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Home राष्ट्रीय

ईसाई बहुल राज्यों में भी फेल क्यों हो रही कांग्रेस?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
March 12, 2023
in राष्ट्रीय, विशेष
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स्वामी अंकलेश्वर अय्यर


नई दिल्ली: हाल ही में पूर्वोत्तर के राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने जीत हासिल की। इन राज्यों में ईसाई आबादी काफी ज्यादा है। ईसाई बहुल राज्यों में कांग्रेस का खराब प्रदर्शन काफी चिंताजनक है। बीजेपी की हिंदूवादी छवि के बाद भी इन राज्यों में बीजेपी जीत रही है। जबकि कांग्रेस के पास बीजेपी को ईसाइयों के खिलाफ हिंसा के मुद्दे को लेकर घेरने का एक अच्छा मौका था।

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भारतीय जनता पार्टी हिंदू पट्टी वाले राज्यों में कांग्रेस को मात देती है, तो ये बात पल्ले पड़ती है, लेकिन पूर्वोत्तर के ईसाई बहुल राज्यों में कांग्रेस का बीजेपी से मात खाना शर्मनाक है। कांग्रेस उन राज्यों में भी अपने रास्ते से भटक चुकी है, जहां बीजेपी का हिंदू राष्ट्रवाद एक गंभीर बाधा होना चाहिए। हाल के विधानसभा चुनावों में बीजेपी नागालैंड और मेघालय में बीजेपी के गठबंधन ने जीत हासिल की। मेघालय में ईसाइयों की आबादी लगभग 75% और नागालैंड में 88% है। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश में भी बीजेपी सत्ता में है, जहां सबसे ज्यादा (30.2%) आबादी ईसाई धर्म को मानती है।

ये काफी चौंकाने वाला है। सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथी ट्रोलर्स हिंदुओं के धर्मांतरण कराने के लिए ईसाइयों के खिलाफ जमकर बोलते हैं। एक एनजीओ यूनाइटेड क्रिश्चियन फ्रंट (यूसीएफ)का दावा है कि 2022 में ईसाइयों पर 550 से ज्यादा हिंसक हमले हुए। वैश्विक संगठन ओपन डोर्स इंटरनेशनल का आरोप है कि 1990 के दशक में बीजेपी के राष्ट्रीय पार्टी बनने के बाद से ईसाई विरोधी हिंसा बढ़ गई है और 2014 में केंद्र में सरकार बनने के बाद ये चरम पर है। ये संगठन भारत को ईसाइयों के लिए दुनिया में दसवां सबसे खतरनाक स्थान बताता है। 2014 से पहले भारत टॉप 30 में भी नहीं था। अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग ने सऊदी अरब, पाकिस्तान, चीन और उत्तर कोरिया के साथ धार्मिक उत्पीड़न में भारत को टियर -1 देश के रूप में सूचीबद्ध किया है।

ईसाई संगठनों का आरोप है कि कई चर्च जलाए गए हैं, पुजारियों को पीटा गया है, कब्रिस्तानों को क्रेटेड, और ईसाई बस्तियों को नष्ट कर दिया। ऐसे में ये मुद्दा कांग्रेस के पास बीजेपी के खिलाफ एक बड़ा हथियार होना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। 2014 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद से कांग्रेस ने ये माना कि उसे ऐसी पार्टी माना जाता है, जो किसी भी कीमत पर अल्पसंख्यकों को खुश करने की कोशिश करता है, भले ही इसके लिए हिंदुओं की भावनाओं को आहत किया जाए। इसके बाद पार्टी ने अपनी कठोर धर्मनिरपेक्षता को त्याग दिया और एक सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर बढ़ने लगी, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं मिला।

नरेंद्र मोदी आपको बताएंगे कि उन्हें एक हिंदू, एक गुजराती और एक हिंदू राष्ट्रवादी होने पर गर्व है। क्या राहुल गांधी को अपने होने पर गर्व है? क्या उसे गर्व है कि उनकी मां, सोनिया, एक ईसाई है? या फिर उनके दादा फिरोज गांधी पारसी थे? या कि उनके बहनोई रॉबर्ट वाड्रा ईसाई हैं और उनकी बुआ मेनका गांधी सिख हैं? क्या वह कहते हैं कि उन्हें एक ऐसे परिवार से होने पर गर्व है जो भारत की विविधता को दर्शाता है, जो संकीर्ण सांप्रदायिक पहचान को खारिज करता है और धर्मनिरपेक्ष का संदेश देता है।

इसके बजाय राहुल ये सब नहीं करके खुद जनेऊ धारी शिव भक्त के रूप में दिखाना चाहते हैं। लेकिन उनकी ये कदम बुरी तरह विफल रहा। उन्हें पहले से भी कम वोट मिले। लेकिन इसके बाद भी वो अपनी इस छवि पर कायम हैं। भारत जोड़ो यात्रा के बाद, मैंने राहुल में नई ताकत और उद्देश्य देखा है। उन्होंने लाल किले से वीर सावरकर और बीजेपी पर हमला करते हुए कहा कि पार्टी अपनी आर्थिक विफलताओं और क्रोनी कैपिटलिज्म से ध्यान भटकाने के लिए ‘हिंदू-मुस्लिम’ का नारा लगाती रही। यह एक नए धर्मनिरपेक्षता की शुरुआत जैसा लग रहा था।

सच कहा जाए तो किसी भी राष्ट्रीय पार्टी की ईसाई राज्यों में गहरी जड़ें नहीं हैं। वहां की राजनीति में स्थानीय आदिवासी नेताओं का वर्चस्व है, अवसरवादी जो केंद्र-राज्य संबंधों को सुचारू करने के लिए नई दिल्ली में किसी भी पार्टी के साथ खुद जोड़े रखते हैं। बीजेपी को आज जो बढ़त मिली है, उसका यह एक अहम कारण है। फिर भी कांग्रेस के पास बीजेपी को ईसाई विरोधी हिंसा की पार्टी के रूप में निशाना साधने का बढ़िया मौका था। सोशल मीडिया में ईसाइयों पर हमलों के ठोस सबूतों की बाढ़ आ गई। लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दा को ठीक से नहीं भूना।

कांग्रेस को अपनी गौरवशाली ऐतिहासिक जड़ों की ओर लौटने की जरूरत है। इसे गांधी, नेहरू और अन्य दिग्गजों की धर्मनिरपेक्षता की वापसी की घोषणा करनी चाहिए। राहुल को अगर अपनी छवि बनानी ही है तो वो कोई ऐसे कार्यक्रम कर सकते हैं, जहां लोग गांधी के गीत जैसे ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ गाते हैं, जिसमें ‘ईश्वर जीसस तेरो नाम’ जोड़ा जा सकता है। इससे गांधी की तरह साबित होगा कि एक हिंदू धर्मनिरपेक्षतावादी और अल्पसंख्यकों के हित में बात करने वाला भी हो सकता है।

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