लखनऊ। जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में चुनाव नज़दीक आ रहे हैं वैसे वैसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उर्फ़ अजय कुमार बिष्ट राम और बाबर के बारे में ज़्यादा बात करते नज़र आ रहे हैं। मेरठ में ‘शक्ति केंद्र संयोजक सम्मेलन’ में बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि “बाबर के अनुयायियों को जवाब केवल बजरंगी के भक्त दे सकते हैं। बाबर के अनुयायियों को भगवान राम से बैर है। राम का नाम लेने से इनको इतनी ही चिढ़ होती है, जितनी बाबर को होती थी”।
मुझे उनके इस कथन से यह समझ में आ रहा है कि शायद राम के सामने बाबर को खड़ा करके योगी आदित्यनाथ आगामी चुनावों में अपने लिए फिर से साम्प्रदायिक वोट इकट्ठा करना चाहते हैं। अगर उनके हिसाब से बाबर को थोड़ी देर के लिए राम का विरोधी मान भी लिया जाये (जिसका असल में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है) तो योगी को यह बताने में संकोच नहीं करना चाहिए कि बाबर के अनुयायी कौन हैं?
जबतक योगी आदित्यनाथ इसका जवाब नहीं देते तबतक के लिए मैं मान लेती हूँ कि बाबर के अनुयायी वो लोग हैं जो राम के काम में अड़ंगा लगाते हैं और अपने आर्थिक और राजनैतिक लाभ के लिए राम के नाम का अनुचित फ़ायदा उठाते हैं। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र से उनके नैतिक गुणों से कोई लगाव नहीं है।
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी करने वाले कौन?
सबको सोचना चाहिए कि जिन लोगों ने राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की, जिनकी देख रेख में चढ़ावा चोरी चलती रही, जो जानबूझकर या अपनी अक्षमताओं की वजह से इस चोरी को पकड़ने में नाकाम रहे क्या ये सभी ‘बाबर’ के अनुयायी नहीं है? मेरी नज़र में तो हैं, निश्चित रूप से हैं। कई साल से अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की खबरें आ रही थीं। खबर देने वालों ने खुलकर चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राय का नाम लिया, इसके बावजूद यूपी पुलिस की चार्जशीट में इन तीनों को अपराधी नहीं बल्कि ‘गवाह’ बनाया गया है।
इन लोगों को मंदिर में नियुक्त करने वाला कौन है? मंदिर किस राज्य में है? राज्य का मुख्यमंत्री कौन है? इस तरह इस चोरी में जिम्मेदारी किसकी बनती है? राम जिम्मेदारी का नाम है उससे भागने का नाम नहीं। असल में इस राम मंदिर में चोरी की इस पूरी शृंखला के हर सदस्य को बड़ा अपराधी माना जाना जाना चाहिए। राज्य से लेकर केंद्र तक, प्रशासन से लेकर न्यायपालिका तक जो भी ऐसे लोगों को बचाने की कोशिश में है उन सभी को योगी की खुद की बाबर की परिभाषा के अनुसार बाबर का अनुयायी माना जाना चाहिए।
राम मंदिर में हुई चोरी को मैं राम के ख़िलाफ़ द्रोह मानती हूँ। इस अपराध की तीव्रता चुनाव जीतने या सत्ता में बने रहने से कम नहीं होगी। इस अपराध की तीव्रता भाषण देने, कांग्रेस और नेहरू को कोसने से भी कम नहीं होगी। यह सब रामद्रोह है ख़ासकर तब जबकि मुख्यमंत्री देश और प्रदेश के नागरिकों को राम और बाबर के अनुयायियों में बाँटना चाहते हैं। उनकी सोच के हिसाब से देखें तो जो राम का अनुयायी नहीं वो अपने आप ही बाबर का अनुयायी हो जाएगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हों या प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी या फिर किसी अन्य बीजेपी शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री, ये कभी अपनी काबिलियत और जनता के लिए किए गए उनके कामों के लिए वोट नहीं माँगते। इन लोगों ने कभी प्रशासनिक दक्षता का हवाला देते हुए वोट नहीं मांगा। आखिर क्यों? सबको सोचना चाहिए।
सरकारी अस्पताल की हालत
क्या योगी आदित्यनाथ अगले विधानसभा चुनावों में उनकी सरकार द्वारा खोले गए नए और पूर्णतया सरकारी मेडिकल कॉलेजों, सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालों के बारे में जानकारी देकर वोट मांगने जाएँगे? क्या योगी आदित्यनाथ जनता को यह बताने का साहस जुटा पायेंगे कि जिस राम मन्दिर का हिंदू समुदाय 500 सालों से इंतज़ार कर रहा था वह बनने के बाद वहाँ हुई लूट रोकने में वो असफल क्यों और कैसे हो गए?
योगी आदित्यनाथ राम मंदिर चढ़ावा चोरी के लिए भी विपक्ष को घेरने का काम करते रहेंगे? क्या जिन लोगों ने राममंदिर में हो रही लूट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई उन्हें ही प्रताड़ित किया जाता रहेगा?
राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत कैसी?
योगी सरकार दावा करती है कि उनके राज्य में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ गई है। शोर है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर 45 हो गई है। यह अच्छी बात है। मैं बहुत खुश हूँ यह सुनकर पर सवाल ये है कि क्या यह मात्र एक संख्या है या इन कॉलेजों में पर्याप्त सुविधाएं भी हैं? क्योंकि जब प्रदेश की राजधानी में बने, बड़े और पुराने प्रतिष्ठित अस्पतालों में सुविधाएं नहीं हैं तब इस दावे का क्या अर्थ है कि मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ गई है। अस्पताल और मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ने का मतलब सिर्फ़ दीवारों के खड़े होने से नहीं बल्कि वहाँ पढ़ाई और होने वाले इलाज की सुविधाओं और गुणवत्ता से है।
अभी सितंबर की ही घटना है एक नवजात बच्चे को इलाज के लिए सहारनपुर से लखनऊ के प्रतिष्ठित KGMU अस्पताल में लाया गया। वहाँ से उस बच्चे को राममनोहर लोहिया अस्पताल और फिर संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट (SGPGI) अस्पताल ले जाया गया। इसी बीच बच्चे की मौत हो गई। मामला हाईकोर्ट गया तो कोर्ट ने सरकार से सवाल किया कि ये है आपकी व्यवस्था? यदि इतने बड़े बड़े अस्पतालों में इलाज करने वाली व्यवस्थाओं की कमी है तो लोग कहाँ जाएँगे? कोर्ट ने इस पर सरकार से जवाब मांगा है।
इसलिए होना तो ये चाहिए कि अब, जब भी योगी आदित्यनाथ यूपी के लोगों से अपने पक्ष में वोट देने की वकालत करें तो यह भी बता दें कि आख़िर उनके राज्य में नवजात बच्चों की जान बचाने के लिए हाईकोर्ट को सामने क्यों आना पड़ता है? अपने ही नागरिकों के बच्चों को वे किसकी औलाद मानते हैं, क्या यहाँ नवजातों के बीच भी उनका विभाजनकारी दिमाग काम करेगा? और वे यह कह कर निकल जायेंगे कि कौन राम वाला है कौन बाबर वाला?







