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Home राष्ट्रीय

महात्मा गांधी के बलिदान का अमृत महोत्सव

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 30, 2023
in राष्ट्रीय, विशेष
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The petty politics of Gandhi vs Savarkarकौशल किशोर |
twitter @mrkkjha


गांधी स्मृति अथवा बिड़ला हाउस 30 जनवरी 1948 की शहादत से परिभाषित होती है। इस बलिदान के कारण 16 अगस्त 1946 से जारी उस हिंसक दौर का अंत हुआ, जो अखंड भारत के विभाजन की कहानी बयां करती है। इस बीच कम से कम 500 दिनों तक चलने वाले गृह युद्ध और अंतर्कलह में बीस लाख लोग मारे गए और विस्थापित भी कम नहीं हुए। अब मानचित्र पर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे तीन देश दिखने लगे हैं। अपनी लाश पर पाकिस्तान बनने की बात करने वाले गांधीजी ने “हे राम” कह कर जिस शांति का आह्वान किया वह पूरा हो गया। नोआखली की गलियों से लेकर नई दिल्ली की प्रार्थना सभा तक उन्होंने इसे साबित किया था। इसी बीच साम्प्रदायिक सौहार्द कायम करने हेतु अनशन करते हैं। भयानक हिंसा की प्रज्जवलित अग्नि को उनकी आहुति के बाद ही शांति मिली।

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भारत विभाजन के दौर में हिंसक घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है। जिन्ना और मुस्लिम लीग ने सीधी कार्रवाई का दिन मुकर्रर कर पाकिस्तान के लिए आवाज बुलंद किया। गांधी इस हिंसा को रोकने के लिए अनशन तक करते हैं। इस बलिदान से देश में अमन तो कायम हुआ पर विभाजन के बाद दक्षिण एशिया में अशांति का माहौल भी पनपता है। अकेले पाकिस्तान तीन विनाशकारी युद्ध के लिए जिम्मेदार है। हाल ही में पाकिस्तानी नेता शाहबाज शरीफ ने इन तीनों युद्ध से सबक सीखने की बात स्वीकार किया है। भारत के प्रधानमंत्री से अपील कर स्थाई शांति की बात उठाते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में शांति सुनिश्चित करने से महात्मा गांधी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होती है तथा विनाशकारी हथियारों का व्यापार बंद कर वैश्विक शांति स्थापित करने से उनकी शहादत का अमृत महोत्सव होता है।

इसी बीच संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव अमीना मोहम्मद वास्तविकताओं से रू-ब-रू कराती हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे हिंसक संघर्षों के इस दौर में एक चौथाई मानवता युद्ध क्षेत्रों में रहने को विवश होती है। लोगों की सुरक्षा भावना प्रायः सभी देशों में कम हुई है। नाइजीरिया की पूर्व पर्यावरण मंत्री ने दुनिया भर के सात लोगों में से छह को असुरक्षा की भावना से ग्रस्त माना। इसके कारण गरीबी और खाद्य संकट के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित लोगों की ओर उन्होंने ध्यान आकृष्ट किया। इसके बावजूद युद्ध और हिंसा की आग में जलती दुनिया को बचाने की जिम्मेदारी के मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ फिसड्डी साबित हुआ है। सैन्य औद्योगिक परिसर में बदल चुकी दुनिया सामूहिक विनाश के हथियार के विस्तार में लगी है। ऐसी दशा में गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह की राजनीति पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो जाती है।

इस युद्ध के बदले बातचीत से मसले हल करने का सुझाव प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी नेता पुतिन को दिया था। अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन समेत तमाम नेटो देश यूक्रेन के साथ हैं। चीन ताइवान पर घात लगाए बैठा है। साथ ही भारत और चीन की सेना का भी तकरार का रह रह कर उभरता। अंदर बाहर हिंसक युद्ध की विभीषिका कई और देशों की हकीकत बन गई है। अमीना मोहम्मद ने अफगानिस्तान की यात्रा कर वहां महिलाओं एवं बच्चों की दयनीय स्थिति से अवगत कराया है। कमजोर तबके की हालत कहीं ज्यादा खराब है। अमीर गरीब की खाई तेजी से गहराने लगी है। महामारी और आर्थिक मंदी भी इस आग में घी डालने का काम करती है। इसी के साथ गांधीजी की मूर्ति लगाने का खेल जारी है। उनके शहादत के अमृत महोत्सव तक पहुंचने से पहले मूर्ति एवं चित्र के मामले में इतिहास रचा गया था। बुतों में कैद करने के बदले महात्मा को समझना होगा।

गांधी सत्याग्रह, अहिंसा और शांति के पर्याय हैं। उन्होंने आंख के बदले आंख के नियम से अंधी होने वाली पूरी दुनिया का खाका खींच दिया था। उनके बलिदान का अमृत महोत्सव पूरी दुनिया में शांति सुनिश्चित करने के संकल्प में निहित है। गांधी की हत्या के बाद ऐतिहासिक घटना के तौर पर तिब्बत का पतन दर्ज है। मानवता की बात करने वाली दुनिया कुदरत के सबसे ऊंचे क्षेत्र में बसने वाले लोगों की रक्षा से चूकती क्यों है? यह सिर पर मुकुट के बदले जूता पहनने जैसा ही है। गांधीवादियों ने इस दोष को दूर करने के बदले क्या किया? यह जानकर कोई खुशी नहीं होती है। तिब्बत के शरणार्थी न्याय की मांग करते रहे। यह सिलसिला आज भी जारी है। हिंद स्वराज हाथों में थामने वाले निर्वासित तिब्बती सरकार के पहले प्रधानमंत्री समधोंग रिनपोचे इंतजार करने को विवश हैं। इस मामले में ध्यान नहीं देने के कारण हिमालय में चीख पुकार मची है।

बलिदान का अमृत महोत्सव ‘गांधी गोडसे एक युद्ध’ के रूप में सामने है। नाटककार असगर वजाहत ने नाटक लिखा, गोडसे@गांधी.कॉम। राजकुमार संतोषी ने इसे बड़े परदे पर गांधी गोडसे एक युद्ध के रूप में प्रदर्शित किया है। तुषार गांधी और कांग्रेस पार्टी प्रदर्शन के पहले से ही इसका विरोध करते हैं। मध्य प्रदेश में यह सड़कों पर पहुंच गया था। महाराष्ट्र में इसके निर्देशक को जान से मारने की धमकियां भी मिली। गांधीवाद के नाम पर ही यह तत्व खड़ा हुआ है। लंबे अरसे से यह सक्रिय है। गोडसे के समर्थकों को पहले खत्म करने का काम किया गया। नारायण गोडसे समेत अनेक निर्दोष लोग मौत के घाट उतारे गए थे। पर सरकार सोती रही और समाज भी। बदले की यह भावना गांधी के अनुकूल नहीं है।

इतिहास को परदे पर प्रदर्शित करने में पीरियड फिल्म का चलन बढ़ रहा है। बापू की हत्या पर अमेरिकन इतिहासकार और लेखक स्टेनली वोल्पर्ट ध्यान केंद्रित करते हैं। साठ के दशक मे ‘नाइन अवर्स टू रामा’ लिखते हैं। इसे शीघ्र मार्क रॉबसन बड़े परदे पर प्रदर्शित करते हैं। भारत सरकार ने इस किताब और फिल्म को बैन किया था। हालांकि अस्सी के दशक में बनी गांधी के लिए रिचर्ड एटनबरो को खूब सराहना मिली। कमल हासन ने इसी त्रासदी पर ‘हे राम’ बनाई। वजाहत और संतोषी इसमें गोली लगने से मौत के बदले घायल गांधी का इलाज कर कहानी को आगे बढ़ाते हैं। कबीर और गांधी के मिलन की कल्पना में प्रो के.एन. तिवारी ‘उत्तर कबीर नंगा फकीर’ जैसा उपन्यास रचते हैं। आजादी के इस अमृत महोत्सव में यह भी चर्चा का विषय बनी। उत्तर कबीर दक्षिण फकीर तक बात पहुंचती है।

गांधी के हिंद स्वराज की छाप इन तीनों विद्वानों की रचना में मिलती है। संतोषी इस विमर्श को गांधी के ब्रह्मचर्य और स्त्री पुरुष प्रसंग में लपेट कर एक मजेदार व्यंजन पेश करते प्रतीत होते। कवि, नाटककार, साहित्यकार और फिल्मकार को गांधीजी आगे भी प्रेरित करते रहेंगे। बेहतर हो सकता है यदि उद्योगपतियों, राजनेताओं और हथियारों के सौदागरों को भी सही दिशा में प्रेरित कर सकें।

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