कानपुर: देश के कई राज्यों में पाए जाने वाला एकमात्र ये एक ऐसा पौधा है, जो फ्री में बिना पानी के कहीं भी उग जाता है. नहरों और रेलवे ट्रैक के किनारे उगने वाली लंबी हरी कांस घास को देखकर जानवर अपना मुंह मोड़ लेते हैं तो किसानों के लिए भी ये एक तरह की खर-पतवार ही होती है. इस हरी घास का अन्य किसी तरह का भी कोई उपयोग नहीं होता. पर, शायद आपको जानकर हैरानी होगी कि ये हरी घास आने वाले समय में देशवासियों के लिए एथेनॉल के रूप में बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है.
ढाई साल तक चली खोज: अपने शोध कार्य से इसको चरितार्थ कर दिखाया है, शहर के हरकोर्ट बटलर प्राविधिक विवि (एचबीटीयू) के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर ललित कुमार सिंह ने. करीब ढाई सालों तक इस घास पर ही शोध करते हुए उन्होंने पहली बार कांस घास से एथेनॉल बना दिया वहीं, खास बात ये भी है कि इस एथेनॉल का उपयोग करने के लिए इंडियन ऑयल समेत अन्य पेट्रोलियम कंपनियां भी तैयार हैं.
प्रो. ललित सिंह ने कहा कि पहली बार देश में प्लांट बेस्ड मैटीरियल से एथेनॉल बनाया गया है. वहीं, उनके इस शोध को पेटेंट भी मिल गया है. उन्होंने कहा, मौजूदा समय में देश के अंदर जो एथेनॉल बनता है, उसे शीरे यानी मोलेसिस से बनाया जाता है. लेकिन, अब कांस घास से भी एथेनॉल बनाया जा सकता है, जबकि एक और रोचक बात ये है कि दोनों प्रकार के एथेनॉल की गुणवत्ता में जरा सा भी फर्क नहीं है.
क्या है एथेनॉल.
मक्के और चावल से भी बनता एथेनॉल: प्रो. ललित सिंह ने बताया कि देश में कहीं-कहीं पर मक्के और चावल का उपयोग कर एथेनॉल तैयार किया जा रहा है. मगर, फूड सिक्योरिटी संबंधी नियमों को देखते हुए मक्के और चावल का बहुत अधिक उपयोग करना उचित नहीं है. इसलिए हमें किसी न किसी समय शीरे का एक विकल्प ढूंढना ही था. ऐसे में कांस घास सबसे बेहतर विकल्प बन गया. क्योंकि, इसमें किसी तरह का कोई खर्च नहीं है, ये पूरी तरह से प्राकृतिक है. ये खुद जमीन में उगती है और इससे पर्यावरण को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं है.
कांस घास
एथेनॉल जैसे मालीक्यूल कांस घास में भी मौजूद: प्रो. ललित सिंह ने बताया, एथेनॉल का मॉलीक्यूल C₂H₅OH है. कांस घास में भी यही मॉलीक्यूल मिलता है. कांस घास से एथेनॉल बनाने के लिए सबसे पहले इसे सेलुलोज मैटीरियल में ब्रेक करते हैं. इसके बाद इसे ग्लूकोज में बदल लेते हैं. फिर उससे एथेनॉल तैयार हो जाता है. प्रोफेसर ने बताया कि शीरे के मुकाबले कांस घास से एथेनॉल बनाने में खर्च अधिक आता है. हालांकि, जिस तरह दिनोंदिन क्रूड आयल के दाम बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए कांस घास से बना एथेनॉल एक बेहतर विकल्प बन सकता है.
घास से ऐसे बनेगा एथेनॉल
एथेनॉल क्या है? रासायनिक सूत्र C₂H₅OH. साइंस डायरेक्ट डॉट कॉम के अनुसार एथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जो गन्ना, मक्का और कसावा जैसे कृषि उत्पादों से बनता है. इसे पेट्रोल में मिलाकर फ्यूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है. दुनिया में ज्यादातर एथेनॉल गन्ने से बनता है. इसमें ब्राजील नंबर वन है. जबकि, अमेरिका में एथेनॉल मक्के से बनाया जाता है.
एथेनॉल कैसा दिखता है: एथेनॉल एक रंगहीन, पारदर्शी तरल पदार्थ है जो पानी जैसा दिखता है. यह पानी में पूरी तरह से घुल जाता है. पानी में मिलाने पर एथेनॉल का स्वाद थोड़ा मीठा होता है. कॉन्सनट्रेट यानी सांद्रित होने पर इसका स्वाद तीखा और जलन पैदा करने वाला होता है. साथ ही इसकी गंध ईथर जैसी होती है.
एथेनॉल के प्रमुख उपयोग-
प्रदूषण कम करने और कच्चे तेल की निर्भरता घटाने के लिए इसे पेट्रोल में मिलाया जाता है (जैसे E20 पेट्रोल). 20% इथेनॉल और 80% गैसोलीन से बने ऑटोमोटिव ईंधन मिश्रण को E20 ईंधन कहा जाता है.
कीटाणुओं को मारने के लिए इसका उपयोग हैंड सैनिटाइज़र और एंटीसेप्टिक वाइप्स में होता है.
ये शराब और बीयर जैसे मादक पेय पदार्थों का मुख्य सक्रिय घटक होता है.
एथेनॉल के फायदे-
- पेट्रोल के मुकाबले रीज़नेबल: पेट्रोल की मौजूदा कीमतों को देखते हुए एथेनॉल मददगार साबित हो सकता है. जहां पेट्रोल देश में 110 से 120 रुपये प्रति लीटर में बिक रहा है वहीं एथेनॉल की कीमत इससे 40 से 50 फीसदी तक कम है.
- किसानों को फायदा: एथेनॉल एक बायो फ्यूल है, इसे बनाने के लिए मुख्य रूप से फसलों के अवशेष का इस्तेमाल होता है. जैसे कपास के डंठल, पराली, खोई, भूसा, बांस आदि. भविष्य में एथेनॉल की डिमांड बढ़ने पर इसका सीधा फायदा किसानों को मिलेगा. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक आने वाले समय में एथेनॉल की खूब आवश्यकता है, उसमें कोई कमी नहीं है. अभी 465 करोड़ एथेनॉल देश में मिलता है, मांग बढ़ने पर इसका उत्पादन बढ़ेगा, जो किसानों की आय में इजाफा करेगा.
- प्रदूषण कम होगा- एथेनॉल का इस्तेमाल करने पर प्रदूषण का स्तर भी कम होगा. देश में बढ़ते प्रदूषण की बड़ी वजहों में से एक है गाड़ियों से निकलने वाला धुंआ. फ्लेक्सी इंजन और फ्लेक्सी फ्यूल के इस्तेमाल से प्रदूषण का स्तर कम होगा. जानकारों के मुताबिक एथेनॉल के इस्तेमाल से 30 से 40 फीसदी कार्बन मोनोऑक्साइड के साथ बड़ी मात्रा में सल्फर डाईऑसक्साइड, कार्बन आदि का उत्सर्जन कम होगा. जो पर्यावरण और हमारे दोनों के लिए फायदेमंद होगा.
- कच्चे तेल पर निर्भरता कम- एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से कच्चे तेल पर निर्भरता भी कम होगी. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक भारत फिलहाल 8 लाख करोड़ रुपये का कच्चा तेल आयात करता है, अगर खपत इसी तरह से बढ़ती रही तो आने वाले 5 सालों में 25 लाख करोड़ रुपये का तेल आयात होगा. कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी तो तेल का आयात कम होगा जिससे अरबों रुपये तेल खरीद की बजाय अन्य विकास कार्यों में लगाया जा सकेगा.
- सरप्लस अनाज का इस्तेमाल- आज देश में मक्का, चीनी और गेहूं का उत्पादन सरप्लस में है. देश के गोदामों में अनाज अटा पड़ा है. हर 6 महीने में कई फसलें इन गोदामों में पहुंचती है, जहां भंडारण की व्यवस्था सीमित है. इस अतिरिक्त अनाज का इस्तेमाल भी एथेनॉल बनाने में हो सकता है. देश में हर साल मक्के और गन्ने की बंपर फसल होती है, जो एथेनॉल के उत्पादन में मददगार साबित हो सकती है.
- पराली से मुक्ति- पंजाब, हरियाणा से लेकर यूपी समेत कई राज्यों के किसान पराली की समस्या से हर साल जूझते हैं. जिससे पार पाने के लिए किसान इसे जलाते हैं, जो प्रदूषण की वजह बनते हैं. हर साल सर्दियों में दिल्ली में प्रदूषण के लिए पराली का जलना भी जिम्मेदार है. इस पराली का इस्तेमाल बायो फ्यूल या एथेनॉल बनाने के लिए हो सकता है. ऐसे में जिस पराली को वो जलाते हैं वो उनकी कमाई का जरिया बन सकता है.
किन-किन देशों में हो रहा पेट्रोलियम उत्पादों में एथेनॉल का प्रयोग: दुनिया में भारत, ब्राजील, अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन, कनाडा, थाईलैंड, जर्मनी, अर्जेंटीना, फ्रांस, जापान, यूनाइटेड किंगडम और फिलीपींस में पेट्रोलियम उत्पादों में एथेनॉल का प्रयोग किया जाता है. एथेनॉल सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण में सुधार करता है. सुरक्षा लाभ प्रदान करता है और एक सुदृढ़ परिवहन प्रणाली में योगदान देता है.







