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Home दिल्ली

सरकारी अधिकारी कहां-कहां करा सकते हैं इलाज, सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया साफ

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 26, 2025
in दिल्ली, राष्ट्रीय
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इलाज
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नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2018 के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें उत्तर प्रदेश के सरकारी अधिकारियों को केवल सरकारी अस्पतालों में ही इलाज कराने की बात कही गई थी. उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सुधार के व्यापक प्रयास के तहत उपरोक्त निर्देश सहित कई निर्देश जारी किए थे.

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने कहा कि इस तरह के निर्देश नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप करते हैं और उपचार के संबंध में व्यक्तिगत विकल्प को सीमित करते हैं. सुनवाई के दौरान पीठ ने सरकारी अधिकारियों के लिए उपचार विकल्पों को सीमित करने के पीछे के औचित्य पर सवाल उठाया. प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उच्च न्यायालय नीतिगत निर्णय कैसे दे सकता है कि किसी व्यक्ति को कहां उपचार करवाना चाहिए या नहीं? हालांकि अस्पताल की स्थिति में सुधार करने का इरादा सराहनीय है, लेकिन ऐसे निर्देश व्यक्तिगत पसंद को दरकिनार नहीं कर सकते.

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2018 में उत्तर प्रदेश राज्य में अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए कई निर्देश जारी करते हुए यह निर्देश पारित किया था. सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को इस पर सुनवाई हुई. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि सरकारी अधिकारियों को उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों से ही सेवाएं लेनी चाहिए. मंगलवार को सुनवाई के दौरान सीजेआई संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि निर्देशों ने नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप किया है और मरीज की इच्छा के अनुसार उपचार के विकल्प में दखल दिया है.

सीजेआई खन्ना ने पूछा कि हाईकोर्ट नीतिगत निर्णय कैसे ले सकता है – कोई व्यक्ति कहां से उपचार प्राप्त करेगा और कहां से नहीं? जाहिर है, अस्पतालों की स्थिति में सुधार की जरूरत है, इसमें कोई संदेह नहीं है – अगर यही इरादा था, तो यह एक नेक, अच्छा इरादा था. लेकिन इससे परे, आप यह नहीं कह सकते कि आपको केवल ए, बी और सी (अस्पतालों) से ही उपचार प्राप्त करना होगा.

बता दें कि 2018 में यह आदेश जारी करते समय इलाहाबाद हाईकोर्ट उत्तर प्रदेश राज्य में खराब चिकित्सा सेवाओं के मुद्दे पर अनुच्छेद 226 के तहत एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था. यहां मुख्य याचिकाकर्ता, एक कामकाजी महिला मजदूर ने सरकारी अस्पताल में बच्चे के जन्म के समय ज्यादती का सामना किया. प्रसव के बाद होने वाली जटिलताओं जैसे कि लगातार पेशाब आने के कारण उसे कई अस्पतालों (सरकारी से लेकर निजी अस्पतालों) में जाना पड़ा, जिससे उसे आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा.

पीठ को बताया गया कि पीठ को बताया गया कि इससे पहले, निजी अस्पतालों के संबंध में लगाए गए आदेश में दिए गए निर्देशों पर न्यायालय ने रोक लगा दी थी. हाईकोर्ट के निर्देश यातायात पुलिस द्वारा एंबुलेंस के लिए सड़कों की सफाई और चिकित्सा देखभाल केंद्रों के कामकाज की निगरानी के लिए आम लोगों को शामिल करते हुए विशेष समितियों के गठन से भी संबंधित थे.

विशेष रूप से, न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने 14 मई, 2018 को निर्देश संख्या 13 (डी) से (एच) और निर्देश संख्या 14 पर रोक लगा दी थी, जिसमें एंबुलेंस की कुशल आवाजाही के लिए मार्गों और सड़कों की सफाई सुनिश्चित करने और राज्य के चिकित्सा देखभाल केंद्रों के कामकाज की निगरानी के लिए आम लोगों को शामिल करते हुए जिला और ब्लॉक स्तर पर स्थायी विशेष समितियों के गठन के लिए यातायात पुलिस से संबंधित निर्देश थे.

निर्देश संख्या 15 को संशोधित करके कहा गया कि यह केवल मरीजों और केवल एक परिचारक तक ही सीमित रहेगा. मूल निर्देश में सभी राज्य संचालित चिकित्सा देखभाल केंद्रों में मरीजों और उनके परिचारकों को मुफ्त भोजन देने की बात कही गई थी.

सीजेआई ने सरकारी अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ के रिक्त पदों को भरने के हाईकोर्ट के निर्देश पर भी मौखिक रूप से आपत्ति जताई. उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी अधिकारियों के लिए निजी अस्पताल के बिलों की वित्तीय प्रतिपूर्ति की अनुमति न देने और सरकारी कर्मचारियों को सरकारी अस्पतालों में उपचार लेने के लिए प्रोत्साहित करने के निर्देश से सार्वजनिक क्षेत्र की सेवाओं को मनमाने ढंग से सरकारी कर्मचारियों तक सीमित किया जा सकता है. जिससे वंचित रोगियों की जरूरतों को नजरअंदाज करने की संभावना बढ़ जायेगी.

कोर्ट ने कहा कि ‘वहां के सरकारी कर्मचारियों को शायद सामान्य नागरिकों पर वरीयता मिलेगी’. इसलिए पीठ ने मई 2018 के अंतरिम आदेश को सही पाया और उस सीमा तक हाईकोर्ट के निर्देशों को रद्द कर दिया. रिट याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट के समक्ष डेटा और तथ्यों से संबंधित एक और याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी गई. आदेश का प्रासंगिक भाग इस प्रकार है कि रिट याचिकाकर्ता के लिए एक नई रिट याचिका दायर करने का आप्शन खुला रहेगा. जिसमें निर्णय के निष्पादन/कार्यान्वयन के लिए उचित कदम उठाने हेतु उच्च न्यायालय के समक्ष डेटा सहित तथ्य और परिस्थितियां प्रस्तुत की जाएंगी. यदि ऐसी कोई रिट याचिका दायर की जाती है, तो उस पर विचार किया जाएगा और उसकी जांच की जाएगी.

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