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मोहन भागवत का बड़ा बयान- विभाजन के बाद भारत आने वाले लोग शरणार्थी नहीं, संघर्ष के योद्धा थे!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 3, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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Mohan Bhagwat
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प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर


नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए लोगों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 1947 के विभाजन के दौरान भारत आने वाले लोग “शरणार्थी” नहीं थे, बल्कि “संघर्ष के योद्धा” थे, जिन्होंने मातृभूमि और अपने धर्म के प्रति प्रेम के कारण अपार कष्ट और पीड़ा सहते हुए भारत आने का निर्णय लिया।

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डॉ. भागवत बुधवार को नागपुर में सिंधी समाज द्वारा संचालित सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के 75वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने विभाजन की त्रासदी, विस्थापन और सिंधी समाज के योगदान पर विस्तार से अपने विचार रखे।

‘मातृभूमि और धर्म के लिए सब कुछ छोड़ दिया’

मोहन भागवत ने कहा कि विभाजन के बाद लाखों लोगों ने नवगठित पाकिस्तान में अपनी पीढ़ियों से अर्जित संपत्ति, जमीन-जायदाद, व्यापार और स्थापित जीवन को छोड़कर भारत आने का कठिन निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि यह फैसला किसी मजबूरी या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि और धार्मिक पहचान की रक्षा के लिए लिया गया था।

उन्होंने कहा,”इन लोगों ने अपनी कई पीढ़ियों की कमाई, कारोबार और संपत्ति को पीछे छोड़ दिया और भारत आना स्वीकार किया। उन्होंने पूरी चेतना के साथ यह निर्णय लिया, क्योंकि वे भारतभूमि में रहना चाहते थे, जहां वे बिना किसी भय के अपने धर्म और संस्कृति का पालन कर सकें।”

‘विस्थापित थे, लेकिन शरणार्थी नहीं’

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विभाजन के बाद भारत आने वाले लोगों को ‘शरणार्थी’ कहना उचित नहीं है। उनके अनुसार, वे अपने ही देश में लौटकर आए थे और उन्होंने संघर्ष एवं त्याग की अद्भुत मिसाल पेश की। उन्होंने कहा, “वे विस्थापित जरूर थे, लेकिन शरणार्थी नहीं थे। उस समय उनके लिए ‘शरणार्थी’ शब्द का इस्तेमाल करना गलत था। वे मातृभूमि और अपने धर्म के प्रति प्रेम से संघर्ष करने वाले योद्धा थे।”

भागवत ने कहा कि इन लोगों ने सुविधाओं, संपत्ति और करियर की बजाय अपने देश और धर्म को प्राथमिकता दी और इसी कारण उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

‘भारत को एकजुट रखने की लड़ाई हम हार गए’

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने देश के विभाजन को एक ऐतिहासिक पीड़ा बताते हुए कहा कि भारत को एकजुट बनाए रखने की लड़ाई में पूरा समाज असफल रहा था। उन्होंने कहा, “भारत को एकजुट रखने की लड़ाई हम सब हार गए। यह केवल उनकी गलती नहीं थी।” उनका यह बयान विभाजन के ऐतिहासिक संदर्भ में समाज की सामूहिक जिम्मेदारी की ओर संकेत करता है।

सिंधी समाज के योगदान की सराहना

कार्यक्रम के दौरान आरएसएस प्रमुख ने सिंधी समाज के संघर्ष, परिश्रम और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद कठिन परिस्थितियों में भारत आने वाले सिंधी समुदाय ने न केवल स्वयं को पुनर्स्थापित किया, बल्कि शिक्षा, व्यापार, उद्योग और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देकर देश के विकास में अपनी मजबूत भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि विभाजन की पीड़ा को झेलने वाले लोगों के त्याग और संघर्ष को देश कभी भुला नहीं सकता और आने वाली पीढ़ियों को भी उनके योगदान और बलिदान से परिचित कराया जाना चाहिए।

विभाजन की स्मृतियों को संजोने की आवश्यकता

मोहन भागवत ने कहा कि “देश के विभाजन की घटनाएं केवल इतिहास का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे हमें एकता, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय चेतना के महत्व का भी संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि विभाजन से प्रभावित लोगों के संघर्ष और बलिदान को सम्मानपूर्वक याद किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्र और अपनी सांस्कृतिक आस्था को चुना था।

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