नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले के जरिए चुनावों के दौरान बिना हिसाब-किताब वाले कैश के इस्तेमाल पर रोक लगाने को लेकर निर्देश जारी किए. उसका कहना है कि चुनावों में काला धन लोकतंत्र को भ्रष्ट करता है. चुनाव के दौरान में काले धन और अन्य प्रलोभनों के इस्तेमाल पर सख्ती की बात करते हुए कोर्ट ने चुनावी अपराधों की जांच एक साल के अंदर पूरी करने का निर्देश दिया. साथ ही, हाई कोर्ट से यह भी कहा कि वे इस तरह के मामलों के जल्द निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट बनाएं और उम्मीदवारों के खिलाफ केस वापस लेने से पहले उनकी मंजूरी अनिवार्य कर दी.
जस्टिस संजय करोल और एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने उन अधिकारियों को भी निर्देश दिया, जिन्होंने चुनावी अपराध से जुड़े होने का शक होने पर कैश या दूसरी संपत्ति जब्त की है. वे जब्ती की रिपोर्ट 24 घंटे के अंदर अधिकार क्षेत्र के तहत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या सक्षम कोर्ट को दें. साथ ही, वे इस बारे में अपराध के साथ जुड़े होने के संबंध में लिखित में कारण भी बताएं.
2015 से जुड़े मामले की सुनवाई
कोर्ट ने ये निर्देश 2015 के कर्नाटक हाई कोर्ट के एक आदेश से जुड़ी अपील पर फैसला करते हुए दिए. इस आदेश में बेल्लारी से 2014 के लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार प्रतीक परसरामपुरिया के खिलाफ FIR रद्द कर दी गई थी. FIR एक रेड के बाद दर्ज कराई गई थी, जिसमें 20.48 लाख रुपये कैश, एक लैपटॉप, चेक बुक, कुछ चेक के पन्ने निकले हुए एक पेन ड्राइव ज़ब्त किए गए थे.
उन पर आरोप था कि यह पैसा वोटरों को रिश्वत के रूप में देने के लिए आया था. हाई कोर्ट ने इस आधार पर FIR रद्द कर दी थी कि शिकायत में यह नहीं बताया गया कि आरोपी किसे रिश्वत देना चाहता था या कथित रिश्वतखोरी किस तरह से अंजाम तक जानी थी.
केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब
अपील पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में पैसे के धड़ल्ले से इस्तेमाल होने और मामले को बड़ी सिस्टमिक समस्या बताते हुए जांच करने के लिए कार्यवाही को बढ़ाया और चुनाव आयोग के साथ-साथ केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है. साथ ही कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल और एडवोकेट स्वप्निल त्रिपाठी को कोर्ट की मदद के लिए एमिसी क्यूरी नियुक्त किया.
बेंच का कहना है कि वोटिंग प्रक्रिया ही नागरिकों के लिए शासन को प्रभावित करने का एकमात्र सीधा मौका है, और अगर यह विकल्प भी बाहरी प्रभावों से प्रभावित होता है, तो “लोकतंत्र का मूल सार” खतरे में पड़ सकता है. ऐसे फैक्टर्स से चुनाव पर असर पड़ता है.”
चुनावों में पैसे की बढ़ती ताकत चिंतनीय
कोर्ट ने चुनावों में पैसे की ताकत को लेकर चिंताओं के बीच कई दशकों के चुनावी सुधार की कोशिशों से जोड़ा, जबकि बेंच के सामने रखे गए चुनाव आयोग के आंकड़ों ने समस्या के विकराल रूप को भी दिखाया. 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए, 3,87,430 FIR दर्ज की गईं. जिसमें 1,66,044 मामलों में सजा हुई, जबकि 1,06,841 केसों में ट्रायल पेंडिंग थी, 7,930 की जांच चल रही थी, और 76,987 क्लोजर रिपोर्ट फाइल की गई थीं. इस तरह से सजा मिलने की दर 42.9% है.
कोर्ट ने खास तौर पर चुनाव से जुड़े केसों के पेंडिंग रहने और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के बाद ऐसे मामलों के वापस लिए जाने की संभावना को लेकर चिंता जताई. चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया था कि चुनाव से जुड़े केस राज्य सरकारों की जिम्मेदारी होती है और सरकार बदलने के बाद एकतरफा मामले वापस लेना एक “समस्या वाली सच्चाई” है.
चुनाव आयोग ने पहले आगाह किया था कि रिश्वत से जुड़े गंभीर मामलों को भी कभी-कभी वापस लेने की कोशिश की जाती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि चुनाव में गलती करने वाले लोग बिना किसी सजा के काम कर सकते हैं क्योंकि बाद में ये सब केस वापस लिए जा सकते हैं.
उम्मीदवारों को सुरक्षा देना जरूरी
अब सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के केसों को वापस लेने पर न्यायिक रोक लगाने की बात कही है. बेंच ने अपने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा, “किसी खास चुनाव साइकिल में उम्मीदवारों के खिलाफ केस वापस लेने के लिए, संबंधित हाई कोर्ट की मंजूरी जरूरी है.”
बेंच ने यह भी कहा कि उम्मीदवारों को यह सुरक्षा देना जरूरी है क्योंकि इससे उम्मीदवारों और होने वाले उम्मीदवारों को क्रिमिनल केस के मामले में वर्तमान सांसदों और विधायकों को बराबर दर्जा मिलेगा. बेंच ने कहा कि एक बार केस शुरू होने के बाद, सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की वजह से वे इस प्रक्रिया से बच नहीं पाएंगे.
कोर्ट ने यह आदेश भी जारी किया कि जांच करने वाले अधिकारी FIR दर्ज होने के एक साल के अंदर जांच पूरी करने की हर मुमकिन कोशिश करें. अगर डेडलाइन टूटती है, तो इससे जुड़े वजहों को दर्ज किया जाना चाहिए और इस बारे में चुनाव आयोग को जानकारी दी जाए. जांच करने वाले अधिकारियों को संबंधित सीनियर अधिकारियों की मंजूरी मिलने के बाद, नोडल अधिकारी के जरिए आयोग को ऐसी जांचों पर हर 3 महीने में स्टेटस रिपोर्ट भी जमा करनी होगी.
बेंच ने आगे यह निर्देश भी दिया कि जब स्टैटिक सर्विलांस टीमें 10 लाख रुपये से अधिक के कैश का पता लगाएं, तो इसकी जानकारी इनकम-टैक्स अधिकारियों को दी जानी चाहिए.
केस चलाने के बारे में कोर्ट ने कहा कि हर 5 साल में होने वाले चुनाव चक्र को देखते हुए, उम्मीदवारों और मौजूदा सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ इस तरह के केसों को तेजी से निपटाने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए. कोर्ट ने हाई कोर्ट्स को यह भी निर्देश दिया कि वे इस तरह के केसों की जल्द सुनवाई और निपटारे के लिए अपनी-अपनी प्रक्रियाओं के अनुसार कोर्ट्स तय करें.







