नई दिल्ली। शनिवार को जब श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से Vikram-1 रॉकेट ने आसमान का सीना चीरते हुए अंतरिक्ष की कक्षा में कदम रखा, तो भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर ने एक नया इतिहास रच दिया. यह भारत का पहला ऐसा मौका था जब किसी प्राइवेट कंपनी से पूरी तरह तैयार हुआ रॉकेट अंतरिक्ष में सफल छलांग लगाई. इस कामयाबी के पीछे दिमाग है पूर्व इसरो वैज्ञानिक और स्काईरूट एयरोस्पेस के को-फाउंडर पवन कुमार चंदाना का.
कुछ साल पहले तक पवन ISRO में वैज्ञानिक के रूप में काम कर रहे थे. लेकिन आज, वह भारत के पहले सफल प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट मिशन के सबसे बड़े नायक बनकर उभरे हैं. उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर भारत को स्पेस-टेक की दुनिया में एक नया मुकाम दिला दिलाया.
बचपन में कमजोर थी मैथ्स, पर नहीं मानी हार
हैदराबाद के एक मिडिल क्लास फैमिली में जन्मे पवन कुमार चंदाना बचपन से कोई टॉपर स्टूडेंट नहीं थे. उनके लिए विज्ञान और गणित जैसे विषय हमेशा से आसान नहीं रहे. कई बार उन्हें इन विषयों को समझने में काफी संघर्ष करना पड़ा. लेकिन हार मानने के बजाय, उन्होंने अपने पिता के प्रोत्साहन से कड़ी मेहनत जारी रखी. यही संघर्ष आगे चलकर उनकी सफलता की नींव बना.
IIT से ISRO तक का सफर
पवन ने अपने पहले ही प्रयास में कठिन माने जाने वाले IIT-JEE एंट्रेंस एग्जाम को पास कर लिया. साल 2007 में उन्होंने IIT खड़गपुर में एडमिशन लिया और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में ड्यूल डिग्री पूरी की. साल 2012 में उनका कैंपस प्लेसमेंट देश की सबसे प्रतिष्ठित अंतरिक्ष एजेंसी यानी ISRO में हुआ. 6 साल तक इसरो में काम करते हुए उन्होंने भारत के कई बड़े स्पेस मिशनों को बेहद करीब से देखा.
जब एक सवाल ने बदल दी जिंदगी
इसरो में काम करते हुए पवन दुनिया भर की प्राइवेट स्पेस कंपनियों के शुरुआत को देखे. उनके मन में बार-बार एक ही सवाल उठता था कि जो काम अमेरिका में प्राइवेट कंपनियां कर सकती हैं, वो भारत में क्यों नहीं हो सकता? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए साल 2018 में उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने इसरो की सुरक्षित नौकरी छोड़ने का फैसला किया. अपने साथी इंजीनियर नागा भरत डाका के साथ मिलकर उन्होंने हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस नाम के स्टार्टअप की शुरुआत की.
विक्रम-एस से विक्रम-1 तक की कामयाबी
बिना किसी पुराने ब्लूप्रिंट के, इस टीम ने स्क्रैच से रॉकेट बनाना शुरू किया. साल 2022 में कंपनी ने विक्रम-एस नाम का एक सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च करके दुनिया को चौंका दिया था. और अब विक्रम-1 की सफल ऑर्बिटल लॉन्चिंग ने साबित कर दिया है कि भारत का प्राइवेट सेक्टर भी अंतरिक्ष में झंडे गाड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है.
नागा भरत डाका कौन हैं?
स्काईरूट की इस सफलता के पीछे 37 साल के एयरोस्पेस साइंटिस्ट और स्पेस एंटरप्रेन्योर नागा भरत डाका की भी बड़ी भूमिका है. हैदराबाद के रहने वाले नागा भरत बचपन से ही तेज थे, उन्होंने साल 2007 में AIEEE परीक्षा में ऑल इंडिया 91वीं रैंक और IIT-JEE में 165वीं रैंक हासिल की थी.
इसरो से करियर की शुरुआत
उन्होंने अक्टूबर 2012 में तिरुवनंतपुरम स्थित ISRO के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में एवियोनिक्स इंजीनियर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की. लगभग ढाई साल काम करने के बाद, अप्रैल 2015 में उन्होंने ISRO छोड़ दिया. इसके बाद, वह सेमीकंडक्टर कंपनी Xilinx से जुड़े और वहां सीनियर प्रोडक्ट एप्लिकेशन इंजीनियर के रूप में लगभग तीन सालों तक अपनी सेवाएं दीं.
नौकरी छोड़ रखी स्काईरूट की नींव
अंतरिक्ष क्षेत्र में कुछ बड़ा करने के इरादे से उन्होंने अगस्त 2018 में अपनी नौकरी को अलविदा कह दिया. इसके बाद उन्होंने इसरो के अपने पूर्व सहयोगी पवन कुमार चंदाना के साथ हाथ मिलाया और दोनों ने मिलकर हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत की.
यूनिकॉर्न बनी स्काईरूट, पीएम मोदी ने दी बधाई
सफलता के बाद भारत के पीएम मोदी ने खुद पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका से फोन पर बात कर उन्हें बधाई दी. कभी मुट्ठी भर इंजीनियरों के साथ शुरू हुई स्काईरूट आज 1000 से ज्यादा कर्मचारियों की कंपनी बन चुकी है. हाल ही में मिले बड़े निवेश के बाद यह कंपनी यूनिकॉर्न क्लब यानी 1 अरब डॉलर से ज्यादा वैल्यूएशन में भी शामिल हो चुकी है.







