नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक मामले में फैसला सुनाते हुए एक ऐसे व्यकित को बरी कर दिया जिसे पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया गया था। मामले की सुनाई कर रही जस्टिस जेके महेश्वरी और अऱविंद कुमार की पीठ ने कहा कि केवल उत्पीड़न या तनावपूर्ण संबंधों के आरोपों से ये साबित नहीं होता कि पति ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया। कोर्ट ने कहा इसके लिए पति-पत्नी में पिछले झगड़ों या दोनों के बीच भावनात्मक तनाव से ज्यादा की जरूरत होती है। की आवश्यकता होती है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, केवल इस बात से उकसावे की कार्रवाई साबित नहीं होती कि पति-पत्नी के बीच कुछ विवाद थाऐसा कुछ भी रिकॉर्ड में नहीं लाया गया है जिससे पता चले कि अपीलकर्ता पति ने कुछ ऐसा किया हो जो सीधे तौर पर पत्नी की आत्महत्या की वजह बना हो। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों को इस आधार पर खारिज कर दिया कि यह साबित करने के लिए कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं था कि पति ने महिला को आत्महत्या करने के लिए उकसाया था या जानबूझकर मजबूर किया था।
क्या है मामला?
यह मामला उत्तराखंड में उस महिला से जुड़ा है जिसकी वैवाहिक घर में जलने से मौत हो गई थी। महिला के परिवारवालों के अनुसार महिला उसके पति ने छोड़ दिया था और कथित तौर पर किसी दूसरी महिला के साथ रह रहा था। महिला के परिवार ने उस शिकायत का भी हवाला दिया जो महिला ने उस स्कूल के प्रिंसिपल को लिखी थी जहां उसका पति काम करता था। इसमें पुलिस का स्टेटमेंट भी था। जिसके बाद पुलिस ने समझौता कर लिया था। आरोप है कि महिला की मौत से दो दिन पहले भी झगड़ा हुआ था।
ट्रायल कोर्ट ने 2001 में पति को दोषी ठहराया और हाई कोर्ट ने 2013 में दोषसिद्धि की पुष्टि की। हालाकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अगर हम परिस्थितियों को सच भी मान ले, तब भी आईपीसी की धारा 306 के तहत ये साबित करने रे लिए काफी नहीं है कि पति ने उसे आत्महत्या के लिए उकराया क्योंकि पति का ऐसा कोई इरादा नहीं था। दोषसिद्धि को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषसिद्धि केवल तनावपूर्ण संबंधों के आधार पर नहीं की जा सकती, बल्कि इसके लिए उकसावे के साफ और तात्कालिक सबूतों की जरूरत होती है।







