प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर
नई दिल्ली: मेडे (Mayday) एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त आपातकालीन संकट सिग्नल है, जो मुख्य रूप से विमानन और समुद्री क्षेत्र में उपयोग किया जाता है। यह फ्रांसीसी शब्द “m’aider” (मुझे मदद करो) से लिया गया है। पायलट या जहाज के कप्तान इसे तब रेडियो के जरिए भेजते हैं, जब विमान या जहाज को तत्काल खतरा हो, जैसे कि जानलेवा स्थिति, तकनीकी खराबी, या यात्रियों और चालक दल की सुरक्षा को खतरा। मेडे कॉल को तीन बार दोहराया जाता है—”Mayday, Mayday, Mayday”—ताकि यह स्पष्ट हो कि यह मजाक नहीं, बल्कि गंभीर आपातकाल है।
मेडे कॉल कब और क्यों की जाती है ?
मेडे कॉल का उपयोग तब होता है जब विमान का इंजन फेल हो जाए। विमान में आग लग जाए। नियंत्रण खोने का खतरा हो। गंभीर तकनीकी खराबी या हाईजैक जैसी स्थिति हो। यह कॉल एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) या आसपास के विमानों/जहाजों को अलर्ट करती है कि तुरंत सहायता चाहिए। मेडे कॉल के बाद पायलट आमतौर पर विमान का कॉल साइन, स्थान, आपातकाल की प्रकृति, ऊंचाई, और इरादे (जैसे आपातकालीन लैंडिंग) जैसी जानकारी साझा करते हैं।
विमान हादसे में मेडे कॉल का मामला
12 जून को अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से लंदन (गैटविक) के लिए उड़ान भरने वाला एयर इंडिया का बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर (फ्लाइट AI-171) टेकऑफ के कुछ सेकंड बाद मेघानी नगर क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान ने दोपहर 1:39 बजे रनवे 23 से उड़ान भरी थी। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) के अनुसार, विमान के पायलट, कैप्टन सुमीत सभरवाल (8200 घंटे का अनुभव) ने टेकऑफ के तुरंत बाद ATC को मेडे कॉल दी।
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, पायलट ने “Mayday, Mayday, Mayday… no thrust, losing power, unable to lift” जैसा संदेश दिया, जिसका मतलब था कि विमान में पर्याप्त थ्रस्ट (जोर) नहीं था, शक्ति कम हो रही थी, और यह ऊंचाई हासिल नहीं कर पा रहा था। मेडे कॉल के बाद ATC ने विमान से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसके कुछ ही सेकंड बाद विमान 625 फीट की ऊंचाई पर सिग्नल खो बैठा और बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल परिसर में गिरकर धमाके के साथ जल गया।
विमान में सवार 242 लोगों में से 241 की मौत हो गई, जिसमें 169 भारतीय, 53 ब्रिटिश, 7 पुर्तगाली, और 1 कनाडाई नागरिक शामिल थे। केवल एक यात्री, विशवशकुमार रमेश, जीवित बचा। जमीन पर भी कई लोग घायल हुए।
मेडे कॉल की प्रक्रिया और महत्व
मेडे कॉल मिलते ही ATC उस विमान को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। अन्य सभी गैर-जरूरी रेडियो संचार बंद हो जाते हैं, और आपातकालीन सेवाएं (फायर ब्रिगेड, एम्बुलेंस, बचाव दल) तुरंत सक्रिय हो जाती हैं। पायलट को आपातकाल की प्रकृति, स्थान, और अन्य जरूरी विवरण देना होता है ताकि बचाव कार्य तेजी से शुरू हो सके।
मेडे कॉल से पता चलता है कि पायलट ने आपातकाल को तुरंत पहचाना और प्रोटोकॉल का पालन किया, लेकिन स्थिति इतनी तेजी से बिगड़ी कि विमान को बचाना संभव नहीं हुआ।
संभावित कारण और जांच
मेडे कॉल और प्रारंभिक डेटा से संकेत मिलता है कि विमान में संभवतः इंजन की विफलता, पक्षी टकराने (बर्ड स्ट्राइक), या अन्य गंभीर तकनीकी खराबी हुई होगी। एविएशन विशेषज्ञों का कहना है कि विमान का लैंडिंग गियर नीचे रहना और अपर्याप्त थ्रस्ट भी हादसे के कारण हो सकते हैं। हादसे की जांच Aircraft Accident Investigation Bureau (AAIB) और DGCA कर रहे हैं। ब्लैक बॉक्स (फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर) की तलाश जारी है। बोइंग और GE एयरोस्पेस के विशेषज्ञ भी जांच में सहायता कर रहे हैं।
मेडे कॉल का ऐतिहासिक संदर्भ
मेडे शब्द 1923 में लंदन के क्रॉयडन हवाई अड्डे पर रेडियो अधिकारी फ्रेडरिक स्टैनली मॉकफोर्ड द्वारा पेश किया गया था। यह फ्रांसीसी वाक्यांश “m’aider” का अंग्रेजी उच्चारण है। 1927 में इसे Morse कोड “SOS” के साथ अंतरराष्ट्रीय रेडियो संचार के लिए आधिकारिक तौर पर अपनाया गया।
अहमदाबाद हादसे में मेडे कॉल से पता चलता है कि पायलट ने गंभीर आपातकाल को पहचानकर तुरंत ATC को सूचित किया, लेकिन स्थिति इतनी तेजी से बिगड़ी कि विमान को बचाना संभव नहीं हुआ। मेडे कॉल विमानन में एक महत्वपूर्ण प्रोटोकॉल है, जो आपात स्थिति में त्वरित कार्रवाई और बचाव के लिए जरूरी है। इस हादसे की जांच से सटीक कारणों का पता चलेगा, जो भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने में मदद करेगा।







