Upgrade
पहल टाइम्स
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
No Result
View All Result
पहल टाइम्स
No Result
View All Result
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • ईमैगजीन
Home राज्य

क्या है अखिलेश का PDA फॉर्मूला, जिसके दम पर सभी 80 सीटें जीतने का भर रहे दम?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 20, 2023
in राज्य
A A
akhilesh yadav
26
SHARES
865
VIEWS
Share on FacebookShare on Whatsapp

नई दिल्ली : दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी राह पर चलकर दिल्ली के सिंहासन पर दूसरी बार विराजमान हैं, लेकिन 2024 में बीजेपी का रास्ता रोकने के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक सियासी फॉर्मूला सुझाया है, जिसे ‘पीडीए’ का नाम दिया गया है. पीडीए का मतलब पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक हैं. इसे वोटबैंक के तौर पर देखें तो 80 से 85 फीसदी के करीब है, लेकिन अखिलेश यादव को पीडीए में शामिल समाज का कितना समर्थन हासिल है और क्या इस फॉर्मूले पर बीजेपी को हराने की ताकत रखते हैं?

सपा प्रमुख अखिलेश यादव 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछाने में जुट गए हैं, उनका पूरा फोकस पीडीए यानि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय को साधने का है. अखिलेश लगतार कह रहे हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी जिस तरह से सत्ता में आई थी, उसी तरह से 2024 के चुनाव में यूपी से उसकी विदाई करनी होगी. 2024 में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों की एकता से बीजेपी को हराया जा सकता है. इस तरह से पीडीए फॉर्मूले को लेकर सपा 2024 के चुनाव में एजेंडा सेट करने की कवायद कर रही है.

इन्हें भी पढ़े

pan masala

उत्तराखंड में एक साल के लिए बैन हुआ गुटखा और पान मसाला, राज्य सरकार ने उठाया सख्त कदम

October 13, 2026
CM धामी

PM मोदी के 25 साल के सफर पर हरिद्वार में खास पूजा, CM धामी ने मां गंगा से की ये प्रार्थना

October 12, 2026

बलिया-आरा बाईपास का शिलान्यास करने सिताबदियारा आएंगे नितिन गडकरी!

October 12, 2026
High Court

रेत खनन और परिवहन विवाद में हाईकोर्ट का फैसला; याचिका खारिज, याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपये का जुर्माना

October 12, 2026
Load More

बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यूपी में गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित फॉर्मूले का दांव चला था. नरेंद्र मोदी के अगुवाई में बीजेपी का यह सियासी प्रयोग सफल रहा. इतना ही नहीं, बीजेपी इसी समीकरण के जरिए 2017 का विधानसभा, 2019 का लोकसभा और 2022 का विधानसभा चुनाव जीतने में सफल रही. यूपी में बीजेपी के इस सोशल इंजीनियरिंग की काट अखिलेश नहीं तलाश पा रहे हैं. कांग्रेस से लेकर बसपा और जातीय आधार वाले छोटे दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन बीजेपी से मुकाबला नहीं कर सके.

इस बार पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक के सहारे सपा

2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की थी, लेकिन बहुत ज्यादा सफल नहीं रही. अल्पसंख्यक समुदाय में मुस्लिम और पिछड़ों में सिर्फ यादवों का भरोसा सपा जीत सकी थी जबकि बाकी पिछड़ी और दलित जातियों का बहुत ज्यादा समर्थन हासिल नहीं कर सकी थी. इसके चलते ही सपा सत्ता के सिंहासन तक नहीं पहुंच सकी और 111 सीटों पर सिमट गई थी.

हालांकि, पूर्वांचल के इलाके में जरूर ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा के साथ गठबंधन होने के चलते सपा को कुछ सीटों पर राजभर समुदाय के वोट का लाभ मिला था. इसके अलावा कुछ सीटों पर कुर्मी-कोइरी समुदाय के वोट भी मिले थे. कौशांबी और अंबेडकरनगर की सीटों पर दलित वोटों का कुछ हद तक झुकाव सपा की तरफ रहा है. इसके चलते ही अखिलेश के हौसले बुलंद और 2024 के चुनाव में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों का फॉर्मूला रखकर बीजेपी को हराने का दम भर रहे हैं.

दरअसल, मंडल कमीशन के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत ओबीसी के इर्द-गिर्द सिमट गई है. बीजेपी इस बात को पहले ही समझ गई थी, जिसके लिए पहले लोधी समुदाय से आने वाले कल्याण सिंह को आगे करके सियासत को साधने की कवायद की, लेकिन मुलायम सिंह यादव और मायावती के सियासी उद्भव के चलते सफल नहीं रही और दोबारा से नरेंद्र मोदी को आगे करके 2014 में एक मजबूत सियासी आधार रखा, जिसके चलते सपा और बसपा से लेकर कांग्रेस तक की राजनीतिक आधार खिसक गया.

बीजेपी ने यूपी में अपने सवर्ण परंपरागत वोटबैंक के साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित के साथ मजबूत कॉम्बिनेशन बना रखा है, जिसके दम पर एक के बाद एक जीत दर्ज कर रही है और 50 फीसदी वोट की सीमा रेखा खींच रखी है. अखिलेश यादव इस बात को बाखूबी समझ रहे हैं कि बीजेपी से मुकाबला करना है तो सपा को 40 से 45 फीसदी वोट हासिल करने ही होंगे, उसके बिना यूपी की राह आसान नहीं है. ऐसे में सपा ने पीडीए का फॉर्मूला चला है, लेकिन अखिलेश के लिए आसान नहीं है.

UP में 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता

उत्तर प्रदेश में 22 फीसदी दलित, 52 फीसदी ओबीसी और 20 फीसदी के करीब मुस्लिम मतदाता हैं. सूबे में सपा के कोर वोटबैंक में 20 फीसदी मुस्लिम और 9 फीसदी यादव समुदाय माना जाता है और इसके अलावा 5 फीसदी अन्य समुदाय के वोटर्स हैं. इस तरह सपा 34 से 35 फीसदी तक पहुंच रही है.

बसपा से दलित मतदाता लगातार खिसका है और मायावती के साथ फिलहाल जाटव समुदाय ही बचा है. दलित समुदाय का बाकी तबका बीजेपी के साथ जुड़ गया है. इस तरह बसपा के साथ फिलहाल 13 फीसदी वोट ही रह गया है, जिसे अपने साथ अखिलेश जोड़ने के लिए कभी कांशीराम की मूर्ती का अनावरण का दांव चल रहे हैं तो कभी अंबेडकरवादियों को जोड़ने की बात करते हैं, लेकिन मायावती लगातार सपा को दलित विरोधी कठघरे में खड़े करने की कोशिश कर रही हैं. ऐसे में अखिलेश के लिए दलित समुदाय का दिल जीतना आसान नहीं है?

UP में 80 जातियां OBC की, सबसे ज्यादा यादव

बात जहां तक पिछड़े वर्ग की है तो यूपी में 80 जातियां ओबीसी के तहत आती हैं. पिछड़े वर्ग में सबसे ज्यादा यादव 9 फीसदी हैं, जो ओबीसी का करीब 20 फीसदी माना जाता है. ओबीसी में उसके बाद कुर्मी-पटेल-गंगवार समुदाय 7 फीसदी हैं, जिसे गैर-यादव ओबीसी में गिना जाता है. इसी तरह मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी 5 फीसदी तो लोध 3 फीसदी हैं. जाट 3 फीसदी, मल्लाह-निषाद-कश्यप चार फीसदी, पाल-गड़रिया और गुर्जर 2-2 फीसदी. ऐसे ही बाकी अन्य ओबीसी जातियां भी एक-एक दो-दो फीसदी हैं.

उत्तर प्रदेश की सियासत में गैर-यादव ओबीसी जातियां काफी अहम मानी जाती हैं, जिसे पहले बसपा ने साधा और फिलहाल बीजेपी का कोर वोटबैंक बन चुकी हैं. सपा अगर पीडीए फॉर्मूले से बीजेपी के हराना चाहती है तो उसके लिए अतिपिछड़ी जातियों का भरोसा जीते बगैर संभव नहीं है. यूपी में यादव और अतिपिछड़ी जातियों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे हैं, जिसके चलते अखिलेश यादव के लिए उन्हें साथ लेना आसान नहीं है. इसी तरह से दलितों के साथ भी है जबकि अल्पसंख्यक समुदाय में मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव उसी तरफ रहता है, जो बीजेपी को हराने की स्थिति में होता है. ऐसे में अखिलेश का फॉर्मूला तभी संभव हो सकता है जब उसे अपने साथ मजबूती से जोड़ने में सफल रहते हैं?

इन्हें भी पढ़ें

  • All
  • विशेष
  • लाइफस्टाइल
  • खेल
student

तैयारी: बच्चे इंडिया नहीं, भारत पढेंगे!

October 27, 2023
Harichand Gehlot

निर्बल जनसेवा फाउंडेशन ने चौधरी हरिचंद गहलोत को किया सम्मानित

September 6, 2025

आदिवासी भील की हत्या के विरोध में धरना

December 22, 2022
पहल टाइम्स

पहल टाइम्स का संचालन पहल मीडिया ग्रुप्स के द्वारा किया जा रहा है. पहल टाइम्स का प्रयास समाज के लिए उपयोगी खबरों के प्रसार का रहा है. पहल गुप्स के समूह संपादक शूरबीर सिंह नेगी है.

Learn more

पहल टाइम्स कार्यालय

प्रधान संपादकः- शूरवीर सिंह नेगी

9-सी, मोहम्मदपुर, आरके पुरम नई दिल्ली

फोन नं-  +91 11 46678331

मोबाइल- + 91 9910877052

ईमेल- pahaltimes@gmail.com

Categories

  • Uncategorized
  • खाना खजाना
  • खेल
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • दिल्ली
  • धर्म
  • फैशन
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • विश्व
  • व्यापार
  • साक्षात्कार
  • सामाजिक कार्य
  • स्वास्थ्य

Recent Posts

  • द‍िल्‍ली में ब‍िजली सब्‍स‍िडी के ल‍िए बदले न‍ियम, अब आधार हुआ अन‍िवार्य
  • दिल्ली में प्रदूषण पर लगाम लगाने की तैयारी तेज, सीएम रेखा गुप्ता ने आईसीसीसी का किया निरीक्षण
  • भारत के डिजिटल पेमेंट में दिखेगी इन्क्लूसिव टेक्नोलॉजी की असली ताकत: पीएम मोदी

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.

  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.