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एनसीईआरटी की 8वीं की किताब में मुस्लिम शासकों का चित्रण, इतिहास की नई व्याख्या या सांप्रदायिक विवाद?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 17, 2025
in राष्ट्रीय
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मुगल शासकों के क्रूर चित्रण
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प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर


नई दिल्ली: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक, एक्सप्लोरिंग सोसाइटी… इंडिया एंड बियॉन्ड (पार्ट 1), में दिल्ली सल्तनत और मुगल शासकों के चित्रण को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ है। इस किताब में मुस्लिम शासकों, विशेष रूप से बाबर, अकबर और औरंगजेब, को “क्रूर” और “धार्मिक रूप से असहिष्णु” के रूप में चित्रित किया गया है, जो पहले की पाठ्यपुस्तकों से काफी अलग है। यह किताब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे (एनसीएफ-एसई) 2023 के तहत तैयार की गई है।

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विवाद मुस्लिम शासकों का चित्रण

किताब में बाबर को “क्रूर और निर्मम विजेता” बताया गया है, जो “शहरों की पूरी आबादी को मार डालता था, महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाता था, और लूटी गई जगहों पर खोपड़ियों के ढेर बनवाने पर गर्व करता था।” यह चित्रण बाबर के आत्मकथात्मक ग्रंथ बाबरनामा के कुछ हिस्सों पर आधारित है, लेकिन इसे कुछ इतिहासकार चुनिंदा और संदर्भ से बाहर मानते हैं।

अकबर के शासन को “क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण” कहा गया है। किताब में 1568 के चित्तौड़गढ़ नरसंहार का उल्लेख है, जहां हजारों लोग मारे गए थे। साथ ही, यह भी कहा गया है कि अकबर ने बाद में विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णुता दिखाई, लेकिन गैर-मुस्लिमों को प्रशासन के उच्च पदों पर कम अवसर दिए गए।

औरंगजेब को मंदिरों और गुरुद्वारों को तोड़ने वाला बताया गया है। किताब में बनारस, मथुरा, सोमनाथ और जैन मंदिरों पर उनके हमलों का जिक्र है, साथ ही यह भी उल्लेख है कि उन्होंने कुछ धार्मिक स्थलों को संरक्षण भी दिया।

जजिया को गैर-मुस्लिमों के लिए “सार्वजनिक अपमान” और “धर्मांतरण के लिए प्रोत्साहन” के रूप में वर्णित किया गया है, जो पहले की किताबों में अधिक तटस्थ रूप से प्रस्तुत किया गया था।

‘इतिहास के अंधकारमय काल’ पर नोट

किताब में एक विशेष खंड, ए नोट ऑन सम डार्कर पीरियड्स इन हिस्ट्री, शामिल किया गया है, जो “क्रूर हिंसा, दुराचारी शासन और सत्ता की गलत महत्वाकांक्षाओं” के ऐतिहासिक मूल को समझने की बात करता है। इसमें यह भी कहा गया है कि “आज के लोग अतीत की घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।” एनसीईआरटी का कहना है कि यह नोट इतिहास को संतुलित और तथ्य-आधारित रूप से प्रस्तुत करने के लिए जोड़ा गया है, ताकि छात्र अतीत से सबक ले सकें।

पहले की किताबों से अंतर

पहले, कक्षा 7 की पाठ्यपुस्तक में दिल्ली सल्तनत और मुगल काल का परिचय दिया जाता था, लेकिन उनमें मंदिरों पर हमलों या शासकों की क्रूरता का जिक्र न्यूनतम था। नई कक्षा 8 की किताब में पहली बार इन विषयों को विस्तार से शामिल किया गया है। इसके विपरीत, कक्षा 7 की नई पाठ्यपुस्तक से मुगल और दिल्ली सल्तनत के सभी उल्लेख हटा दिए गए हैं, और गुप्त काल तक की ही जानकारी दी गई है।

किताब में शिवाजी और मराठा साम्राज्य को सकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है। शिवाजी को “मास्टर रणनीतिकार और सच्चा दूरदर्शी” बताया गया है, जिन्होंने हिंदू मूल्यों को बनाए रखते हुए अन्य धर्मों का सम्मान किया। सिख गुरुओं, विशेष रूप से औरंगजेब के समय में धार्मिक उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध करने वालों के रूप में उल्लेख किया गया है।

मुस्लिम समुदाय की आपत्ति

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमपीएलबी) के मोहम्मद सुलेमान ने इन बदलावों को “ऐतिहासिक तथ्यों का विरूपण” बताया और कहा कि बाबर और औरंगजेब जैसे शासकों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। उन्नाव के मौलाना निसार अहमद मिस्बाही ने इसे “जबरन बदनामी” करार देते हुए कहा कि इतिहास को जैसा था, वैसा ही प्रस्तुत करना चाहिए, न कि उसे गलत तरीके से गढ़ा जाना चाहिए।

सिख समुदाय का समर्थन

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (डीएसजीएमसी) के महासचिव जगदीप सिंह काहलोन ने बदलावों का समर्थन किया और कहा कि “मुगल शासकों की क्रूरता की सच्चाई को युवा पीढ़ी तक पहुंचाना चाहिए।”

एनसीईआरटी के पाठ्यचर्या समूह के प्रमुख मिशेल डैनिनो ने द हिंदू को बताया कि किताब में अकबर और औरंगजेब जैसे शासकों को “राक्षसीकरण” नहीं किया गया है, बल्कि उनके अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं को दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास को “स्वच्छ” नहीं किया जा सकता, और इसमें उज्ज्वल और अंधकारमय दोनों काल शामिल हैं। कुछ इतिहासकारों और विपक्षी दलों ने इन बदलावों को “सांप्रदायिक” और “हिंदू राष्ट्रवादी” एजेंडे से प्रेरित बताया है, जो भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।

एनसीईआरटी का बयान

एनसीईआरटी ने कहा कि “किताब में दी गई जानकारी तथ्य-आधारित और संतुलित है, जो प्रख्यात स्रोतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य छात्रों को इतिहास के प्रति एक निष्पक्ष दृष्टिकोण देना है, ताकि वे अतीत से सबक ले सकें।”

एनसीईआरटी ने यह भी स्पष्ट किया कि “यह किताब केवल पार्ट 1 है और पार्ट 2 जल्द ही जारी होगा, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उसमें मुगल और सल्तनत के हटाए गए हिस्सों को शामिल किया जाएगा या नहीं।”

पहले के बदलाव

एनसीईआरटी ने पहले भी पाठ्यपुस्तकों में बदलाव किए हैं, जैसे कि कक्षा 7 और 12 से मुगल और दिल्ली सल्तनत के कुछ हिस्सों को हटाना, 2002 के गुजरात दंगों का उल्लेख हटाना, और महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित हिंदू चरमपंथियों के उल्लेख को हटाना। इन बदलावों को भी “सैफ्रनाइजेशन” और “इतिहास को फिर से लिखने” के प्रयास के रूप में देखा गया है।

विपक्षी दलों ने इन बदलावों को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे से जोड़ा है, जिसका उद्देश्य मुस्लिम शासकों के योगदान को कम करना और हिंदू शासकों को बढ़ावा देना है। ये बदलाव एनईपी 2020 और एनसीएफ-एसई 2023 के तहत किए गए हैं, जो भारतीय परंपराओं, दर्शन और स्थानीय ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने पर जोर देते हैं।

इतिहास के चुनिंदा प्रस्तुतीकरण

एनसीईआरटी की नई कक्षा 8 की किताब में मुगल और दिल्ली सल्तनत के शासकों के चित्रण ने एक तीखा विवाद खड़ा कर दिया है। जहां कुछ लोग इसे ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाने का प्रयास मानते हैं, वहीं अन्य इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और इतिहास के चुनिंदा प्रस्तुतीकरण के रूप में देखते हैं। किताब का उद्देश्य इतिहास को निष्पक्ष और तथ्य-आधारित रूप से प्रस्तुत करना है, लेकिन इसका चित्रण और कुछ समुदायों की प्रतिक्रियाएं इसकी व्याख्या पर गहरे मतभेदों को दर्शाती हैं।

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