नई दिल्ली। शायद गोल्डमैन सैक्स को भी इल्म नहीं रहा होगा कि चार बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए गढ़ा गया एक आम सा नाम एक दिन राजनीतिक और आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा. BRICS में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और सऊदी अरब जैसे नए देशों के जुड़ने से यह और भी पावरफुल हो चुका है.
इकोनॉमी के मामले में गाड़े झंडे
आंकड़ों की किताब उठाकर देखेंगे तो पाएंगे कि BRICS की हिस्सेदारी दुनिया की कुल जीडीपी में करीब 40 फीसदी हो चुकी है, जो वेस्ट के संगठन G7 से भी ज्यादा है. पिछले दो दशकों की रिपोर्ट कार्ड से मालूम चलता है कि इसके सदस्य देशों के बीच आपसी व्यापार 13 गुना बढ़कर 1.17 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है और ग्लोबल एक्सपोर्ट में भी इनकी भागीदारी दोगुनी होकर 24 प्रतिशत पर आ गई है.
हालांकि, एक्सपर्ट मानते हैं कि इस संगठन के आगे कई अहम चुनौतियों के साथ-साथ सीमाएं भी हैं. सीनियर जर्नलिस्ट आरएन भास्कर के मुताबिक, शुरुआत में भले ही यह एक आर्थिक विचार था, लेकिन रूस ने बहुत पहले इसकी राजनीतिक काबिलियत को समझा और इसे प्लेटफॉर्म में तब्दील कर दिया. आज अमेरिका हर देश पर प्रतिबंध लगा रहा है, बावजूद इसके BRICS काम कर रहा है और दुनिया के कई देश डॉलर छोड़कर बाकी करेंसी में ट्रेड करने को राजी हो रहे हैं.
एक्सपर्ट्स ने गिनाईं चुनौतियां
दूसरी ओर, मशहूर इकोनॉमिस्ट प्रो. मनोज पंत का कहना है कि BRICS देशों के बीच ट्रेड तो बढ़ा है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा सिर्फ चीन की ‘बाहुबली’ मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन पर टिका हुआ है. उन्होंने चिंता जताई कि सदस्य देशों की छोटी और मीडियम साइज इंडस्ट्रीज के बीच अभी तक वैसा गहरा रिश्ता नहीं बन पाया है जो किसी एक पावरफुल इकोनॉमी ब्लॉक में होना चाहिए. व्यापार बढ़ने के बावजूद इनका इकोनॉमिक सिस्टम आपस में पूरी तरह नहीं जुड़ सके हैं.
भारत कैसे बन सकता है संकटमोचक
BRICS का सबसे अहम कदम न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना है, जो विकासशील देशों को उनकी स्थानीय मुद्राओं में इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए फंड दे रहा है. 2026 में अगुआई के दौरान भारत का रुख किसी भी पश्चिमी देश से सीधा टकराव मोल लेने का नहीं है. भारत का फोकस इस प्लेटफॉर्म को सियासी विवादों से बचाते हुए कारोबार, टेक्नोलॉजी शेयरिंग, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI/UPI) को बढ़ावा देने के साथ-साथ इकोनॉमिक कॉपरेशन बढ़ाने पर है.
आखिर में देखें तो नतीजा यही समझ आता है कि BRICS देश पश्चिमी देशों के प्रभाव को खत्म करना नहीं चाहते बल्कि उसका एकाधिकार कम हो जाए,इस पर काम कर रहे हैं. पिछले 20 साल में BRICS ने दुनिया की इकोनॉमी पर चल रह बहस को तो तेजी से बदला है, लेकिन अगले दो दशक बेहद अहम हैं. देखना होगा कि क्या यह वाकई यह एक इंटीग्रेटेड और मजबूत आर्थिक ब्लॉक बन पाता है या केवल बातचीत का एक बड़ा मंच बनकर रह जाता है.







