सतीश मुखिया ( विशेष रिपोर्ट )
मथुरा : भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी है चुनाव। हर व्यक्ति इसमें भागीदारी करना चाहता है चाहे आप स्थानीय स्तर के चुनाव में भागीदारी करें या विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में चुनावो को भारत में एक उत्सव के रूप में लिया जाता है अभी वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा एक देश, एक चुनाव के बिल्कुल लेकर मशक्कत कर रही है कि पूरे देश में चुनाव एक ही समय पर कराए जाएं जिससे कि समय और धन की बचत हो सके और वह धन जनता के विकास कार्यों में लगाया जा सके।
अभी हाल ही में बिहार और मध्य प्रदेश में हुए उप चुनाव की चर्चा ने भारत की राजनीति में खलबली मचा दी है क्योंकि बिहार की जनता और मध्य प्रदेश की जनता ने ऐसा मैंडेट दिया के सत्ताधारी पक्ष हतप्रद्ध रह गया और वह सोचने पर मजबूर हुआ कि जिस जनता द्वारा उसको प्रदेश में पूर्ण रूप से सरकार चलाने का जनादेश दिया था वह जनता आज उनके खिलाफ क्यों खड़ी हो गई। इन उपचुनावों के परिणाम की गूँज भारतीय राजनीति में बड़ी दूर तक सुनाई देगी और कहते हैं जब बात निकलेगी तो बड़ी दूर तलक जाएगी।
जी हां यह हम नहीं कह रहे यह भारत के गली मोहल्ले, गांव, चट्टी चौराहा पर आम चर्चा का विषय है कि कैसे एक पंचायत स्तर पर प्रधान का चुनाव जीतने वाला उम्मीदवार एक पंचवर्षीय योजना में इतना सशक्त हो जाता है कि वह आम दुपहिया वाहन से तत्काल प्रभाव से चार पहिए का वाहन मैनेज कर लेता है। सरकार द्वारा हितग्राहियों के विकास हेतु जो फंड आवंटित किया जाता है वह उस फंड का इस्तेमाल अपने विकास में कर लेता है चलिए विकास तो आखिर कर ही रहा है पंचायत का ना करके अपना ही करें कोई बात नहीं लेकिन भारतीय राजनीति में जन नेता, खांटी नेता, धरती पकड़ जननायक, लोक नायकों का एक बहुत बड़ा योगदान रहा है और देश को लगभग 80 वर्ष स्वतंत्र होने को है और हमने देखा कि प्रदेश कोई भी हो दक्षिण हो, उत्तर हो, पश्चिम हो, पूर्व हो सभी राज्यों ने बड़े महान राजनीतिज्ञो को देखा है और उन्होंने भारतीय राजनीति और लोकतंत्र को मजबूत करने में अपनी बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इन लोगों के अथक प्रयासों द्वारा ही आज लोकतंत्र में अंतिम व्यक्ति को अपनी बात कहने का हक मिला है और आज भी भारत की 70% आबादी भारत के गांव में निवास करती है और जो शहरों में बसे हुए हैं या विदेश चले गए हैं उनकी जड़ें भी भारतीय गांव से जुड़ी हुई है। गांव की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खेती, किसानी, पशुपालन प्राथमिक सेक्टर से जुड़ी हुई है और रोजमर्रा की जरूरत को पूरा करने हेतु आम आदमी आज भी संघर्ष कर रहा है और जो मूलभूत सुविधाएं उसे आजादी के समय मिल जानी थी उन सुविधाओं बिजली, पानी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के लिए वह आज भी भटक रहा है ।
अब सवाल उठता है क्या इन सब के लिए वह स्वयं जिम्मेदार है भी और नहीं भी क्योंकि जिन महापुरुषों द्वारा आजादी का सपना देखा और भारत को स्वतंत्र करने में अपना जीवन सर्वस्व न्योछावर कर दिया हमें उन लोगों से आज सीखने की आवश्यकता है पहले जिन्हें हम जन नेता मानते थे उनको मिलना बड़ा ही आसान था जब हमारे द्वारा स्थानीय स्तर पर अलग-अलग प्रदेशों में नागरिकों और ग्रामीणों से बातकी तो उन्होंने बताया कि आज नेता को मिलना बड़ा मुश्किल है क्योंकि पहले वह मिल जाते थे लेकिन अब उनसे मिलना बहुत ही मुश्किल है क्यों कि वह कब हवाई जहाज पड़कर दिल्ली और पटना पहुंच जाए पता नहीं चल पाता है।
हमारे द्वारा पूछने पर के हवाई नेता क्या होता है तो उन्होंने का भैया हवाई नेता वह होता है जिसने कभी गांव नहीं देखा, चौपाल नहीं देखी, गांव की गालियां नहीं देखी लेकिन चुनाव के समय अचानक पैराशूट से लैंड हो जाता है और किसी भी राजनीतिक पार्टी से धन बल के आधार पर टिकट लेकर चुनाव में कूद पड़ता है जिस व्यक्ति ने गांव की पगडंडियां, मजरे, पिंड नहीं देखे आप उसको क्या कहिएगा जन नेता तो बिल्कुल नहीं कह सकते, आप उसको हवा ही नेता ही कहिएगा क्योंकि वह हवा हवाई है क्यों कि भारतीय राजनीति में राजनीति करने के लिए भारत के गांव और पंचायत को समझना आवश्यक है।
भारत में कोश पर पानी और चार कोश पर वाणी बदल जाती है मेरे दोस्त, आज सोशल मीडिया का दौर है लेकिन वोट तो मतदान केंद्र पर ही पड़ता है और मतदान केंद्र से ही मतो की गिनती होती है कितना भी सोशल मीडिया पर व्हाट्सएप, फेसबुक, यूटयूब चला लो और फॉलोअर बना लो लेकिन आपको चुनाव में भागीदारी करने के लिए भारत के गांव के मर्म को समझाना पड़ेगा और जब तक आप उस दर्द को नहीं समझेंगे तो आप जैसे नतीजे अभी बिहार और मध्य प्रदेश के उपचुनाव में देख रहे हैं इस तरह के नतीजे भविष्य में भी आते रहेंगे और नेताओं को लेकर के महान कवि अदम गोंडवी ने भी कहा कि एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए, माइक रही, माला रहे और चार छह चमचे रहे।







