऋषियों ने इसी क्षेत्र में भगवान शिव की आराधना और तपस्या की थी. मान्यता है कि ऋषियों की तपस्या के कारण यह क्षेत्र सदियों से शिव साधना का प्रमुख केंद्र रहा है. देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित प्राचीन मंदिर इस धार्मिक वातावरण को और खास बनाते हैं. यहां आने वाले श्रद्धालु मंदिरों में पूजा-अर्चना के साथ आसपास के शांत प्राकृतिक वातावरण का भी अनुभव करते हैं.
जागेश्वर मंदिर समूह में महामृत्युंजय मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. इसे धाम के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल किया जाता है. मंदिर में भगवान शिव के महामृत्युंजय स्वरूप की पूजा की जाती है. श्रद्धालु यहां स्वास्थ्य, दीर्घायु और अकाल मृत्यु से मुक्ति की कामना के साथ विशेष पूजा-अर्चना और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करवाते हैं. मंदिर की प्राचीन वास्तुकला भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है. दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं.
जागेश्वर धाम का संबंध केवल स्थानीय धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है. धार्मिक परंपरा के अनुसार स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण में भी जागेश्वर क्षेत्र का उल्लेख मिलता है. इन ग्रंथों से जुड़े धार्मिक संदर्भो के कारण इस स्थान की महत्ता और बढ़ जाती है. सदियों पुराने मंदिर यहां की प्राचीन धार्मिक और स्थापत्य परंपरा की झलक दिखाते हैं. देवदार के जंगलों से घिरे इस मंदिर समूह में अलग-अलग आकार और शैली के कई मंदिर मौजूद हैं.
जागेश्वर धाम जटागंगा नदी के तट पर स्थित है. नदी, देवदार के जंगल और प्राचीन मंदिर मिलकर यहां का वातावरण बेहद शांत और आध्यात्मिक बनाते हैं. धार्मिक मान्यता के कारण जटागंगा तट पर विभिन्न पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड भी किए जाते हैं. जागेश्वर को अंतिम संस्कार और मोक्ष से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी श्रद्धा का केंद्र माना जाता है. मंदिर परिसर में पहुंचने वाले श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के साथ नदी तट पर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं.
जागेश्वर धाम पहुंचने वाले श्रद्धालु सबसे पहले मंदिर समूह के प्रमुख मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं. इसके बाद बाल जागेश्वर मंदिर और महामृत्युंजय मंदिर में पूजा-अर्चना करना विशेष माना जाता है. श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार महामृत्युंजय जाप और अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी करवा सकते हैं. मंदिर परिसर में घूमते समय प्राचीन पत्थर की वास्तुकला और देवदार के जंगलों की सुंदरता देखी जा सकती है. जटागंगा नदी के आसपास भी शांत वातावरण का आनंद लिया जा सकता है.







