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Home दिल्ली

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, ‘हम पीछे नहीं जा सकते’

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 30, 2026
in दिल्ली, राष्ट्रीय, विशेष
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UGC
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प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर


नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी को “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” नामक नए नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना और समानता को बढ़ावा देना था। हालांकि, इन नियमों को विभिन्न याचिकाकर्ताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, क्योंकि इन्हें असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और सामान्य वर्ग के छात्रों को बाहर रखने वाला माना गया। 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी, और 2012 के पुराने नियमों को अस्थायी रूप से लागू रखने का आदेश दिया।

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छात्रों और शिक्षाविदों के विरोध प्रदर्शन

यह फैसला देशभर में छात्रों और शिक्षाविदों के विरोध प्रदर्शनों के बीच आया, जो इन नियमों को “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” (उल्टा भेदभाव) का माध्यम मान रहे थे। UGC के नए नियम क्या हैं ? UGC के 2026 नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए तैयार किए गए थे। इनकी मुख्य विशेषताएं हैं इक्विटी कमेटियों का गठन सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (यूनिवर्सिटी, कॉलेज आदि) को “इक्विटी कमेटी” (Equity Committees) बनानी अनिवार्य थी। ये कमेटियां जाति, जनजाति, लिंग, विकलांगता आदि आधार पर भेदभाव की शिकायतों की जांच करेंगी।

क्या है कवरेज का दायरा !

नियम मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), विकलांग व्यक्तियों और महिलाओं को कवर करते थे। भेदभाव की परिभाषा को इन वर्गों तक सीमित रखा गया था, जबकि सामान्य (जनरल) या ऊपरी जातियों को इससे बाहर रखा गया।

प्रत्येक संस्थान में एक ओम्बुड्सपर्सन (Ombudsperson) की नियुक्ति अनिवार्य थी, जो कमेटी के फैसलों की निगरानी करेगा और शिकायतों का समाधान करेगा। भेदभाव सिद्ध होने पर दोषी व्यक्तियों या संस्थानों पर जुर्माना या अन्य दंड लगाने का प्रावधान था। ये नियम UGC अधिनियम, 1956 के तहत अधिसूचित किए गए थे और 2012 के पुराने नियमों की जगह लेने वाले थे, जो मुख्य रूप से सलाहकारी प्रकृति के थे। UGC का दावा था कि ये नियम कैंपस में समावेशिता को बढ़ावा देंगे और ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों की सुरक्षा करेंगे। हालांकि, आलोचकों का कहना था कि ये नियम समाज को और अधिक विभाजित करेंगे। ये नियम 23 जनवरी 2026 को आधिकारिक रूप से लागू होने वाले थे, लेकिन अधिसूचना के तुरंत बाद विरोध शुरू हो गया।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में तर्क

नए नियमों के खिलाफ देशभर में छात्र संगठनों, जैसे NSUI और अन्य, द्वारा विरोध प्रदर्शन हुए। मुख्य चुनौतियां भेदभावपूर्ण प्रकृति याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नियम केवल SC, ST और OBC को सुरक्षा प्रदान करते हैं, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को जाति-आधारित भेदभाव से कोई सुरक्षा नहीं मिलती। इसे “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” कहा गया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव निषेध) का उल्लंघन करता है।

असंवैधानिकता नियम UGC अधिनियम, 1956 के विपरीत थे, क्योंकि वे समानता को बढ़ावा देने के बजाय विभेद पैदा करते हैं। याचिकाओं में कहा गया कि ये नियम “वाग” (अस्पष्ट) हैं और दुरुपयोग की संभावना रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में तर्क दिया गया कि ये नियम “जातिविहीन समाज” की दिशा में पीछे ले जाते हैं और शैक्षणिक संस्थानों में एकता को प्रभावित करेंगे।

28 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में याचिका की तत्काल सुनवाई की मांग की गई, जहां चीफ जस्टिस सुर्या कांत ने कहा, “We know what is happening” (हमें पता है क्या हो रहा है)। प्रदर्शनों में छात्रों ने नियमों को वापस लेने की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस सुर्या कांत और जस्टिस जोयमल्या बागची शामिल थे, ने सुनवाई की। मुख्य फैसले:स्टे का आदेश: कोर्ट ने 2026 नियमों को “too sweeping” (बहुत व्यापक), “vague” (अस्पष्ट) और “capable of misuse” (दुरुपयोग की संभावना वाला) बताते हुए इन्हें अस्थायी रूप से रोक दिया।

पुराने नियमों का जारी रहना

2012 के UGC नियम (Promotion of Equity in Higher Educational Institutions Regulations, 2012) को अंतरिम रूप से लागू रखने का निर्देश दिया गया, जो अधिक सलाहकारी और समावेशी हैं। केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया गया, और विशेषज्ञ समिति से नियमों की भाषा की समीक्षा करने की सिफारिश की गई। अगली सुनवाई मामले को 19 मार्च 2026 के लिए सूचीबद्ध किया गया। कोर्ट ने कहा कि अगर ये नियम लागू हुए तो समाज पर दूरगामी और विभाजनकारी प्रभाव पड़ सकते हैं।

भेदभाव की व्यापक परिभाषा

उच्च शिक्षा संस्थानों को अब 2012 के नियमों के अनुसार काम करना होगा, जिसमें भेदभाव की व्यापक परिभाषा है और सभी वर्गों को कवर किया जाता है। नए नियमों का गठन (जैसे इक्विटी कमेटियां) स्थगित रहेगा। फैसले का स्वागत किया गया, लेकिन कुछ संगठनों ने इसे वंचित वर्गों के खिलाफ माना। विरोध प्रदर्शन थम सकते हैं, लेकिन बहस जारी रहेगी।

UGC को नियमों में संशोधन करना पड़ सकता है ताकि वे सभी वर्गों को समान रूप से कवर करें। कोर्ट का अंतिम फैसला संवैधानिक समानता पर आधारित होगा। यह मामला उच्च शिक्षा में समानता और आरक्षण की बहस को नई दिशा दे सकता है। UGC को अधिक समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है ताकि शिक्षा प्रणाली एकजुट रहे।

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