नई दिल्ली: नई दिल्ली में एक बयान आया और उसने भारत के ऊर्जा भविष्य को लेकर उम्मीदों से भरा एक बहुत सकारात्मक सवाल खड़ा कर दिया. सवाल यह कि क्या जो देश इस समय सबसे अधिक ऊर्जा का इम्पोर्ट करने वाले टॉप तीन देशों में शामिल है, वो आने वाले वर्षों में खुद ऊर्जा एक्सपोर्ट करने वाला देश बन सकता है?
दरअसल इस उम्मीद को भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन के उस बयान से बल मिला जो उन्होंने इंडो-जर्मन इंडस्ट्रीज डायलॉग में दिया. उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि आने वाले कुछ वर्षों में भारत ऊर्जा निर्यातक बन सकता है और जर्मनी उन देशों में शामिल हो सकता है जो भारत से ग्रीन हाइड्रोजन खरीदेंगे.
एकरमैन ने गुजरात के कच्छ में विशाल अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने जिस पैमाने पर सौर और पवन ऊर्जा क्षमता विकसित किए हैं, वे बेहद असरकारी हैं. उन्होंने भारत के ग्रीन हाइड्रोजन कार्यक्रम को बेहद महत्वाकांक्षी बताते हुए कहा कि जर्मनी और भारत हाइड्रोजन तकनीक पर बहुत ठोस तरीके से साथ काम कर रहे हैं.
उन्होंने जर्मन कंपनी थायसेनक्रुप और भारतीय कंपनी भेल के बीच ग्रीन हाइड्रोजन से जुड़े उपकरणों के लिए समझौते को भी अहम बताया. इस दौरान उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक को स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग से जोड़ना, ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन में एक बड़ा कदम है. दरअसल ये वो तकनीक है जिसमें पानी में बिजली प्रवाहित कर के उसमें मौजूद हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग किया जाता है. तो क्या भारत की ऊर्जा कहानी बदलती हुई दिखाई दे रही है.
भारत तो एनर्जी खरीदने वाला देश है?
आज बेशक भारत, दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा खरीदारों में शामिल है. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार पिछले कई वर्षों से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की बात करते रहे हैं. 2047 तक भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाना सरकार के दीर्घकालिक विजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है. और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को इसी लक्ष्य से जोड़ा गया है.
यहां एक अहम बात समझने वाली है कि भारत तेल या गैस निर्यातक बनने की तैयारी नहीं कर रहा. बल्कि ग्रीन एनर्जी एक्सपोर्टर बनने की तैयारी कर रहा है.
लेकिन सवाल ये भी उठता है कि आखिर भारत किस तरह की एनर्जी बेच सकता है?
तो इसका जवाब है- ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया, ग्रीन मेथनॉल, स्वच्छ बिजली आधारित औद्योगिक ऊर्जा उत्पाद और संभवतः ग्रीन एविएशन फ्यूल भी.
इन सभी ऊर्जा उत्पादों की खास बात यह है कि इन्हें बनाने के लिए कोयला, तेल या गैस की जरूरत नहीं होती. ये सस्ती और स्वच्छ बिजली के इस्तेमाल से भी बन सकती हैं.







