नई दिल्ली। कैंसर न केवल शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत दर्दनाक बीमारी है, बल्कि इसका इलाज भी बहुत महंगा है और आम और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए आर्थिक रूप से बहुत भारी पड़ता है. इस बीच कैंसर के मरीजों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के ड्रग प्राइसिंग रेगुलेटर, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने दो प्लैटिनम-बेस्ड कैंसर दवाओं की सीलिंग प्राइस में 50 फीसदी बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. यह फैसला देश भर में इन दवाओं की सप्लाई में रुकावट और कमी की चिंताओं के बाद लिया गया है.
NPPA ने कैंसर की दवाओं की ज्यादा से ज्यादा कीमतें बढ़ाईं
सरकार ने कच्चे माल (प्लैटिनम) की बढ़ती कीमत की वजह से देश भर में इसकी कमी को दूर करने के लिए सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमतें 50 फीसदी बढ़ा दी हैं. NPPA के 11 जून को जारी एक नोटिफिकेशन के मुताबिक, सिस्प्लैटिन की ज्यादा से ज्यादा कीमत 7.26 रुपये प्रति ml से बढ़ाकर 10.89 रुपये प्रति ml कर दी गई है. इसी तरह, कार्बोप्लैटिन की ज्यादा से ज्यादा कीमत 60.49 रुपये प्रति ml से बढ़ाकर 90.74 रुपये प्रति ml कर दी गई है (लागू होने वाले टैक्स को छोड़कर)गई है.
इस कदम का मकसद दवाओं की कमी को दूर करना है
रेगुलेटर ने कहा कि सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन फॉर्मूलेशन की कमी और सप्लाई में रुकावट ने जरूरी ऑन्कोलॉजी (कैंसर) दवाओं की उपलब्धता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी थी. दोनों दवाओं का इस्तेमाल ओवेरियन, लंग और ब्लैडर कैंसर जैसे कैंसर के इलाज में बड़े पैमाने पर किया जाता है.
प्लैटिनम की बढ़ती कीमतों का प्रोडक्शन पर असर
इस बीच, इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि सप्लाई से जुड़ी दिक्कतों के कारण प्लैटिनम की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है. प्लैटिनम इन दवाओं को बनाने में इस्तेमाल होने वाला एक अहम रॉ मटीरियल है. नतीजतन, भारत को कैंसर की जरूरी दवाओं (जैसे सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन) की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है.सरकार ने कैंसर की दवाओं की कीमतें बढ़ा दी हैं ताकि दवा कंपनियां इनका उत्पादन फिर से शुरू कर सकें और मरीजों को दवाओं की कमी का सामना न करना पड़े.
कई फार्मास्युटिकल कंपनियां इन दवाओं का निर्माण करती हैं, जिनमें सिप्ला (Cipla), इंटास फार्मास्युटिकल्स (Intas Pharmaceuticals), नैप्रोड लाइफ साइंसेज (Naprod Life Sciences) और वीनस रेमेडीज (Venus Remedies) शामिल हैं. कीमतों में इस बदलाव से प्रोडक्शन की बढ़ती लागत का सामना कर रहे निर्माताओं को राहत मिलने की उम्मीद है.
छह महीने बाद समीक्षा की जाएगी
NPPA ने साफ किया है कि यह एक बार की बढ़ोतरी है और छह महीने बाद मार्केट के हालात को ध्यान में रखते हुए इसका रिव्यू किया जाएगा. इस कदम का मुख्य मकसद दवा कंपनियों को प्रोडक्शन जारी रखने के लिए बढ़ावा देना है ताकि मरीजों को दवाओं की कमी का सामना न करना पड़े. NPPA ने आगे कहा कि सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की संशोधित अधिकतम कीमतें सप्लाई में रुकावट को दूर करने और जरूरी ऑन्कोलॉजी दवाओं की उपलब्धता को बेहतर बनाने के लिए लागू की गई हैं. एक बार की गई यह बढ़ोतरी छह महीने बाद समीक्षा के अधीन रहेगी.







