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Home राजनीति

किशनगंज में कांग्रेस-AIMIM बने रोड़ा, क्या है मंशा?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 29, 2025
in राजनीति, राज्य
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Congress and AIMIM
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किशनगंज: बिहार का किशनगंज जिला अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित प्रदेश का एक मात्र जिला है। बांग्लादेश की सीमा सीधे किशनगंज को छूती है। उसके अलावा किशनगंज से पश्चिम बंगाल और नेपाल की सीमा भी जुड़ती है। किशनगंज एक तरह से तस्करों का गढ़ रहा है। इसके अलावा किशनगंज एक मात्र रास्ता भी रहा राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल होने वालों के प्रवेश का।

नेपाल से होते हुए किशनगंज के रास्ते देश के अन्य हिस्सों में आतंकी गतिविधि करने वाले पहले भी एंट्री करते रहे हैं। किशनगंज बांग्लादेशी घुसपैठ का सबसे बड़ा रास्ता है। ड्रग्स के साथ, हथियार और मवेशी तस्करी का बहुत बड़ा जाल किशनगंज से जुड़ा हुआ है। उस लिहाज से भारत सरकार का यहां आर्मी बेस कैंप बनाना बहुत मायने रखता है। सवाल उठता है कि आखिर इसका विरोध क्यों हो रहा है?

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आर्मी बेस कैंप पर बवाल!

किशनगंज जिला मुस्लिम बहुल इलाका है। यहां मुस्लिम जनसंख्या 70 फिसदी है। सुरक्षा कारणों की वजह से गृहमंत्री भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की निगाहें इस जिले पर बनी रहती हैं। सुरक्षा कारणों से कुछ साल पहले बीएसएफ ने एक दशक पहले यहां एक बेस कैंप की स्थापना की थी। उसके बाद अब भारत सरकार की ओर से जिले के कोचाधामना, बहादुरगंज और नटुआपारा में आर्मी बेस कैंप की स्थापना करने जा रही है।

उसके लिए जमीन अधिग्रहण का काम किया जाना है। उससे पहले ही इसका विरोध शुरू हो गया है। ग्रामीणों को सीखा कर, उन्हें बरगला कर नेता अपनी रोटी सेंक रहे हैं। ओवैसी की पार्टी के नेता और कांग्रेस नेता इसका विरोध कर रहे हैं। हालांकि, नेताओं का दावा ये है कि वे सिर्फ ग्रामीणों की डिमांड सरकार तक पहुंचा रहे हैं।

आर्मी बेस कैंप पर विवाद

किशनगंज की सीमा पड़ोसी देश नेपाल और बाग्लादेश से लगी हुई है। बांग्लादेश की सीमा जिले से 20 किलोमीटर की दूरी पर है। कई बार घुसपैठ सीमावर्ती इलाकों में होता है। ग्वालिन एक बिहार का गांव है, जो बांग्लादेश से सटा हुआ है। कई बार देश विरोधी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को यहां संचालित करने वाले तत्वों की गिरफ्तारी हुई है। घुसपैठिये आसानी से मुस्लिम आबादी के साथ मिल जाते हैं।

पिछले चार दशकों में किशनगंज में घुसपैठियों की संख्या में इजाफा हुआ है। हाल के विधानसभा चुनाव में आयोग ने ऐसे पौने दो लाख वोटरों को लिस्ट से हटाया है, जो संदिग्ध थे। किशनगंज तस्करों का सेफ जोन है। यहां से मवेशियों को बांग्लादेश भेजा जाता है। किशनगंज जिले से नमक और खाद की तस्करी भी अन्य देशों में होती है। इन गिरोहों को स्थानीय नेताओं और घुसपैठियों को भी विभिन्न पार्टी के नेताओं का संरक्षण मिला हुआ है। कई बार ड्रग्स और हथियार की बरामदगी हो चुकी है।

ओवैसी की पार्टी का विरोध

हाल में ओवैसी की पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान के नेतृत्व में पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिला था। नेताओं ने कोचाधामन और बहादुरगंज में आर्मी बेस कैंप निर्माण का विरोध किया था। विधायकों में सरवर आलम, मुर्शीद आलम, गुलाम सरवर और बहादुरगंज विधायक तौसीफ आलम शामिल थे। इन नेताओं ने मुख्यमंत्री से किसानों की समस्या की बात बताई थी। उन्होंने मिलिट्री स्टेशन का दूसरी जगह पर निर्माण करने की सिफारिश की थी।

बताया जा रहा है कि गृहमंत्री अमित शाह की इस पर पूरी तरह निगाह है। उन्होंने सीमा सुरक्षा बल के साथ बैठक की थी। उन्होंने बांग्लादेश को लेकर सुरक्षा की दृष्टि से इस इलाके को गंभीर माना था। उन्होंने आर्मी बेस कैंप निर्माण की जरूरत बताई थी। गृहमंत्री ने हाल के विधानसभा चुनाव के दौरान अररिया में एक बैठक की और सीमांचल में घुसपैठ की समस्या और सुरक्षा की समस्या को लेकर आर्मी बेस कैंप की जरूरत पर बल दिया था।

बेस कैंप का विरोध गलत- जानकार

सवाल सबसे बड़ा ये है कि ओवैसी की पार्टी के साथ कांग्रेस के नेता भी इस बेस कैंप निर्माण का विरोध कर रहे हैं।स्थानीय जानकारों की मानें, तो इसके पीछे कारण वो वोट बैंक है, जो बाद में घुसपैठ से जिले में प्रवेश करते हैं। उसके बाद वोटर बन जाते हैं। किशनगंज से कांग्रेस के सांसद जावेद आजाद और किशनगंज के विधायक कमरुल होदा ने बहादुरगंज और कोचाधामन के किसानों से मुलाकात की। उसके बाद उन्होंने किसानों को कहा कि उन लोगों ने राजनाथ सिंह से मुलाकात कर सारी बात बताई है। रक्षा मंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वो इस मामले को देखेंगे। उन्होंने किसानों की समस्या के संबंध में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक पत्र लिखा है।

कांग्रेस नेता भी इस आर्मी बेस कैंप के विरोध में हैं। जानकार कहते हैं- इस सैन्य प्रतिष्ठान का रणनीतिक महत्व अतिशयोक्तिपूर्ण है। महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय चुनौतियों वाले एक संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित यह शिविर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। फिर भी एआईएमआईएम और कांग्रेस राष्ट्रीय रक्षा से ऊपर धार्मिक चिंताओं को प्राथमिकता देते हैं। वे किसानों की चिंताओं का दुरुपयोग करते हैं। वे नागरिकों और सैनिकों के बीच संघर्ष पैदा करते हैं।

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