नई दिल्ली: 300 करोड़ से ज्यादा यूजर्स वाले लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप वॉट्सऐप (WhatsApp) ने मोबाइल नंबर की जगह ‘यूजरनेम’ (Username) फीचर पेश किया है. इसे यूजर्स को किसी से चैट करने के लिए अपना फोन नंबर शेयर करने की जरूरत नहीं होगी, सिर्फ एक यूजरनेम से काम चल जाएगा. हाल ही में वॉट्सऐप के ग्लोबल हेड बने कुणाल शाह की तरह बहुत से लोग इसे प्राइवेसी को मजबूत करने की दिशा में क्रांतिकारी कदम मानते हैं, लेकिन भारत जैसे विशाल और डिजिटली एक्टिव देश में इस फीचर की सुरक्षा को लेकर भी बहस शुरू हो गई है. कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये कदम साइबर क्राइम के लिए एक नया हथियार बन सकता है. आइए समझते हैं कि इस नए फीचर पर सुरक्षा को लेकर क्या सवाल उठ रहे हैं और एक्सपर्ट्स क्यों चिंतित हैं.
कानून व्यवस्था के लिए क्या ये बड़ी चुनौती?
सीनियर IPS अधिकारी अरुण बोथरा ने इस फीचर को लेकर कानूनी एजेंसियों (Law Enforcement Agencies) की चिंता को सामने रखा है. उनका कहना है कि वॉट्सऐप का यूजरनेम-आधारित पहचान फीचर पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभर सकता है.
उन्होंने टेलीग्राम का उदाहरण देते हुए कहा कि इसी तरह के फीचर के कारण टेलीग्राम आज इन्वेस्टमेंट स्कैम, भेष बदलने (Impersonation) और साइबर क्राइम की जांच में एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है.
अरुण बोथरा के मुताबिक, ‘वॉट्सऐप का दायरा टेलीग्राम से बहुत बड़ा है. जब करोड़ों यूजर्स के पैमाने पर बात हो, तो ऐप के डिजाइन में किया गया एक छोटा-सा बदलाव भी सार्वजनिक सुरक्षा (Public Safety) पर बहुत बड़ा और गंभीर असर डाल सकता है.’
क्या ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे स्कैम कम होंगे?
इस बहस में एक दूसरा पहलू भी है. विमल लखोटिया (@vimallakhotia) का मानना है कि ये फीचर कुछ मायनों में मददगार भी हो सकता है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इससे ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे डरावने स्कैम्स में कमी नहीं आएगी? चूंकि इस फीचर के बाद यूजर्स के मोबाइल नंबर छिपे रहेंगे, इसलिए स्कैमर्स के लिए किसी टारगेट को ट्रैक करना या उसके नंबर के आधार पर उसे हैक करना काफी मुश्किल हो जाएगा. यानी, नंबर एक्सपोज न होने से आम यूजर्स एक हद तक सुरक्षित भी होंगे.
नाम का धोखा: आ सकती है ‘स्कैम की बाढ़’
एंटरप्रेन्योर और इन्फ्लुएंसर अंकुर वारिकू ने इस फीचर के व्यावहारिक खतरों पर बेहद गंभीर चिंता जताई है. उनका कहना है कि भारत जैसे देश में, जहां डिजिटल साक्षरता अभी भी पूरी तरह परिपक्व नहीं है, ये फीचर एक बड़ी ‘तबाही’ (Disaster) साबित हो सकता है, बशर्ते वॉट्सऐप इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई बेहद मजबूत सिस्टम न बनाए.
वारिकू ने एक उदाहरण देकर समझाया, ‘मान लीजिए आपको warikoo, awarikoo, ankurwarikooo, ankur_warikoo या ankurwarikooofficial जैसे मिलते-जुलते यूजरनेम से मैसेज आता है, जिसमें पैसे की मांग की गई हो. ऐसे में आम इंसान धोखा खा जाएगा.’
इसके पीछे उन्होंने दो बड़े कारण बताए-
देश में ज्यादातर लोग ‘वेरिफाइड स्टेटस’ या ब्लू टिक के खेल को नहीं समझते.
चूंकि यूजरनेम का मतलब ही प्राइवेसी है, इसलिए आप फोन कॉल करके यह वेरिफाई भी नहीं कर सकते कि सामने वाला असली है या नकली.
अपना पर्सनल अनुभव साझा करते हुए वारिकू ने बताया कि उन्होंने मेटा (Meta) के खिलाफ एक कानूनी लड़ाई भी लड़ी है, क्योंकि फेसबुक-इंस्टाग्राम पर उनका चेहरा दिखाकर AI-जेनरेटेड विज्ञापनों के जरिए लोगों को फर्जी वॉट्सऐप इन्वेस्टमेंट ग्रुप्स में फंसाया जा रहा था. उनके मुताबिक, भारत में इस तरह के स्कैम को अंजाम देना बहुत आसान है.
‘यूजरनेम की’ कितनी कारगर?
इस चिंता पर प्रीतीश जोशी ने एक समाधान सुझाया कि वॉट्सऐप में ‘यूजरनेम की’ (Username Key) का एक सेटिंग ऑप्शन है. इसके तहत 4 अंकों का एक कोड होगा और जो व्यक्ति उस कोड को जानेगा, वही आपसे संपर्क या चैट कर पाएगा.
इस पर अंकुर वारिकू का कहना है कि ये फीचर सिर्फ इस समस्या को हल करता है कि ‘कोई अनजान व्यक्ति सीधे आप तक न पहुंच सके’.
लेकिन ये उस समस्या को बिल्कुल हल नहीं करता जहां ‘स्कैमर्स चाहते हैं कि आप खुद उन तक पहुंचें.’ फर्जी प्रोफाइल बनाकर लोगों को फंसाने का खेल इसके बाद भी जारी रर सकता है.
X, फेसबुक, टेलीग्राम से नहीं तो वॉट्सऐप से ही दिक्कत क्यों?
जब सोशल मीडिया यूजर अरुणिमा गांगुली ने इस फीचर का बचाव करते हुए पूछा कि यही चीज तो एक्स (ट्विटर), फेसबुक और टेलीग्राम पर भी सालों से चल रही है, वहां दिक्कत नहीं है तो सिर्फ वॉट्सऐप को लेकर ही इतना हंगामा क्यों है?
इस पर अंकुर वारिकू ने भारत के लिहाज से सबसे अचूक तर्क दिया. उन्होंने कहा कि मामला ‘संख्या’ (Scale) का है. वॉट्सऐप पर आज की तारीख में लगभग 85 करोड़ भारतीय मौजूद हैं. ये संख्या एक्स या टेलीग्राम से कई गुना बड़ी है.
उन्होंने कहा, ‘भारत में वॉट्सऐप सिर्फ एक ऐप नहीं, बल्कि हर आम और खास इंसान की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. इतनी बड़ी आबादी के बीच जब पहचान को छिपाने या बदलने का फीचर आएगा, तो स्कैम का जोखिम भी उसी पैमाने पर कई गुना बढ़ जाएगा.’
एक्सपर्ट्स के अनुसार, प्राइवेसी और सुरक्षा के बीच की ये बेहद बारीक बहस है, जहां एक तरफ यूजरनेम आने से महिलाओं और आम यूजर्स के फोन नंबर सुरक्षित रहेंगे, वहीं दूसरी तरफ साइबर अपराधियों को अपनी पहचान छिपाकर ठगी करने का एक नया रास्ता मिल सकता है. वॉट्सऐप इस फीचर के साथ एंटी-एब्यूज (दुरुपयोग रोकने वाले) सिस्टम को किस तरह मजबूत बना रहा है, इस बारे में अभी कंपनी की ओर से जानकारी सामने नहीं आई हैं.






