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Home राष्ट्रीय

लोक सेवकों के चयन का इतना हल्ला क्यों

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 11, 2022
in राष्ट्रीय
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हरिशंकर व्यास

राज्यसभा चुनाव के अलावा जिस बात की इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा है वह लोक सेवकों का चयन है। संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी के जरिए अखिल भारतीय सेवाओं के 685 अधिकारियों का चयन हुआ है। इसमें आईएएस, आईएफएस, आईपीएस और अन्य अधिकारी हैं। यानी इसमें चुने गए लडक़े-लड़कियां आगे कलेक्टर, एसपी बनेंगे। हर तरफ इसकी चर्चा है। अमुक प्रतिभागी ने अमुक जगह से पढ़ाई की। अमुक संस्थान ने उसकी मदद की। अमुक प्रतिभागी अमुक जाति का है या अमुक राज्य का है। हर राज्य के लोग सोशल मीडिया में झूठी-सच्ची सूची प्रकाशित कर रहे हैं कि उसके राज्य से कितने ज्यादा प्रतिभागियों का चयन हुआ। कोचिंग कराने वाले संस्थान अलग श्रेय लेने की होड़ में हैं। एक ही चयनित प्रतिभागी का नाम एक दर्जन संस्थानों की ओर प्रकाशित पोस्टर में दिख रहा है। चुने गए प्रतिभागी इंटरव्यू दे रहे हैं कि कैसे बचपन से उनका सपना था कि आईएएस या आईपीएस बनें और देश व समाज की सेवा करें।
सोचें, इस सेवा में चुने गए अधिकारी क्या समाज सेवा करेंगे या देश के विकास में क्या योगदान करेंगे? सोचें, अमेरिका या यूरोप के देशों में जहां सिविल सेवा की ऐसी परीक्षा नहीं होती है या आईएएस, आईपीएस अधिकारी नहीं बनते हैं क्या वहां लोगों की सेवा नहीं होती है या देश तरक्की नहीं करता है? दुनिया के किसी और देश में ऐसा सुनने को नहीं मिलता है कि अमुक सेवा के लिए चुना जाना बहुत महान बात है। यह भी नहीं सुनने को मिलता है किसी के किसी खास सेवा में चुन लिए जाने पर राज्य और जातियों के लोग अपने को गौरवान्वित महसूस करें। वहां लोगों की उपलब्धियों पर तो गौरवान्वित महसूस करने का चलन है। भारत एकमात्र देश होगा, जहां किसी व्यक्ति के किसी नौकरी के लिए चुन लिए जाने को उपलब्धि माना जाता है। वह सरकार का नौकर लग गया तो यह बड़ी उपलब्धि है- उस व्यक्ति के लिए भी, उसकी जाति के लिए भी, उसके पड़ोसियों के लिए भी और उसके जिले और राज्य के लिए भी।

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सोचें, यह कैसी बेसिर-पैर की बात है। अगर किसी सेवा का कोई व्यक्ति कोई ऐसा काम करता है, जिससे देश और समाज को फायदा हो तब उस पर गौरवान्वित हुआ जा सकता है लेकिन किसी खास नौकरी के लिए चुन लिए जाने में क्या गौरव की बात है? भारत में है क्योंकि उस नौकरी में शाही ठाठ जुड़ा हुआ है। कहने को इस नौकरी का नाम लोक सेवा है लेकिन इसके अधिकारी नौकर नहीं, बल्कि मालिक होते हैं। यह अनायास नहीं है कि अंग्रेज के जमाने में जिसे कलेक्टर कहा जाता था और जिसका काम राजस्व संग्रह करना था वह आजाद भारत के शासन में जिलाधिकारी या जिलाधीश बन गया। खुद आईएएस अधिकारी रहे लेखक श्रीलाल शुक्ल ने एक जगह लिखा कि कलेक्टर या डीएम का अनुवाद जिलाधीश पढ़ कर ऐसा लगता है, जैसे वह चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का वंशज हो और एक खास जिले पर राज कर रहा हो। लेकिन वास्तव में कलेक्टर को जिले का मालिक ही कहा जाता है और वह राज ही करता है। इसलिए उसके चुने जाने पर ऐसा माहौल बनता है।

इसके बावजूद सवाल है कि जिले का मालिक बन कर वह क्या तीर मार लेता है? देश में इस समय हजारों आईएएस और आईपीएस नौकरी कर रहे हैं लेकिन कहां, किसके काम में, क्या मौलिकता देखने को मिल रही है? कहां के कलेक्टर ने किस जिले की तकदीर बदल दी? कहां कलेक्टर से प्रमोशन पाकर राज्य सरकार या भारत सरकार का सचिव बने किसी अधिकारी ने राज्य का देश की तकदीर बदलने वाला काम किया? चाहे जिले का कलेक्टर हो या भारत सरकार का सचिव हो, उसका काम सिर्फ यस सर करना है और सरकार की नीतियों को जैसे तैसे लागू करना है। इसी में वह आम नागरिकों पर अपना रुआब-रूतबा दिखा लेता है। लोग उसके तामझाम से या तो आतंकित होते हैं या प्रभावित होते हैं। उसके ठाठ देख कर और लोक सेवक के नाते हासिल सुविधाएं देख कर लोग अपने बच्चों को भी वैसा बनाने की कोशिश में लगते हैं।

यह समझने की बात है कि जैसे किसी के सांसद या विधायक बन जाने से उसकी निजी स्थिति में होने वाले बदलाव के अलावा किसी खास जाति, समाज या देश की स्थिति में कोई बदलाव नहीं होता है वैसा ही मामला आईएएस, आईपीएस अधिकारियों का भी है। इस सेवा में चयनित होने के बाद उनका अपना निजी जीवन बदलता है। उन्हें पद के साथ कई विशेषाधिकार मिलते हैं। वे अच्छे बंगलों में रहते हैं, साथ में गाडिय़ों का काफिला चलता है, उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, अस्पतालों में इलाज में उनको प्राथमिकता मिलती है, उनके फोन कर देने से किसी का छोटा-मोटा काम भी हो जाता है लेकिन वे देश-समाज में कोई क्रांति कर देंगे, ऐसा नहीं होता है। वे नौकरी करते हैं, हुक्म की तामील करते हैं, अच्छी पोस्टिंग-तबादले के लिए अपने आका की जी-हुजूरी करते हैं और आम लोगों पर ताकत की जोर आजमाइश करते हैं।

नरेंद्र मोदी के राज में उनकी स्थिति और भी खराब हुई है। खुद प्रधानमंत्री ने संसद में खड़े होकर कहा कि आईएएस हो गया तो क्या, सारे काम वहीं करेगा। उन्होंने लैटरल एंट्री के जरिए बाहर के विशेषज्ञों को लाकर सीधे भारत सरकार का संयुक्त सचिव बनाना शुरू किया है। उनके राज में अखिल भारतीय सेवा के पदों की संख्या भी लगातार कम हो रही है। मनमोहन सिंह जब हटे थे उस साल यूपीएससी के जरिए कुल 11 सौ से ज्यादा प्रतिभागी चुने गए थे और इस साल 685 चुने गए हैं। आने वाले दिनों में यह संख्या और कम होगी। लेकिन यह संख्या जितनी कम होती जाएगी, इसका क्रेज उतना ही बढ़ता जाएगा। तब इसके नतीजों की हाइप और बनेगी।

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