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तालिबान की सबसे बड़ी ताकत क्या है, जिसे रूस-अमेरिका नहीं हरा सके?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
October 13, 2025
in विश्व
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नई दिल्ली। पाकिस्तान कहने में तो अपने पड़ोसी अफगानिस्तान से काफी शक्तिशाली है। दोनों देशों की सैन्य और आर्थिक रूप से कोई तुलना नहीं की जा सकती। पाकिस्तान सैन्य शक्ति के मामले में दुनिया की 12वें स्थान पर है और जीडीपी के मामले में 40वें पर। वहीं, तालिबान शासित अफगानिस्तान की कोई रैंकिंग ही नहीं है। यह देश मुफलिसी में जिंदगी गुजार रहा है, जहां अधिकतर लोगों को दो वक्त की रोटी भी मयस्सर नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि वर्तमान में जैसे पाक-अफगान सीमा पर सैन्य झड़पें जारी हैं, अगर यह युद्ध में बदलता है तो क्या पाकिस्तान जीत जाएगा। क्या तालिबान की हार सुनिश्चित है।

पाकिस्तान के लिए आसान नहीं अफगानिस्तान को हराना

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अफगानिस्तान का इतिहास देखें, तो यह यही सीख देता है कि उसे हराना या फिर इस पर नियंत्रण रखना आसान नहीं है। अफगानिस्तान पर सोवियत संघ और अमेरिका ने भी नियंत्रण की कोशिश की थी। दशकों तक मेहनत करने के बाद भी उन्हें सिर्फ नुकसान ही उठाना पड़ा। आखिर एक ऐसा समय आया कि दुनिया की इन दोनों महाशक्तियों को अफगानिस्तान छोड़कर लौटना पड़ा। रूस और अमेरिका जैसी इन महाशक्तियों को हराने वाला कोई और नहीं, बल्कि आज अफगानिस्तान पर हुकूमत करने वाला तालिबान ही है। ऐसे में पाकिस्तान को तालिबान से पार पाना आसान नहीं होगा।

पाकिस्तान, तालिबान को हराने में अक्षम क्यों है!

तालिबान भले ही एक मुजाहिदीन फौज है, अनट्रेंड लड़ाके हैं, हथियारों की भारी कमी है, हवाई सुरक्षा नहीं है। इसके बावजूद पाकिस्तानी सेना तालिबान को हराने के काबिल नहीं मानी जा सकती। पाकिस्तान वर्तमान में अंदरूनी चुनौतियों से जूझ रहा है। लगभग हर सूबे में विद्रोह जैसे हालात हैं। खैबर पख्तूनख्वा के एक बड़े हिस्से पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का कब्जा है। बलूचिस्तान में विद्रोही बलूचों ने मोर्चा संभाला हुआ है। पाकिस्तान का पंजाब सूबा भारत से सटा हुआ है, जहां हालात कभी भी बिगड़ सकते हैं। रही बात सिंध की, तो वहां के लोग खुद को पाकिस्तानी सरकार का सताया हुआ मानते हैं। ऐसे में पाकिस्तान के अंदरूनी हालात उसे जंग करने की गवाही नहीं देते।

इस्लाम पर घर में ही घिर जाएगा पाकिस्तान

पाकिस्तान इस्लाम की बुनियाद पर बना मुल्क है, वो बात अलग है कि आज के वक्त में उसका इससे कोई वास्ता नहीं है। तालिबान भी खुद को इस्लाम का कट्टर पैरोकार बताता है। पाकिस्तान में तालिबान का समर्थन करने वालों की कोई कमी नहीं है। इनमें कई प्रभावशाली लोग हैं, जिनका अवाम पर सीधा नियंत्रण है। ऐसे में अगर तालिबान इन लोगों के जरिए पाकिस्तान पर दबाव डालता है तो पाकिस्तानी सेना के लिए मुश्किल स्थिति बन जाएगी।

तालिबान की सबसे बड़ी ताकत क्या है!

विशेषज्ञों के अनुसार, तालिबान की सबसे बड़ी ताकत रणनीतिक लचीलापन और वैचारिक एकजुटता है। इस कारण वह मुख्य धारा से कटे रहने के बावजूद खुद की वापसी कराने में सक्षम हो जाता है। इन्हीं दोनों कारणों की वजह से तालिबान दो दशक पहले सैन्य रूप से पराजित होने के बावजूद लंबे समय तक विद्रोह जारी रख पाया और अफगानिस्तान पर फिर से नियंत्रण हासिल कर पाया। तालिबान कोई न टूटने वाली मिलिट्री यूनिट नहीं है, बल्कि एक लचीला, बहुकेंद्रित नेटवर्क है जो विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल ढल सकता है। इसकी ऑपरेशनल यूनिट में एक हद तक स्वायत्तता है जिससे उन्हें हटाना मुश्किल हो जाता है। 2001 में अपने निष्कासन के बाद, तालिबान ने सुरक्षित ठिकानों से विद्रोह को निर्देशित करने के लिए क्षेत्रीय परिषदों (शूरा) के एक मजबूत ढांचे के साथ फिर से संगठित किया।

तालिबान का रणनीतिक और सैन्य कौशल

तालिबान के लड़ाके अत्यधिक प्रेरित हैं। इस कारण वे जान लेने और देने में तनिक भी देर नहीं लगाते हैं और खून के आखिरी कतरे तक लड़ने की कुव्वत रखते हैं। उनकी सैन्य रणनीति घात लगाकर हमले करने, गुरिल्ला लड़ाई में खुद को पारंगत करने की होती है। उन्होंने अपने दुश्मनों का मनोबल गिराने के लिए लक्षित हत्याओं और मनोवैज्ञानिक अभियानों सहित अघोषित युद्ध रणनीतियों का भी इस्तेमाल किया है। तालिबान आत्मघाती हमलों में भी आगे रहा है और दुश्मन को किसी भी पल चौंकाने में सक्षम है। यही कारण है कि अमेरिकी सेना, जिसे तकनीकी और ट्रेनिंग दोनों में चैंपियन माना जाता है, वो भी इनके सामने ज्यादा कुछ नहीं कर सकी।

तालिबान की वैचारिक और स्थानीय ताकत

तालिबान वैचारिक रूप से काफी शक्तिशाली है। उसे स्थानीय लोगों का भी बड़े पैमाने पर समर्थन हासिल है। तालिबान की सफलता स्थानीय शिकायतों को दूर करने की इसकी क्षमता और स्थानीय पश्तून जनजातीय संहिता (पश्तूनवाली) के साथ कट्टरपंथी देवबंदी विचारधारा के मिश्रण से उपजी है। तालिबान ने स्थानीय राजनीतिक और जातीय विभाजनों का फायदा उठाकर अपनी वैधता स्थापित की है और स्थानीय आबादी का समर्थन या अधीनता हासिल की है। तालिबान ने सूचना युद्ध की आधुनिक समझ का प्रदर्शन किया है और सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया है।

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