Upgrade
पहल टाइम्स
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
No Result
View All Result
पहल टाइम्स
No Result
View All Result
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • ईमैगजीन
Home राष्ट्रीय

महात्मा गांधी का भारत छोड़ो आन्दोलन

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
August 8, 2022
in राष्ट्रीय
A A
1
VIEWS
Share on FacebookShare on Whatsapp

इन्हें भी पढ़े

el niño

भारत पर मंडरा रहा गंभीर खतरा! 180 से ज्यादा वैज्ञानिकों की चेतावनी- कुछ तो बड़ा होने वाला है

September 20, 2026
Rahul Gandhi's

राहुल गांधी का युवा कनेक्ट, डूसू में कांग्रेस का डि-कनेक्ट, अब रणनीति पर उठे सवाल !

September 20, 2026
ABVP's dominance in DUSU elections

विश्लेषण : डूसू चुनाव में एबीवीपी का दबदबा, जेन ज़ी के वोट पर क्यों छिड़ी बहस?

September 20, 2026
Dattatreya Hosabale

श्रम साधक मजबूत होंगे तो समाज और भविष्य दोनों मजबूत होंगे : दत्तात्रेय होसबाले

September 20, 2026
Load More
कौशल किशोर
दूसरे विश्व युद्ध के उत्तरार्द्ध में अहिंसा की नीति के महानायक ही “करो या मरो” का नारा देते हैं। 8 अगस्त 1942 के दिन गोवालया टैंक गार्डन इसका साक्षी हुआ था। इसकी पहचान आज अगस्त क्रांति मैदान के रुप में होती है। अगली सुबह होने से पहले महात्माजी के साथ तमाम कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार किया गया था। ब्रिटिश सरकार कांग्रेस की गतिविधियों पर रोक लगाने हेतु इसे अवैध संगठन घोषित करती है। फिर जिन लोगों को मौका मिला उन्हें अब नेता मानना देश का सौभाग्य ही है। भारत में अरुणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, जय प्रकाश नारायण और लाल बहादुर शास्त्री जैसे लोग नेता साबित हुए और विशाल जन आंदोलन का सूत्रपात भी हुआ। इतिहास में भारत छोड़ो आंदोलन की यही कहानी है। इसके अस्सी साल आज पूरे हो गए। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांच साल पहले इसकी स्मृति में “करेंगे और करके रहेंगे” का नारा दिया था। पांच सालों में जिन पांच सूत्रीय कार्यक्रमों को साकार करने का सपना उन्होंने देखा था, उनकी समीक्षा का भी यह उचित अवसर है।
कांग्रेस नेताओं द्वारा विश्व युद्ध के शुरु होते ही 1939 में आजादी की डील होने लगी। इसके लिए क्रिप्स मिशन तीन साल बाद भारत आया। इसकी असफलता के साथ यह मांग तेज होती गई। मुंबई में हुए इस अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन के शंखनाद से एक महीना पहले ही कांग्रेस ने सम्पूर्ण स्वराज की मांग शुरु की। उसी दौर में सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी और जापान के साथ मिलकर आजादी का रोड मैप तैयार किया था। भगत सिंह और आजाद जैसे क्रांतिकारियों ने 9 अगस्त 1925 को हुए काकोरी कांड की स्मृति में आयोजन शुरु किया था। उसी दिन सत्रह साल बाद इस जन आंदोलन की चिंगारी सुलगती है। इसे बुझाने में सरकार के पसीने छूट गए थे। गांधीजी की अहिंसा के साथ भगत सिंह, आजाद व सुभाष चंद्र बोस क्या इसकी पृष्ठभूमि में नहीं दिखते? भयाक्रांत सरकार इसे कुचलने का अभियान साल भर चलाती रही।
गांधीजी को भारत छोड़ो का नारा मुंबई के मेयर यूसुफ मेहर अली से मिला। अली ने इस पर एक पुस्तिका भी लिखी। गांधीजी के आह्वान के बाद ही हजारों लोग हिंसा की आग में भस्म हुए थे। आंदोलनकारियों ने अहिंसा की नीति भूल कर 550 डाकघर, 250 रेलवे स्टेशन, 70 पुलिस स्टेशन, 85 सरकारी भवनों और 2500 जगहों पर रेल लाइन और संचार सेवा को ध्वस्त किया। इसके दो दशक पहले चौरी चौरा कांड के बाद आंदोलन वापस लेकर महात्माजी ने अहिंसा का पाठ पढ़ाया था। पर इस जन आंदोलन में हुई हिंसा पर उनकी प्रतिक्रिया हैरत में डालती है। वायसरॉय के आग्रह के बाद भी इस हिंसा की निंदा न कर उन्होंने स्वयं को इससे पृथक माना। विश्व युद्ध के दौरान सेना में भर्ती के सवाल पर वह फिरंगियों का समर्थन करते हैं। इस मामले में मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की राजनीति भी गौर करने लायक है।
उस ऐतिहासिक भाषण के दौरान गांधीजी स्वयं पर हिंसा की पैरवी के आरोप पर बात करते हैं। करो या मरो का आह्वान कर उन्होंने वायसरॉय लिनलिथगो की नजरों में राजद्रोह का अपराध किया था। अहिंसक नीति और हिंसक रणनीति के समीकरण पर ब्रिटिश सरकार ने बिना जेल का जिक्र किए कैद की रणनीति अपनाई। इस कैद के पांचवें दिन उन्होंने वायसरॉय को लिखे खत में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की वह घोषणा समझने में हुई भूल का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा था कि सीधी कार्रवाई के विधिवत उद्घाटन से पहले इन बातों का कोई मतलब नहीं है। चिट्ठी की इस श्रृंखला में उन्होंने ही स्वयं को सरकार के हित में कार्य करने वाला व्यक्ति माना है। किन्तु तमाम दलीलों के बाद भी वायसरॉय को संतुष्ट नहीं कर सके। आखिरकार अपनी बात मनवाने के लिए तीन सप्ताह का अनशन करते हैं। इसके बावजूद भी ब्रिटीश सरकार उनसे सहमत नहीं हुई। आगा खां पैलेस में ही उनके निजी सचिव महादेव देसाई और पत्नी कस्तूरबा गांधी की मौत हुई। जब उनके बचने की संभावना नहीं रही तो 6 मई 1944 को रिहा किया गया था। इस बीच उनकी याचिकाओं में आन्दोलन से पल्ला झाड़ने की ही कवायद है।
दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद भारत छोड़ो आंदोलन खत्म हुआ। अगले साल सरकार के गठन के लिए देश भर में चुनाव हुए। संविधान सभा का भी गठन हुआ। हालांकि भारत छोड़ो आंदोलन सफल नहीं हो सका, पर इसके कारण देश भर में आजादी का बिगुल जोरशोर से बजने लगा था। कांग्रेस जैसे राजनीतिक संगठन के अभाव में यह आम जनता का प्रतिरोध साबित हुआ। इस बीच मुस्लिम लीग पाकिस्तान के लिए तैयारियां करने में व्यस्त रही। पांच साल के बाद आजादी का वरदान और देश के विभाजन का अभिशाप मिला।
पांच सूत्रीय कार्यक्रम पर नरेन्द्र मोदी करेंगे और करके रहेंगे का संकल्प देश के सामने रखते हैं। गरीबों को अधिकार, नौजवानों को रोजगार, अशिक्षा और कुपोषण को दूर करने के साथ महिलाओं के प्रोत्साहन का यह सूत्र सुर्खियों में है। हालांकि पिछले पांच सालों में इन लक्ष्यों को पूरा नहीं किया जा सका है। महामारी व वैश्विक परिस्थिति के कारण इस बीच चुनौतियां बढ़ती गई। इसके बावजूद यह संकल्प पूरा करने के दृढ़ विश्वास का प्रतीक है। ऐसी निश्चल भावना से आगे बढ़ने वालों को रोक पाना संभव नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सतत विकास का लक्ष्य पूरा करने का अभियान चलाया जा रहा है। इन दोनों में मौजूद समानता पर गौर करना चाहिए।
महात्माजी के अंतिम जन तक पहुंचने की यह राजनीति इक्कीसवीं सदी के महात्मा से परिचय कराती है। करो या मरो के नारे में निहित हिंसा और निराशा से दूर रहने की वजह से नया नारा अहिंसक, रचनात्मक और बेहतर है। गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण और अशिक्षा की समस्या को दूर करने से महिलाओं की बेड़ियों से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है। सरकार और समाज को इन्हें पूरा करने के लिए जोरदार मेहनत करने की जरूरत है। आजादी का अमृत महोत्सव मनाने में लगा देश यदि इन सभी बातों का ख्याल रखे तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्द स्वराज का सपना साकार हो। ऐसा होने पर भारतीय उपमहाद्वीप में शांति और समृद्धि सुनिश्चित होगी।

इन्हें भी पढ़ें

  • All
  • विशेष
  • लाइफस्टाइल
  • खेल
opposition parties meeting patna

एकता से पहले ही ‘गठबंधन’ में दरार, इन पार्टियों ने दिखाए तेवर

June 25, 2023

राजस्थान में प्रचार थमा, मतदान कल

November 24, 2023

उत्तराखंड: सैन्य गांव सवाड़ पर पल्ला झाड़ते अधिकारी

November 17, 2023
पहल टाइम्स

पहल टाइम्स का संचालन पहल मीडिया ग्रुप्स के द्वारा किया जा रहा है. पहल टाइम्स का प्रयास समाज के लिए उपयोगी खबरों के प्रसार का रहा है. पहल गुप्स के समूह संपादक शूरबीर सिंह नेगी है.

Learn more

पहल टाइम्स कार्यालय

प्रधान संपादकः- शूरवीर सिंह नेगी

9-सी, मोहम्मदपुर, आरके पुरम नई दिल्ली

फोन नं-  +91 11 46678331

मोबाइल- + 91 9910877052

ईमेल- pahaltimes@gmail.com

Categories

  • Uncategorized
  • खाना खजाना
  • खेल
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • दिल्ली
  • धर्म
  • फैशन
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • विश्व
  • व्यापार
  • साक्षात्कार
  • सामाजिक कार्य
  • स्वास्थ्य

Recent Posts

  • ‘यह सनातन और वैदिक परंपरा अपमान’, गयाजी में ऑनलाइन पिंडदान के विरोध में पुरोहित
  • सीएम रेखा गुप्ता का ऐलान, साउथ रिज में 1000 एकड़ से बढ़ेगा ग्रीनरी का दायरा!
  • पीएम मोदी ने 10 मीटर राइफल में सिल्वर जीतने वाली महिला टीम को दी बधाई!

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.

  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.