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अचानक क्यों ढीले पड़े ट्रंप के तेवर?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
March 7, 2026
in विश्व
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donald trump
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नई दिल्ली। ईरान युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल पर प्रतिबंधों में ढील देने का संकेत दिया है। जानिए कैसे इस ग्लोबल संकट के बीच भारत को सस्ता रूसी तेल खरीदने की छूट मिली और यह भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत क्यों है।

वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ दिनों में एक बड़ा और हैरान करने वाला बदलाव देखने को मिला है। हमेशा आक्रामक रुख अपनाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अचानक रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे दी। इसके साथ ही, बिना किसी शोर-शराबे के भारत ने अपने लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत हासिल कर ली है।

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रूसी तेल पर प्रतिबंधों में ढील देने की तैयारी

अमेरिकी ट्रेजरी (वित्त) मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिकी सरकार और अधिक रूसी तेल से प्रतिबंध हटाने पर विचार कर रही है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। इससे ठीक एक दिन पहले, अमेरिका ने भारत को मॉस्को से तेल खरीदने की अस्थायी मंजूरी दी थी।

बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की रणनीति

फॉक्स बिजनेस से बात करते हुए ट्रंप के मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा, ‘हम अन्य रूसी तेलों से भी प्रतिबंध हटा सकते हैं।’ उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि समुद्र में करोड़ों बैरल प्रतिबंधित कच्चा तेल जहाजों पर मौजूद है। अनिवार्य रूप से, उन पर से प्रतिबंध हटाकर ट्रेजरी बाजार में एक नई सप्लाई पैदा कर सकता है।

अमेरिका ने इस बात पर जोर दिया है कि इन नए कदमों का उद्देश्य मॉस्को को राहत देना बिल्कुल नहीं है। रूस पर ये प्रतिबंध यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की बातचीत में उसके आचरण के कारण लगाए गए थे। अमेरिका का कहना है कि यह नई छूट केवल उस सप्लाई को प्रभावित करेगी जो पहले से ही ट्रांजिट में है या जहाजों पर लदी है। बेसेंट ने यह भी कहा कि इस संघर्ष के दौरान बाजार को राहत पहुंचाने के लिए अमेरिका लगातार नए कदमों की घोषणा करता रहेगा, क्योंकि तेल की ऊंची कीमतें अमेरिकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए परेशानी का सबब बन गई हैं।

भारत को मिली विशेष छूट

इससे पहले गुरुवार को, अमेरिकी सरकार ने आर्थिक प्रतिबंधों में अस्थायी रूप से ढील दी थी ताकि समुद्र में फंसे रूसी तेल को भारत को बेचा जा सके। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न प्रतिबंध व्यवस्थाओं द्वारा रोके गए जहाजों से होने वाले लेनदेन सहित इस तरह की खरीद-फरोख्त को 3 अप्रैल, 2026 के अंत तक के लिए अधिकृत किया गया है।

अचानक क्यों ढीले पड़े ट्रंप के तेवर? 

अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर से प्रतिबंध हटाने या ढील देने के पीछे रूस से कोई प्रेम नहीं है, बल्कि यह एक भयंकर आर्थिक और भू-राजनीतिक मजबूरी है। अमेरिका और इजरायल का ईरान के साथ जो सीधा युद्ध छिड़ गया है, उसने खाड़ी क्षेत्र में आग लगा दी है। ईरान के जवाबी हमलों के कारण ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ से होने वाला व्यापार लगभग ठप हो गया है।

दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। इस चोकपॉइंट के बंद होने से महज एक हफ्ते में कच्चे तेल की कीमतों में 30% का भारी उछाल आया है। शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमतों में 8.5 प्रतिशत का भारी उछाल दर्ज किया गया। यह उछाल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्य पूर्व का यह युद्ध केवल ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण पर ही समाप्त होगा।

अमेरिका में बढ़ती महंगाई और पेट्रोल की ऊंची कीमतें राष्ट्रपति ट्रंप के लिए घरेलू स्तर पर राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। ट्रंप ने भले ही ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण तक युद्ध जारी रखने की बात कही हो, लेकिन वे जानते हैं कि लंबे समय तक तेल की इतनी ऊंची कीमतें अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकती हैं। बाजार को शांत करने के लिए अमेरिका को तुरंत किसी भी कीमत पर बाजार में तेल की जरूरत है।

रूसी तेल से और बैन हटा सकता है अमेरिका: इसका मतलब क्या है?

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का बयान बहुत नपा-तुला लेकिन स्पष्ट है। अमेरिका रूस पर लगे मूल प्रतिबंधों को खत्म नहीं कर रहा है, बल्कि एक तकनीकी ढील निकाल रहा है। बेसेंट के अनुसार, प्रतिबंधों के कारण करोड़ों बैरल रूसी कच्चा तेल वर्तमान में जहाजों पर समुद्र में फंसा हुआ है।

अमेरिका इन विशेष जहाजों पर से प्रतिबंध हटाकर इस तेल को बाजार में उतारना चाहता है। इससे वैश्विक आपूर्ति बढ़ेगी और तेल की कीमतों में कुछ नरमी आएगी। वाशिंगटन इसे रूस को राहत के तौर पर पेश नहीं कर रहा है। उनका तर्क है कि यह केवल ट्रांजिट में फंसे तेल के लिए है, न कि रूस के भविष्य के तेल उत्पादन के लिए। यह अमेरिका की मजबूरी में उठाया गया कदम है ताकि वैश्विक तेल संकट को टाला जा सके।

खामोश रहकर भी भारत की जीत कैसे?

इस पूरे वैश्विक उथल-पुथल में भारत सबसे बड़े विजेता के रूप में उभरा है, और वह भी बिना अमेरिका से कोई सीधा टकराव मोल लिए। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। महंगे तेल का सीधा असर भारत की महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अमेरिका ने भारत को 3 अप्रैल 2026 तक समुद्र में फंसे इस रूसी तेल को खरीदने की विशेष और अस्थायी छूट दे दी है। चूंकि यह तेल प्रतिबंधित और फंसा हुआ था, इसलिए भारत इसे रूस से भारी डिस्काउंट पर खरीद सकेगा। इससे भारत का आयात बिल काफी कम होगा।

भारत ने इस पूरे संकट में ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ बनाए रखी। भारत ने ना तो अमेरिका का विरोध किया और ना ही रूस से अपने संबंध तोड़े। खामोश रहकर भारत ने बस सही समय का इंतजार किया। अमेरिका को वैश्विक तेल बाजार को क्रैश होने से बचाने के लिए भारत जैसे बड़े खरीदार की जरूरत थी, जो इस तेल को खपा सके। पहले जो तेल खरीदने पर भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा मंडराता था, अब वही तेल भारत अमेरिकी सरकार की ‘आधिकारिक मंजूरी’ से खरीदेगा।

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