सतीश मुखिया (विशेष रिपोर्ट)
मथुरा: भारतीय चुनाव आयोग द्वारा कल उपचुनाव की मतगणना की गई जिसके परिणाम राजनीतिक दलों के लिए आशा के अनुरूप नहीं रहे और सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बिहार राज्य की बांकीपुर विधानसभा का चुनाव रहा जो कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के बाद वहां के स्थानीय विधायक नवीन सिन्हा के इस्तीफा कारण खाली हुई थी। इस विधानसभा पर भारतीय जनता पार्टी का लगभग 30 वर्ष से विधायक था लेकिन जन स्वराज के संस्थापक प्रशांत किशोर द्वारा इस सीट पर भारी मतों से विजय प्राप्त की गई। राजनीति में हार जीत लगी रहती है लेकिन जिस तरह से चल हार हुई वहां अपने आप में एक चिंतन का विषय है।
उपचुनावों का परिणाम आने के बाद इस विषय पर विभिन्न मीडिया द्वारा टिप्पणियां की गई। यह बिहार में ही संभव है क्यों कि राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा जागरूक अगर कहीं की कोई जनता है तो बिहार की ही है, बिहार का नाम आते ही मन में उत्सुकता सी पैदा होती है मुझे भी वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कार्य करने का मौका मिला। इस दौरान मेरे द्वारा मगध, सीमांचल और मिथिलांचल के क्षेत्र का दौरा किया और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बिहार को समझने की कोशिश की। मैंने देखा कि बिहार में टैलेंट की कोई कमी नहीं है लेकिन रोजगार और उद्योगों की कमी होने के कारण मजदूरों को दूसरे राज्यों में जाकर परिवार के भरण पोषण हेतु कार्य करना पड़ रहा है।
इस दौरान गांव गांव चट्टी चौराहे जाकर लोगों की समस्याओं को सुना और समझा। इस दौरान उनसे जानने की कोशिश की कि आप किसको मत देना चाहते हैं तो उन्होंने बताया कि भैया काऊ को दे ले, कोई कछुआ है न करें जब मिलने जावे तो कोई तो दिल्ली पहुंच जावे और कोई पटना में A.C में बंद हो जावे।
मत और मतदान के प्रति इतना निराशाजनक माहौल क्यों बन गया यह समझ नहीं आया एक तरफ भारतीय चुनाव आयोग द्वारा विभिन्न जागरूक कार्यक्रम चलाकर मतदान के प्रतिशत को बढ़ाने की कोशिश की जाती है वहीं दूसरी तरफ जनता द्वारा अपना मत देने में निराशा व्यक्त करना लोकतंत्र के लिए हानिकारक ही नहीं खतरनाक परिस्थितियों का संकेत है ।ऐसी कौन से कारण रहे जो आम मतदाता को अपना मत देने से रोक रहे हैं क्या उसकी आस्था लोकतंत्र से हट चुकी है या वह भारतीय राजनीति में कुछ ऐसा चाहते हैं जो बड़े बदलाव का सूचक बने और उनके लिए उम्मीद की किरण बनकर पैदा हो वैसे चमत्कार तो हर राज्य में होते हैं लेकिन बिहार अपने संघर्ष और चमत्कारों के लिए पहले से ही प्रसिद्ध रहा है व बिहार राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ही नहीं भारतीय राजनीति में अपना विशेष स्थान रखता है।
बिहार में न जाने कितने चुनाव हुए और कितने परिणाम आए लेकिन बांकीपुर विधानसभा में हुए उप चुनाव की चर्चा जितनी आज हो रही है उतनी चर्चा किसी उपचुनाव की नहीं हुई। बिहार में लगभग 20 साल सत्ता चलाने के बाद नीतीश कुमार के द्वारा मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद भारतीय जनता पार्टी द्वारा सम्राट चौधरी पर अपना दाँव लगाया और बांकीपुर विधानसभा से विधायक रहे नवीन सिन्हा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उस सीट पर हुए उप चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारा लेकिन उम्मीदवार अपेक्षाओं पर खड़ा नहीं उतना और जन स्वराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर से लगभग 20000 वोटो से मात खा गया।
अब सवाल यह उठता है कि जिस सीट पर पार्टी का 30 वर्ष से कब्जा था। राज्य और केंद्र में एनडीए की सरकार होने के बावजूद आम मतदाता पार्टी प्रत्याशी पर भरोसा क्यों नहीं कर पाया या यूं कहें कि जैन जी आंदोलन, यूजीसी को लेकर स्वर्ण की नाराजगी श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में हुई चंदा चोरी का प्रकरण स्वच्छ राजनीति और विकास के मुद्दों पर भारी पड़ गया। बिहार ने अनगिनत जाति संघर्ष, हिंदू मुस्लिम दंगों और राष्ट्रीय जनता दल के मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद यादव का दौर भी देखा है वही भूमिहार के हितों की लड़ाई लड़ने वाले ब्रह्मेश्वर मुखिया को कौन भूल सकता है।







