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Home राष्ट्रीय

भारत में हुआ एक नए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 25, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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सनातन संस्कृति के संस्कारों
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prahlad sabnaniप्रहलाद सबनानी


नई दिल्ली: हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों में समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए नागरिकों को जागरूक किए जाने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है और पश्चिमी सभ्यता के आधार पर केवल अधिकार के भाव को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। हिंदू वेदों एवं पुराणों के अनुसार प्रत्येक राजा का यह प्रथम कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में निवास कर रहे नागरिकों की समस्याओं को दूर करने का भरसक प्रयास करे ताकि उसके राज्य में नागरिक सुख शांति से प्रसन्नता पूर्वक निवास कर सकें। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने “एकात्म मानववाद” के सिद्धांत को विकसित किया था। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो व्यक्ति एवं समाज के बीच एक संतुलित सम्बंध स्थापित करने पर जोर देता है।

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एकात्म मानववाद का उद्देश्य प्रत्येक मानव को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना है एवं अंत्योदय अर्थात समाज के निचले स्तर पर स्थित व्यक्ति के जीवन में सुधार करना है। विशेष रूप से भारत में आज के परिप्रेक्ष्य में इस सिद्धांत का आश्य यह भी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ समाज में अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने का लक्ष्य प्रत्येक राजनीतिक दल का होना चाहिए। परंतु, आज की पश्चिमी सभ्यता, जो पूंजीवाद पर आधारित नीतियों पर चलती हुई दिखाई देती है, के अनुसरण में मानव केवल अपने हितों का ध्यान रखता हुआ दिखाई देता हैं एवं अपना केवल भौतिक (आर्थिक) विकास करने हेतु प्रयासरत रहता है और उसमें अपने परिवार एवं समाज के प्रति जिम्मेदारी के भाव का पूर्णत: अभाव दिखाई देता है।

अतः विश्व के समस्त देशों द्वारा अपने नागरिकों एवं समाज के प्रति उत्तरदायित्व के निर्वहन को आंकने के उद्देश्य से भारत में उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण किया गया है। नई दिल्ली में दिनांक 20 जनवरी 2026 को उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक (Responsible Nations Index) का लोकार्पण किया गया। यह पहल देशों का मूल्यांकन केवल शक्ति अथवा समृद्धि से नहीं, बल्कि नागरिकों, पर्यावरण एवं वैश्विक समुदाय के प्रति उनके उत्तरदायित्व के निर्वहन के आधार पर करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। 21वीं सदी के लिए यह विमर्श समयोचित और आवश्यक है।

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक को पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने डॉक्टर अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में राष्ट्र को समर्पित किया। वैश्विक स्तर पर इस प्रकार का सूचकांक पहली बार बनाया गया है और इसे बनाने में भारत के ही विभिन्न संस्थानों ने अपना योगदान दिया है। इस सूचकांक के माध्यम से यह आंकने का प्रयास किया गया है कि विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के हित में अपने अधिकारों का उत्तरदायित्वपूर्ण प्रयोग किस प्रकार किया जा रहा है (आंतरिक उत्तरदायित्व का निर्वहन), वैश्विक समुदाय के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (बाह्य उत्तरदायित्व का निर्वहन) एवं पर्यावरण को बचाने के लिए अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (पर्यावरण उत्तरदायित्व का निर्वहन)। उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक 7 आयाम, 15 दृष्टिकोण एवं 58 संकेतकों को शामिल करते हुए निर्मित किया गया है।

विश्व के 154 देशों का इस सूचकांक के आधार पर मूल्यांकन किया गया है। सिंगापुर को इस सूचकांक की रैकिंग में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है, इसके बाद स्विजरलैंड द्वितीय स्थान पर, डेनमार्क तृतीय स्थान पर, साइप्रस चौथे स्थान पर रहे हैं। भारत को 16वां स्थान प्राप्त हुआ है। विश्व के शक्तिशाली देशों का स्थान उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक की सूची में बहुत निचले स्तर पर पाया गया है। अमेरिका 66वें स्थान पर रहा है, जो लिबिया से भी एक पायदान नीचे है। जापान 38वें स्थान पर रहा है। पाकिस्तान 90वें स्थान पर, चीन 68वें स्थान पर एवं अफगानिस्तान 145वें स्थान पर रहा है।

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण मुख्य रूप से भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), मुंबई एवं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली ने मिलकर किया है। इस सूचकांक के निर्माण में 3 वर्षों तक लगातार कार्य किया गया है एवं उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में विश्व बुद्धिजीवी प्रतिष्ठान का भी सहयोग लिया गया है। उक्त सूचकांक के निर्माण के लिए कुल 154 देशों से विभिन्न मापदंडों पर आधारित वर्ष 2023 तक के सम्बंधित आंकडें इक्ट्ठे किये गए है एवं इन आंकड़ों एवं जानकारी का विश्लेषण करने के उपरांत इस सूचकांक का निर्माण किया गया है। यह आंकड़े एवं जानकारी विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं खाद्य एवं कृषि संस्थान जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से लिए गए है।

आज पूरे विश्व में विभिन्न देशों की आर्थिक प्रगति को सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर से आंका जाता है, यह मॉडल पूंजीवाद पर आधारित है एवं इस मॉडल के अनुसार देश में कृषि, उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में हुए उत्पादन को जोड़कर सकल घरेलू उत्पाद का आंकलन किया जाता है। इस मॉडल में कई प्रकार की कमियां पाई जा रही है। किसी भी देश में पनप रही आर्थिक असमानता, गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे नागरिकों की आर्थिक प्रगति, मुद्रा स्फीति, बेरोजगारी एवं वित्तीय समावेशन जैसे विषयों पर उक्त मॉडल के अंतर्गत विचार ही नहीं किया जाता है। अमेरिका सहित विश्व के कई देशों में अब यह मांग की जा रही है कि आर्थिक प्रगति को आंकने के लिए सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि सम्बंधी मॉडल के स्थान पर एक नए मॉडल का निर्माण किया जाना चाहिए।

भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार, किसी भी राष्ट्र में आर्थिक प्रगति तभी सफल मानी जाएगी जब पंक्ति में अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक को भी समाज हित में बनाई जा रही आर्थिक नीतियों का लाभ पहुंचे। वर्तमान में, सकल घरेलू उत्पाद के अनुसार आर्थिक प्रगति आंकने के मॉडल में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं है इसीलिए कई देशों में गरीब और अधिक गरीब हो रहे है तथा अमीर और अधिक अमीर हो रहे है।

नए विकसित किए गए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक में यह आंकने का प्रयास किया गया है कि शासन प्रणाली किस प्रकार से नैतिक धारणाओं को ध्यान में रखकर अपनी आर्थिक नीतियों का निर्माण कर रही है, राष्ट्र में समावेशी विकास हो रहा है अथवा नहीं एवं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दायित्वों के निर्वहन के संदर्भ में सरकार द्वारा किस प्रकार की नीतियां बनाई जा रही हैं। साथ ही, धर्म आधारित सदाचार सम्बंधी भारतीय सभ्यता एवं वैश्विक सुख शांति स्थापित करने के सम्बंध में किस प्रकार देश की नीतियां निर्धारित की जा रही हैं, इस विषय को भी उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में स्थान दिया गया है।

पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक प्रगति तो तेज गति से करती दिखाई देती हैं और कई पश्चिमी देश आज विकसित देशों की श्रेणी में शामिल भी हो गए हैं। परंतु, इन देशों में मानवतावादी दृष्टिकोण का पूर्णत: अभाव है। पूंजीवाद पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में केवल “मैं” के भाव को स्थान प्राप्त है। “मैं” किस प्रकार आर्थिक प्रगति करुं, इस “मैं” के भाव में परिवार एवं समाज कहीं पीछे छूट जाता है। इससे पश्चिमी देशों में सामाजिक तानाबाना पूर्णत: छिन्न भिन्न हो रहा है।

युवा वर्ग अपने माना पिता की देखभाल करने के लिए तैयार ही नहीं हैं। आज अमेरिका में लगभग 6 लाख बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं क्योंकि उनके बच्चे उन्हें अकेला छोड़कर केवल अपना आर्थिक विकास करने में संलग्न हैं। इसी प्रकार की कई सामाजिक कुरीतियों ने पश्चिमी देशों में अपने पैर पसार लिए हैं। पश्चिमी सभ्यता के ठीक विपरीत, भारतीय संस्कृति में “मैं” के स्थान पर “हम” के भाव को प्रभावशाली स्थान प्राप्त है। भारतीय सनातन संस्कृति पर आधारित संस्कारों को ध्यान में रखकर ही विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के प्रति उनके उत्तरदायित्व को आंकने का प्रयास उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के माध्यम से किया गया है।

संक्षेप में एक बार पुनः यह बात दोहराई जा सकती है कि उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक विविध देशों का आंकलन पारम्परिक शक्ति अथवा सकल घरेलू उत्पाद केंद्रित मानकों के बजाय उत्तरदायी शासन के आधार पर करता है। यह सूचकांक तीन मूल आयामों पर आधारित है- (1) आंतरिक उत्तरदायित्व अर्थात गरिमा, न्याय और नागरिक कल्याण का आंकलन करता है।
(2) पर्यावरणीय उत्तरदायित्व अर्थात प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु कार्यवाही का मूल्यांकन करता है।
(3) बाह्य अत्तरदायित्व अर्थात शांति, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक स्थिरता में किसी देश के योगदान को मापता है।

यह सूचकांक वैश्विक आंकलन को आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के पारम्परिक मानकों से पृथक कर नैतिक शासन, सामाजिक कल्याण, पर्यावरणीय संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व पर केंद्रित करता है। यह सूचकांक मूल्य आधारित और मानव केंद्रित ढांचे को बढ़ावा देता है, जो नैतिक नेतृत्व, सतत विकास और वैश्विक शासन में सुधार सम्बंधी भारत की दृष्टि के अनुरूप है। इस प्रकार भारत ने वैश्विक स्तर पर संभवत: प्रथम सूचकांक जारी किया है। यदि वैश्विक स्तर पर कई देश इस सूचकांक के आधार पर अपने देश के नागरिकों के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के आंकलन पर ध्यान देने का प्रयास करेंगे तो निश्चित ही उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक पूरे विश्व में एक क्रांतिकारी सूचकांक के रूप में स्थापित होगा।

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