नई दिल्ली। फिल्मी दुनिया में अक्सर बड़े बजट, बड़े सितारे और बड़े प्रचार को सफलता की गारंटी माना जाता है। लेकिन कभी-कभी कोई ऐसी फिल्म सामने आती है, जो तमाम स्थापित धारणाओं को पीछे छोड़ते हुए दर्शकों के दिल में अपनी जगह बना लेती है। ऐसी ही कहानी इन दिनों फिल्म ‘हनुमान अंश’ की चर्चा में है। आइए विस्तार में एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से समझते हैं।
महज करीब 2 करोड़ रुपये के बजट में तैयार हुई इस फिल्म ने लगभग 50 करोड़ रुपये की कमाई का आंकड़ा छू लिया है। फिल्म की यह सफलता इसलिए भी खास मानी जा रही है, क्योंकि इसकी शुरुआत बहुत तेज नहीं रही थी। शुरुआती दिनों में फिल्म की रफ्तार सामान्य दिखाई दे रही थी, लेकिन धीरे-धीरे दर्शकों की प्रतिक्रिया बढ़ती गई और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। फिल्म के सामने बड़ी और चर्चित फिल्मों की मौजूदगी के बावजूद ‘हनुमान अंश’ का लगातार बेहतर प्रदर्शन करना फिल्म इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बन गया है।
किताब से फिल्म तक का सफर
‘हनुमान अंश’ की कहानी के पीछे निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी की एक लंबी रचनात्मक यात्रा बताई जाती है। बाबा नीम करोली से जुड़े अनुभवों और विचारों को उन्होंने अपनी किताब ‘डिवाइन डीटूर’ में शब्दों का रूप दिया था। इसी विषय को उन्होंने बाद में फिल्म के माध्यम से बड़े पर्दे तक पहुंचाने का प्रयास किया।
किसी पुस्तक की विचारधारा को फिल्म में बदलना आसान नहीं होता। खासकर तब, जब कहानी आस्था, आध्यात्मिकता और व्यक्तिगत अनुभवों से जुड़ी हो। ऐसे विषयों को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए कहानी, भावनाओं और दृश्य माध्यम के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होती है। डॉ. विशाल चतुर्वेदी ने इसी विचार को फिल्म के माध्यम से दर्शकों के सामने रखने की कोशिश की और अब फिल्म की बॉक्स ऑफिस सफलता उनके इस प्रयास को एक अलग पहचान दे रही है।
2 करोड़ से 50 करोड़ तक पहुंचना क्यों है खास ?
फिल्म का करीब 2 करोड़ रुपये के बजट में बनना और उसके मुकाबले लगभग 50 करोड़ रुपये का कारोबार करना इसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जा रहा है। इसका मतलब यह है कि फिल्म ने अपने शुरुआती निवेश की तुलना में कई गुना अधिक कारोबार किया है।
हालांकि बॉक्स ऑफिस कलेक्शन और वास्तविक मुनाफे की गणना अलग-अलग होती है, क्योंकि इसमें थिएटर शेयर, प्रचार, वितरण और अन्य खर्च शामिल होते हैं। फिर भी सीमित बजट में बनी किसी फिल्म का इस स्तर तक पहुंचना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस सफलता का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि फिल्म ने केवल बड़े स्टार सिस्टम पर निर्भर रहने के बजाय कहानी, विषय और दर्शकों की भावनात्मक प्रतिक्रिया के सहारे अपनी जगह बनाई है।
धीमी शुरुआत के बाद बदली तस्वीर
‘हनुमान अंश’ की शुरुआत भले ही अपेक्षाकृत धीमी रही हो, लेकिन इसके बाद फिल्म ने जिस तरह से गति पकड़ी, उसने निर्माताओं और फिल्म से जुड़े लोगों को भी उत्साहित कर दिया। कई बार फिल्मों की किस्मत पहले सप्ताह के प्रदर्शन से तय मानी जाती है, लेकिन कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनका प्रचार दर्शकों की प्रतिक्रिया से होता है। ‘हनुमान अंश’ के मामले में भी दर्शकों के बीच चर्चा बढ़ने के साथ फिल्म के प्रति रुचि बढ़ती दिखाई दी। यही वजह है कि फिल्म की कमाई ने धीरे-धीरे एक ऐसा आंकड़ा हासिल किया, जिसकी शायद शुरुआत में किसी ने कल्पना नहीं की होगी।
निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी हुए भावुक
फिल्म की सफलता निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी के लिए सिर्फ बॉक्स ऑफिस का आंकड़ा नहीं है। यह उनके लिए उस यात्रा का परिणाम है, जिसकी शुरुआत उनकी किताब ‘डिवाइन डीटूर’ से हुई थी। फिल्म के प्रदर्शन और दर्शकों की प्रतिक्रिया को लेकर वह भावुक नजर आए। उनके अनुसार, जिस विषय और भावना को लेकर उन्होंने यह यात्रा शुरू की थी, उसका इतने बड़े स्तर पर दर्शकों तक पहुंचना उनके लिए बेहद विशेष अनुभव है।
उन्होंने इसे “चमत्कार” बताया है। उनकी भावनाओं को समझें तो यह केवल एक फिल्म की सफलता नहीं, बल्कि उस विश्वास की सफलता भी है, जिसके साथ उन्होंने इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया।
प्रकाश मेहरा की नजर में क्यों महत्वपूर्ण है ‘हनुमान अंश’ की सफलता ?
एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा के विचार से देखें तो ‘हनुमान अंश’ की सफलता को सिर्फ 50 करोड़ रुपये के आंकड़े तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह फिल्म उस आस्था और विश्वास की ताकत को भी सामने लाती है, जो लाखों लोगों के दिलों में हनुमान जी के प्रति जुड़ी है। आज के दौर में जब फिल्मों के प्रचार पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं और बड़े सितारों की लोकप्रियता को सफलता का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, ऐसे समय में सीमित बजट की फिल्म का दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाना एक महत्वपूर्ण संकेत है।
प्रकाश मेहरा के अनुसार, ‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी ताकत यह है कि “फिल्म ने दर्शकों के उस भावनात्मक पक्ष को छुआ है, जिसे केवल बड़े बजट या बड़े सितारों के जरिए हासिल नहीं किया जा सकता।
उनका मानना है कि “भारतीय दर्शकों के लिए आस्था और आध्यात्मिकता केवल मनोरंजन का विषय नहीं है। यह उनके जीवन और भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ विषय है। जब कोई फिल्म इस भावना को संवेदनशील तरीके से पर्दे पर प्रस्तुत करती है, तो उसके और दर्शकों के बीच एक अलग तरह का जुड़ाव बन सकता है।
प्रकाश मेहरा के मुताबिक, इस फिल्म की सफलता छोटे और मध्यम बजट के फिल्म निर्माताओं के लिए भी एक सकारात्मक संदेश है। यदि विषय मजबूत हो, प्रस्तुति प्रभावी हो और फिल्म दर्शकों की भावनाओं से जुड़ने में सफल हो, तो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है।
क्या ‘हनुमान अंश’ एक नई उम्मीद है ?
‘हनुमान अंश’ की सफलता को निश्चित रूप से एक उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। यह उन फिल्म निर्माताओं के लिए उम्मीद पैदा करती है जो बड़े बजट और बड़े सितारों के बिना अपनी कहानी दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं।
फिल्म की यात्रा यह भी बताती है कि हर फिल्म की सफलता का रास्ता एक जैसा नहीं होता। कुछ फिल्मों को शुरुआत में दर्शकों का उतना समर्थन नहीं मिलता, लेकिन सकारात्मक प्रतिक्रिया और माउथ-टू-माउथ प्रचार के जरिए वे धीरे-धीरे मजबूत होती जाती हैं। ‘हनुमान अंश’ के साथ भी यही कहानी सामने आती है—धीमी शुरुआत, बढ़ती दर्शक रुचि और फिर बॉक्स ऑफिस पर तेजी।
आस्था, सिनेमा और दर्शकों का जुड़ाव
भारतीय सिनेमा में धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर फिल्में पहले भी बनती रही हैं। लेकिन हर फिल्म दर्शकों के बीच समान प्रभाव नहीं छोड़ती। ‘हनुमान अंश’ की चर्चा इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यह एक ऐसी रचना के रूप में सामने आई है, जिसकी जड़ें साहित्य और व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव से जुड़ी बताई जाती हैं।
बाबा नीम करोली से जुड़े विषय और हनुमान जी के प्रति आस्था को केंद्र में रखकर बनाई गई यह फिल्म दर्शकों के एक ऐसे वर्ग तक पहुंच रही है, जो सिनेमा में केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव भी तलाशता है।
सफलता का असली अर्थ
50 करोड़ रुपये की कमाई निश्चित रूप से फिल्म के लिए बड़ी उपलब्धि है, लेकिन ‘हनुमान अंश’ की कहानी का महत्व इससे आगे जाता है। एक तरफ यह फिल्म सीमित बजट में बनी और दूसरी तरफ इसे दर्शकों का ऐसा समर्थन मिला कि इसकी कमाई शुरुआती निवेश से कई गुना आगे निकल गई। निर्देशक के लिए यह उस विश्वास की जीत है, जिसके साथ उन्होंने किताब से फिल्म तक का सफर तय किया। डॉ. विशाल चतुर्वेदी का इसे “चमत्कार” कहना इसी भावनात्मक यात्रा को दर्शाता है।
‘हनुमान अंश’ की कहानी का संदेश !
‘हनुमान अंश’ की कहानी फिलहाल यही संदेश देती दिखाई देती है कि सिनेमा में कभी-कभी बड़े बजट से ज्यादा बड़ी कहानी, सच्ची भावना और दर्शकों से जुड़ने की क्षमता मायने रखती है। और शायद यही वजह है कि करीब 2 करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुई यह फिल्म अब 50 करोड़ रुपये की कमाई के आंकड़े तक पहुंचकर फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसी कहानी बन गई है, जिसकी चर्चा लंबे समय तक होती रहेगी।
शायद यही इस फिल्म की सबसे खूबसूरत बात है—जब भक्ति पर्दे पर कहानी बनकर उतरती है और दर्शक उसमें अपना विश्वास महसूस करने लगते हैं, तो सफलता सिर्फ बॉक्स ऑफिस की नहीं रहती, वह भावनाओं की जीत बन जाती है।
– प्रकाश मेहरा







