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Home राष्ट्रीय

भारत छोड़ो आंदोलन के आखिरी क्रांतिकारी कृष्ण कुमार खन्ना!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
August 18, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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Krishna Kumar Khanna
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कौशल किशोर


नई दिल्ली: शनिवार 8 अगस्त 2026 को भारत छोड़ो आंदोलन की आखिरी निशानी रहे कृष्ण कुमार खन्ना चले गए। पिछले साल समाजवादी नेता डा. जी.जी. पारिख की विदाई के बाद इसकी इकलौती निशानी के रुप में वही हमारे बीच शेष थे। उन्होंने 1942 में शेखुपुरा कचहरी में अंग्रेजी झंडा यूनियन जैक जलाने का क्रांतिकारी कार्य किया था। इस मामले में सात साल कारावास की सजा मिली थी। लेकिन उनकी अवस्था देख कर पहले ही छोड़ दिया गया था। उत्तराखंड के गांधी माने जाने वाले सुन्दर लाल बहुगुणा उन्हें अपना बड़ा भाई और बेहद करीबी दोस्त मानते थे। न्यायालयों में बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सक्रियता का मैं हमेशा मुरीद रहा हूं। इस मामले में पिछले 18 सालों से वह बराबर चर्चा ही नहीं, बल्कि सत्याग्रह भी करते रहे हैं। देश के प्रति यह संजीदगी उनकी असली पहचान थी।

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तमाम तरह के आडम्बर से दूर रहने वाले इस योद्धा को मेरठ में खन्ना स्पोर्ट्स का पर्याय मानते हैं। सरहद पार पंजाब के शेखुपुरा में 27 अप्रैल 1925 को उनका जन्म हुआ था और 21 साल की अवस्था में विभाजन का शिकार हुए थे। उन्होंने 2017 में आजादी के सत्तर साल का जश्न मनाने के लिए सरहद पार कर पुराना घर देखने का काम भी किया था। 101 सालों की उनकी इस यात्रा में वीरता और धीरता के गीत बराबर गूंजते हैं। बेहतर स्वास्थ्य की वकालत के साथ ही एक ऐसा गीत सुनाई देता है, जिसे एस. एन. सुब्बाराव के जीवन में महसूस किया था। विनोबा भावे का गीत जय जगत उनके जीवन में भी बराबर ध्वनित होता रहा।

अल जजीरा ने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी आजादी और विभाजन का सत्तरवाँ साल मनाने के उद्देश्य से। इसका शीर्षक था, मेमोरीज ऑफ पार्टीशन : वन मेन्स रिटर्न टू पाकिस्तान। असद हाशिम की डॉक्यूमेंट्री के केंद्र में नायक कृष्ण कुमार खन्ना हैं। अपने पुराने घर में पुरानी चीजों को देख कर भावुक होने से पहले इस सफर के लिए उन्हें कई सालों का लंबा प्रयास करना पड़ा था। उनकी इस कहानी से आगाज़ ए दोस्ती और अमन की आशा को वाकई बल मिलता है। भारत पाक मैत्री की पैरवी करने वाले लोगों के बीच इसकी खूब अहमियत है। कभी इसमें कुलदीप नैयर, सत्य पाल ग्रोवर और सैयदा हमीद के संग अटल बिहारी वाजपेयी और इन्द्र कुमार गुजराल जैसे पूर्व प्रधान मंत्री भी खड़े होते रहे। दक्षिण एशियाई बिरादरी जैसे गैर राजनीतिक मंच व सार्क जैसे राजनीतिक अभियान को गति देने में ऐसी पहल मददगार साबित होती है।

विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान से मेरठ आकर विक्टोरिया पार्क के स्पोर्ट्स कॉलोनी में बस गया था। उनके पिता ने खेल का सामान बनाने का काम शुरु किया। इसमें सहयोग करने लगे थे। आज खन्ना स्पोर्ट्स और खन्ना प्रोडक्ट्स मेरठ ही नहीं बल्कि देश की शान मानी जाती है। आजादी के बाद विनोबा भावे और सुन्दर लाल बहुगुणा जैसे गांधीवादी नेताओं के साथ मिल कर उन्होंने राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। 1952 में पहली बार सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी और कामचोरी के खिलाफ घंटा बजाने का अभियान शुरु किया था। चार दशक बाद 1992 में इस विषय में उनकी रणनीति बदलती है। उन्होंने भजन गाने और घंटा बजाने को जन जागरण का औजार बना लिया था। इसे उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया था। इस विषय में हमारी बातें होती रही है।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनकी सजा कम कर दिया गया था। आखिरकार नौ माह बाद उन्हें जेल से मुक्ति मिली थी। कुल चार बार जेल जाने वाले इस सत्याग्रही को सबसे लंबा कारावास इमर्जेंसी के दौरान झेलना पड़ा था। उन्नीस महीने की सजा पाने वाले लोगों में उनका भी नाम दर्ज है। न्यायालय में भ्रष्टाचार को उन्होंने देश की सेवा में गंभीर त्रुटि मान कर बराबर आवाज बुलंद करने का प्रयास किया है। इसके कारण उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा। मेरठ में 31 जुलाई 1998 को न्यायालय में सत्याग्रह के दौरान 7 दिनों की सजा हुई थी। पांच साल बाद दोबारा 18 सितंबर 2003 को न्यायालय में सत्याग्रह करने के कारण 50 दिन लम्बे कारावास की सजा हुई थी।

भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके पत्र और पोस्टर किसी अभियान से कम नहीं साबित होते हैं। प्रत्येक बुधवार को पोस्टर लेकर कचहरी पहुंच जाते थे। यह अपील प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंचाने के लिए उन्होंने एक पत्र 2015 में मुझे भी लिखा था। उसके बाद दिल्ली से उत्तराखंड की ओर जाने पर उनका आशीर्वाद लेने के लिए मेरठ में विराम का रिवाज सा हो गया। आखिरी बार जब रण सिंह आर्य जी के जीवन विद्या कैंप से बिजनौर से लौट रहे थे, तो उनसे भेंट हुई थी। हैरत की बात है कि इसे दो साल होने को है।

सुन्दरलाल बहुगुणा के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय और मेरठ में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की एक यात्रा पर 2008 में गया था। यह गंगा नदी पर लिखी किताब के छपने से पहले की बात है। मेरठ में हम लोग 1 विक्टोरिया पार्क स्थित खन्ना जी के घर ही ठहरे थे। तीन दिनों की इस यात्रा में विश्वविद्यालय समेत शहर में कई जगह पर हमारे व्याख्यान हुए थे। पहली बार न्यायालयों में बढ़ते भ्रष्टाचार के मामले में हमारी चर्चा तभी शुरु हुई थी। उनकी मुस्कुराहट में ताजगी कमाल की थी। उनके जाने से भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल रहे क्रांतिकारियों की शेष बची अंतिम निशानी भी मिट जाती है।

सौ साल के उनके इस जीवन में नई पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश हैं। सत्य और न्याय के प्रति समर्पण को जीवन में सर्वोच्च स्थान दिया। स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति भी वही संजदगी उनके जीवन में मिलती है। पिछले कई सालों से प्रत्येक रविवार को वे शहर की सफाई करने निकलते थे। इन सभी उपलब्धियों को ध्यान में रख कर पूरे देश को उन्हें याद करना चाहिए। उनके विदा होने पर मेरठ में उनकी श्रद्धांजलि सभा हुई। प्रो. रण सिंह आर्य और दूसरे साथियों की वजह से यह बिजनौर तक पहुंच कर एक सिलसिला साबित होता है। दिल्ली में उनकी स्मृति में देश भर के लोग जमा हो सकते हैं।

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