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Home राष्ट्रीय

गिरते रुपये को थामने के लिए RBI ने बढ़ाया हाथ, बनाया मास्टर प्लान

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
October 7, 2025
in राष्ट्रीय, व्यापार
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नई दिल्ली. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मंगलवार को रुपये को गिरने से बचाने के लिए एक अहम कदम उठाया. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, RBI ने डॉलर-रुपया बाय/सेल स्वैप (Buy/Sell Swap) के जरिए विदेशी मुद्रा बाजार (forex market) में दखल दिया. इस कार्रवाई के बाद रुपये की कीमत 88.77 प्रति डॉलर पर टिकी रही, जो उसके सर्वकालिक निचले स्तर 88.80 के बेहद करीब थी.

ट्रेडर्स का कहना है कि RBI ने एक साथ स्पॉट मार्केट और फॉरवर्ड मार्केट में दखल देकर डॉलर की उपलब्धता और रुपये की स्थिरता दोनों को नियंत्रित करने की कोशिश की. जानिए आखिर ये ‘बाय/सेल स्वैप’ होता क्या है और इससे कैसे रुकती है रुपये की गिरावट.

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क्या होता है RBI का ‘डॉलर-रुपया बाय/सेल स्वैप’

‘बाय/सेल स्वैप’ एक ऐसा सौदा होता है जिसमें RBI अभी के समय में (स्पॉट मार्केट में) डॉलर खरीदता है, लेकिन साथ ही यह तय कर लेता है कि भविष्य की किसी तारीख पर (फॉरवर्ड मार्केट में) वही डॉलर वापस बेच देगा. सीधे शब्दों में कहें तो यह एक तरह का टेंपरेरी ट्रांजेक्शन होता है, जिसका मकसद बाजार में अचानक आई डॉलर की मांग को पूरा करना और रुपये पर दबाव को कम करना होता है.

इस प्रक्रिया में RBI न तो स्थायी रूप से डॉलर जमा करता है और न ही अपनी विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ा बदलाव लाता है. बस इतना सुनिश्चित करता है कि डॉलर की कमी से रुपया कमजोर न पड़े.

इससे रुपये की गिरावट कैसे रुकती है

जब बाजार में डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है, जैसे तेल कंपनियां, इंपोर्टर्स या फॉरेन इन्वेस्टर्स एक साथ डॉलर खरीदने लगते हैं, तो डॉलर की कीमत बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है.

ऐसे समय में RBI बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ाकर डॉलर की कीमत को स्थिर रखता है. अगर RBI डॉलर बेचता है तो बाजार में डॉलर की भरमार हो जाती है और रुपया संभल जाता है. अगर RBI ‘बाय/सेल स्वैप’ करता है, तो वह अस्थायी तौर पर डॉलर खरीदता है लेकिन भविष्य में बेचने का वादा करता है. इससे बाजार में भरोसा बनता है कि RBI रुपया कमजोर नहीं होने देगा, जिससे ट्रेडर्स रुपये पर सट्टा लगाना कम कर देते हैं.

फॉरवर्ड प्रीमियम क्यों घटा

RBI की इस स्वैप कार्रवाई के बाद डॉलर-रुपया फॉरवर्ड प्रीमियम यानी भविष्य के सौदों पर ब्याज दरें कम हो गईं. 1-वर्षीय इम्प्लाइड यील्ड 6 बेसिस पॉइंट गिरकर 2.23% पर आ गई, जो एक महीने में सबसे निचला स्तर है. यह संकेत देता है कि बाजार को भरोसा है कि RBI स्थिति पर नियंत्रण रखेगा और आने वाले समय में रुपये में बड़ी गिरावट की संभावना नहीं है.

क्यों जरूरी है RBI की ये दखलअंदाजी

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और डॉलर पर निर्भरता काफी ज्यादा है. ऐसे में डॉलर का महंगा होना सीधा असर महंगाई और आयात लागत पर डालता है. RBI के समय रहते कदम उठाने से एक ओर रुपये की स्थिरता बनी रहती है, तो दूसरी ओर विदेशी निवेशकों को भी भरोसा मिलता है कि भारतीय बाजार में वोलैटिलिटी सीमित रहेगी.

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