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1966 में इंदिरा गांधी ने क्यों किया था रुपये का अवमूल्यन? अमेरिका की मदद, सोवियत नाराज़गी और आर्थिक संकट की पूरी कहानी

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 30, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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Digital rupee
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नई दिल्ली। आज जब भारतीय रुपये की कमजोरी पर आर्थिक बहस छिड़ी रहती है, तब इतिहास का एक ऐसा फैसला याद आता है जब भारत सरकार ने खुद रुपये को जानबूझकर कमजोर किया था। 6 जून 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय रुपये का 36.5 प्रतिशत अवमूल्यन (Devaluation) किया था। इस फैसले के बाद एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 4.76 रुपये से बढ़कर 7.50 रुपये हो गई थी।

यह कदम उस दौर में उठाया गया जब भारत गंभीर आर्थिक संकट, खाद्यान्न कमी और विदेशी मुद्रा की भारी तंगी से जूझ रहा था। हालांकि इस फैसले ने देश के भीतर तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिले।

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आर्थिक संकट और युद्धों का दबाव

1962 में चीन और 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों ने भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाला था। लगातार पड़े सूखे के कारण कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ और देश को बड़े पैमाने पर गेहूं तथा चावल आयात करने पड़े। उस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बेहद सीमित था। वर्ष 1965 में भारत का आयात 2,194 करोड़ रुपये का था, जबकि निर्यात केवल 1,264 करोड़ रुपये का रहा। इस प्रकार व्यापार घाटा बढ़कर 930 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।

आर्थिक मामलों के जानकार प्रकाश मेहरा के अनुसार, भारत खाद्य संकट से जूझ रहा था और विश्व बैंक लगातार रुपये के अवमूल्यन का दबाव बना रहा था।

प्रकाश मेहरा कहते हैं, “भारत को दबाव में यह फैसला लेना पड़ा था, लेकिन इसके बाद खाद्य सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। हरित क्रांति का रास्ता भी इसी दौर के बाद मजबूत हुआ। हालांकि रुपये के अवमूल्यन के बाद भारत में अमेरिका का प्रभाव बढ़ गया था।”

अमेरिका से मिली बड़ी सहायता

उस समय भारत को खाद्यान्न संकट से उबारने के लिए अमेरिका की मदद लेनी पड़ी। अमेरिका के “फूड फॉर पीस” कार्यक्रम के तहत भारत को बड़ी मात्रा में गेहूं और चावल उपलब्ध कराया गया।

रिपोर्टों के अनुसार, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने भारत को लगभग 1.6 करोड़ टन गेहूं, 10 लाख टन चावल और करीब एक अरब डॉलर की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई थी। उस समय के वित्त मंत्री सचिन्द्र चौधरी ने भी स्वीकार किया था कि निकट भविष्य में भारत विदेशी सहायता के बिना काम नहीं चला सकता।

क्यों हुआ रुपये का अवमूल्यन?

आर्थिक सहायता में कमी और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के बढ़ते दबाव के बीच इंदिरा गांधी सरकार ने 5 जून 1966 की रात ऐतिहासिक निर्णय लिया और अगले दिन रुपये का अवमूल्यन घोषित कर दिया। इस फैसले के बाद डॉलर की कीमत 57.4 प्रतिशत तक बढ़ गई। सरकार का मानना था कि इससे निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी मुद्रा की समस्या में राहत मिलेगी।

लेकिन विपक्ष और सरकार के भीतर कई नेताओं ने इसे अमेरिका और विश्व बैंक के सामने झुकने के रूप में देखा। तत्कालीन वाणिज्य मंत्री मनुभाई शाह ने भी इस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई थी।

सोवियत संघ क्यों हुआ नाराज़?

1960 के दशक में भारत को सोवियत संघ के करीबी देशों में गिना जाता था। ऐसे में रुपये के अवमूल्यन को मॉस्को ने केवल आर्थिक फैसला नहीं बल्कि राजनीतिक संकेत के रूप में देखा।

प्रकाश मेहरा बताते हैं, “सोवियत संघ इस फैसले से खुश नहीं था। उसे लगा कि भारत पश्चिमी देशों की ओर झुक रहा है। हालांकि 1962 के चीन युद्ध के दौरान अमेरिका भारत की मदद के लिए आगे आया था जबकि यूएसएसआर तटस्थ रहा था। ऐसे में भारत ने सोवियत चिंताओं को ज्यादा महत्व नहीं दिया।”

सोवियत प्रधानमंत्री एलेक्सी कोस्यगिन ने भी भारतीय प्रतिनिधियों से कहा था कि रुपये का अवमूल्यन एक बड़ी भूल थी। हालांकि नाराजगी के बावजूद सोवियत संघ ने भारत को दी जाने वाली सैन्य और आर्थिक सहायता जारी रखी तथा बाद में उसमें वृद्धि भी की।

अमेरिका भी नतीजों से नहीं था संतुष्ट

दिलचस्प बात यह रही कि जिन पश्चिमी संस्थाओं और देशों ने अवमूल्यन का समर्थन किया था, वे भी बाद में इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखे। 1967 में अमेरिकी उद्योगपति जॉन डी. रॉकफेलर ने विश्व बैंक नेतृत्व को लिखे पत्र में कहा था कि अवमूल्यन अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका क्योंकि भारत ने वे आर्थिक सुधार लागू नहीं किए जिनकी उम्मीद की जा रही थी। भारत में अमेरिकी राजदूत रहे चेस्टर बाउल्स ने भी अपनी आत्मकथा में उल्लेख किया कि भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में इस फैसले का व्यापक विरोध था।

अर्थशास्त्रियों और उद्योग जगत में बंटी राय

रुपये के अवमूल्यन को लेकर अर्थशास्त्रियों के बीच भी मतभेद थे। कई विशेषज्ञ निजी तौर पर इसका समर्थन करते थे, लेकिन उनका मानना था कि अमेरिका और विश्व बैंक के दबाव ने इस फैसले की राजनीतिक स्वीकार्यता को कमजोर कर दिया। वहीं उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा ने इसे “कड़वी दवा” बताया था। उनका मानना था कि यह फैसला दर्दनाक जरूर था, लेकिन उस समय की परिस्थितियों में आवश्यक भी हो सकता था।

भारत की विकास नीति

1966 में इंदिरा गांधी द्वारा किया गया रुपये का अवमूल्यन केवल एक आर्थिक फैसला नहीं था, बल्कि शीत युद्ध की राजनीति, विदेशी सहायता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और भारत की विकास नीति से जुड़ा एक ऐतिहासिक मोड़ था। इस फैसले ने भारत की आर्थिक दिशा, अमेरिका और सोवियत संघ के साथ संबंधों तथा भविष्य की कृषि और आर्थिक नीतियों पर गहरा प्रभाव डाला। आज भी यह निर्णय भारतीय आर्थिक इतिहास के सबसे चर्चित और विवादास्पद फैसलों में गिना जाता है।

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