नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से उछाल आया है. फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद से ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 30 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है. हाल ही में यह करीब 9 फीसदी उछलकर 93 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. ऊर्जा बाजार में इस तेजी ने दुनिया भर के निवेशकों को चिंतित कर दिया है. क्योंकि तेल की कीमतें बढ़ने का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरी अर्थव्यवस्था की लागत संरचना को प्रभावित करता है. यही वजह है कि भारतीय शेयर बाजार के निवेशक भी अब सतर्क नजर आ रहे हैं.
भारत के लिए क्यों अहम है कच्चा तेल
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है. देश अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 फीसदी तेल विदेशों से खरीदता है. ऐसे में तेल की कीमतों में हर एक डॉलर की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल पर बड़ा असर डालती है. अनुमान है कि प्रति बैरल एक डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल करीब 16 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है. अगर तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो इससे देश का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, रुपया कमजोर हो सकता है और आर्थिक संतुलन पर दबाव आ सकता है.
महंगाई बढ़ने का खतरा भी गहराया
ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी आमतौर पर महंगाई को बढ़ावा देती है. जब पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं तो परिवहन और उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है. इससे कई जरूरी वस्तुओं की कीमतों में भी तेजी आ सकती है. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो महंगाई दर में भी उछाल आ सकता है. भारत में महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए केंद्रीय बैंक 2 से 6 प्रतिशत का लक्ष्य रखता है, लेकिन तेल की कीमतों में लगातार तेजी इस लक्ष्य को चुनौती दे सकती है.
खाड़ी क्षेत्र से जुड़े अन्य आर्थिक जोखिम
मिडिल ईस्ट संकट का असर केवल तेल तक सीमित नहीं है. भारत अपनी खाद और अन्य कच्चे माल का बड़ा हिस्सा भी इसी इलाके से आयात करता है. अगर वहां सप्लाई बाधित होती है तो कृषि और उद्योग दोनों की लागत बढ़ सकती है. इसके अलावा खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों से आने वाली रेमिटेंस यानी विदेश से भेजी जाने वाली रकम भी प्रभावित हो सकती है. अगर वहां आर्थिक गतिविधियां धीमी होती हैं तो भारत को मिलने वाली विदेशी मुद्रा में कमी आ सकती है.
शेयर बाजार और रुपये पर दबाव की आशंका
तेल की कीमतों में तेजी का असर शेयर बाजार और मुद्रा बाजार पर भी पड़ सकता है. जब आयात बिल बढ़ता है तो विदेशी निवेशक भी सतर्क हो जाते हैं. इससे विदेशी पूंजी का बाहर निकलना बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव बन सकता है. रुपया कमजोर होने से आयात और महंगा हो जाता है, जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ जाता है. यही कारण है कि मौजूदा हालात में भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने की संभावना जताई जा रही है.
क्या आरबीआई बढ़ा सकता है ब्याज दरें?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेगा या नहीं. अभी तक तेल की कीमतों का पूरा असर खुदरा महंगाई पर नहीं पड़ा है. विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल तेल कंपनियां कीमतों का कुछ बोझ खुद उठा रही हैं और पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत नहीं बढ़ाए गए हैं. इसलिए निकट भविष्य में महंगाई का असर सीमित रह सकता है. हालांकि अगर तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है तो नीति निर्माताओं को सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं. फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि वे वैश्विक घटनाओं और ऊर्जा बाजार की दिशा पर करीबी नजर बनाए रखें.







