नई दिल्ली। बीते कुछ वर्षों से वैश्विक राजनीति में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहे हैं। इसे देखते हुए भारत ने अपनी विदेश नीति को एक नई दिशा देना शुरू कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा टैरिफ में की गई भारी बढ़ोतरी और उससे उत्पन्न संकट का मुकाबला करने के लिए भारत अब किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय दुनिया भर में अपने पार्टनरों का दायरा बढ़ा रहा है। बीते एक वर्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दर्जनों देशों का दौरा किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और वैश्विक झटकों से बचाना है। इसकी तारीफ अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी की है।
विदेश मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब बहुपक्षीय सम्मेलनों के पारंपरिक ढांचे से निकलकर प्लूरिलेटरल (Plurilateral) कूटनीति की ओर बढ़ रहा है। इसका तात्पर्य कम देशों के साथ विशिष्ट, टारगेटेड और सीधे आर्थिक के साथ-साथ रक्षा समझौतों पर तेजी से काम करना है।
मोदी ने अचानक क्यों बदली अपनी विदेश नीति
अखबार ने लिखा है- भारत के इस आक्रामक कूटनीतिक रुख की मुख्य वजह अमेरिका के साथ संबंधों में आया तनाव है। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान भारतीय उत्पादों पर भारी शुल्क लगाए। इसके बाद रूस से कच्चा तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका ने भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत का शुल्क थोप दिया। अमेरिकी प्रशासन का तर्क था कि भारत का तेल खरीदना यूक्रेन युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचा रहा है।
इसके अतिरिक्त मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य तनाव को खत्म कराने का श्रेय बार-बार लेने की ट्रंप की कोशिशों ने भी भारत को असहज किया। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार रहा है, लेकिन अमेरिका के इस अनिश्चित रवैये के कारण भारत को अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों की ओर रुख करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। साथ ही, मध्य पूर्व में ईरान संकट के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से होने वाली तेल आपूर्ति बाधित होने का खतरा मंडरा रहा है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत कच्चा तेल इसी मार्ग से आयात करता है, इसलिए नए व्यापारिक और ऊर्जा मार्गों की खोज भारत के लिए बहुत जरूरी है।
20 से अधिक देशों की यात्रा, 13 देशों के नेता भी भारत आए
पिछले एक साल में प्रधानमंत्री मोदी ने 20 से अधिक देशों की यात्राएं की हैं, जबकि दुनिया भर के 13 से अधिक नेताओं ने भारत का दौरा किया है। इन बैठकों का स्वरूप केवल औपचारिक सम्मेलनों तक सीमित न रहकर सीधे व्यापारिक सौदों जैसा रहा है। इसकी दौरान दशकों से रुकी हुई बातचीत को गति देते हुए भारत ने यूरोपीय संघ के साथ एक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) संपन्न किया। इसके तहत भारत ने कारों और वाइन पर सीमा शुल्क घटाने जैसे कड़े फैसले लिए। ब्रिटेन के साथ हुए समझौते से भारतीय परिधानों पर शुल्क कम हुआ, जबकि भारत में स्कॉच व्हिस्की जैसी वस्तुओं पर आयात शुल्क में कटौती की गई।
जर्मनी के साथ पनडुब्बी तकनीक और फ्रांस के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने पर सहमति बनी है। फ्रांस ने भारतीय छात्रों के लिए वीजा नियमों को भी आसान बनाया है। वहीं, दक्षिण कोरिया ने भारत के पोत निर्माण उद्योग में निवेश और सहायता का वादा किया है, जिससे भारत 2047 तक दुनिया के शीर्ष पांच पोत निर्माताओं में शामिल हो सके। वहीं न्यूजीलैंड के साथ समुद्री सुरक्षा और व्यापार बढ़ाने पर चार दशकों बाद ऐतिहासिक सहमति बनी। नॉर्वे ने यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के तहत भारत में 10 लाख रोजगार के अवसर सृजित करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
क्षेत्रीय संतुलन का भी रखा पूरा ध्यान
भारत अपनी पारंपरिक रणनीतिक आजादी को बनाए रखते हुए कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के साथ संबंध गाढ़े कर रहा है। मध्य पूर्व और मध्य एशिया में भी भारत अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के जरिए रूस और चीन जैसे देशों से संवाद का मार्ग खुला रखा गया है ताकि चीन को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलित किया जा सके।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत का यह नया मॉडल केवल सैद्धांतिक बयानों पर आधारित नहीं है, बल्कि इसमें ठोस आंकड़े, तय समयसीमा और आर्थिक गलियारों का निर्माण शामिल है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था होने का लाभ उठाकर खुद को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक प्रमुख केंद्र बना रहा है।







