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Home राष्ट्रीय

इक्कीस बनाम सत्ताईस में फंसे मौलाना

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 13, 2022
in राष्ट्रीय, विशेष
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कौशल किशोर


करीब तीन दशक पहले भारतीय संविधान के अनुच्छेद इक्कीस के तहत सुप्रीम कोर्ट ने इमाम को वेतन देने का फरमान जारी किया। हालांकि पंजाब जैसे सूबे में पहले से ऐसी व्यवस्था रही। इसके बाद दिल्ली सरकार भी इमाम के लिए धन का जुगाड़ करती है। केजरीवाल सरकार वोट बैंक की राजनीति साधने के लिए तीन साल पहले इसे दस हजार से बढ़ाकर 18 हजार रूपए करती है। तब से वक्फ बोर्ड के सामने आरटीआई एक्ट के तहत जानकारी मांगने वालों की भीड़ लगी है। लेकिन वाजिब सूचना देने के बदले खानापूर्ति की जा रही है। सूचना देने के मामले में आरटीआई कार्यकर्ता से सत्ता में पहुंचे केजरीवाल के नीति की आलोचना आयुक्त द्वारा अक्टूबर में उपराज्यपाल को लिख कर किया गया। तुष्टिकरण की इस राजनीति को बढ़ावा देने में लगे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला हक बताने से नहीं चूके थे। केंद्रीय सूचना आयुक्त तुष्टिकरण की इस नीति पर सवाल उठाकर समझदारी व बहादुरी का परिचय देते हैं।

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जाने-माने सूचना अधिकार कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल धार्मिक कार्यों में लगे पुजारी व इमाम को मिलने वाली सरकारी मदद से जुड़े मुद्दे पर एक दर्जन सवाल उठाते हैं। दरअसल 23 जनवरी 2019 को दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा इमामों के जलसे को संबोधित किया गया। उन्होंने इमाम और उनके सहायकों के मानदेय में वृद्धि कर अगले चुनाव में एकमुश्त वोट का जुगाड़ किया था। इस विषय में आधी अधूरी जानकारी मिलने से क्षुब्ध अग्रवाल ने केंद्रीय सूचना आयुक्त के समक्ष अपील किया था। इसकी सुनवाई के दौरान सूचना आयुक्त उदय माहुरकर दिल्ली वक्फ बोर्ड, राजस्व विभाग व मुख्यमंत्री के कार्यालय से अधिकारियों को तलब करते हैं। हैरत की बात है कि 2 नवंबर को वक्फ बोर्ड ने अग्रवाल को कोई वेतन नहीं देने की सूचना दिया था। पर तलब किए जाने के बाद 16 नवंबर को नई बात सामने आती है। वक्फ बोर्ड पहले इस मद में डेढ़ से ढ़ाई करोड़ रुपए खर्चती थी। पर यह बढ़ कर साढ़े नौ करोड़ रूपए तक पहुंच गया। इस मामले में वक्फ बोर्ड से बाहर की मस्जिदों के इमाम और उनके सहायक को क्रमशः 14 हजार और 12 हजार रुपए मासिक का प्रविधान है।

केंद्रीय सूचना आयोग 25 नवंबर के फैसले से सुर्खियों में हैं। दिल्ली की सरकार और वक्फ बोर्ड को एक महीने के भीतर वादी को पूरी सूचना निःशुल्क उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। सूचना अधिकार के हनन के कारण इसमें 25 हजार रूपये का हर्जाना भी देने का आदेश है। संविधान के अनुच्छेद 27 की गरिमा का ख्याल कर धर्म विशेष का हित साधने में राजस्व के अपव्यय पर एक नई बहस इस फैसले से जन्म लेती है। हालांकि अब तक दिल्ली सरकार अथवा वक्फ बोर्ड की ओर से इस फैसले को चुनौती नहीं दिया गया है। परंतु एटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमाणी के समक्ष क्रिमिनल कंटेंप्ट की प्रक्रिया आरंभ करने के लिए आवेदन पहुंच गया। क्या मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले तत्वों का यह पैंतरा कारगर होगा? यह सवाल मुंह बाए है।

नब्बे के दशक के आरंभ में ऑल इंडिया इमाम आर्गेनाइजेशन ने मुफ्त में इस्लाम की सेवा के बदले वेतन भत्ता पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। नतीजतन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 13 मई 1993 को मस्जिद के इमामों को पंजाब की तर्ज पर वेतन के लिए सरकार को हुक्म दिया गया। बगदाद का खलीफा खुद नमाज अदायगी का नेतृत्व करता था। जब इमाम को यह काम सौंपा गया तो बदले में पैसे का नियम बना। पर नमाज अदा कराने वाले मौलाना में मुफ्ती की कमी नहीं रही। इन बातों पर विचार कर जस्टिस आर.एम. शाही और के. रामास्वामी की पीठ द्वारा वक्फ बोर्ड अधिनियम की धारा 15 और 36 के साथ संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 23 की व्याख्या किया गया था। यह गरिमा के साथ जीवन जीने के लिए वेतन भत्ते को आवश्यक बताती है। किंतु इसमें संविधान के अनुच्छेद 27 का ख्याल रखना जरूरी नहीं समझा गया। यदि इसे ध्यान में रखा जाता तो यह जिम्मेदारी मस्जिद व उनके संचालकों की होती, राज्य अथवा केन्द्र सरकार की नहीं। शासन प्रशासन राजस्व अपव्यय के बदले इसे लागू कराने के लिए ही जिम्मेदार होती। इस सत्य को उजागर कर सूचना आयुक्त ने गलती सुधारने का आह्वान किया है। उनकी शालीनता और सत्यनिष्ठा को गाली गलौज बताने वाले अपनी मंशा उजागर करते हैं। तुष्टिकरण की यह नीति विभाजनकारी अवयवों के अनावश्यक प्रोत्साहन का नतीजा है।

पत्रकार और लेखक के तौर पर माहुरकर की सेवाओं से देश परिचित रहा। अखण्ड भारत का स्वप्न संवारने में लगे सावरकर और सौ करोड़ लोगों के साथ चलते मोदी की व्याख्या करने वाले लेखक ने सूचना आयुक्त की भूमिका निभाते हुए उस दोष की ओर इंगित किया है, जिसकी वजह से विभाजन का संकट 1947 में परवान चढ़ा था। संसद और विधानसभाओं में इस पर व्यापक विमर्श की जरूरत है। इस मामले में न्यायालय की सक्रियता मायने रखती है, किंतु अवमानना की प्रक्रिया शुरू करने से सुप्रीम कोर्ट के सामने साख का संकट पैदा होगा। गांव और मोहल्ले में इस लोकनीति पर विमर्श चल पड़ा है। यदि लोकतांत्रिक संस्थान इस सच्चाई से मुंह फेरती है तो देशहित में विघ्न पड़ेगा।

इसमें सभी धर्मों की सेवा में लगे लोगों की आर्थिक सुरक्षा की बात है। एक ओर यह निर्णय इमाम को दी जाने वाली आर्थिक मदद पर चुप्पी तोड़ने को विवश करती है तो दूसरी ओर मंदिर और अन्य धार्मिक स्थानों पर सेवारत कमजोर वर्ग की स्थिति पर सवालिया निशान लगाती है। इसका दायरा मस्जिद और इमाम तक ही सीमित नहीं है। सेकुलरिज्म के संकुचित दायरे का अतिक्रमण कर यह समानता की पैरवी कर व्यापक विचार-विमर्श को बल देती है। यह धार्मिक संस्थानों में होने वाले कमजोर वर्ग के शोषण से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है। इसलिए केंद्रीय कानून मंत्रालय को संज्ञान लेने के लिए इसे भेजा गया है।

लोकतांत्रिक समानता पर अरसे से हावी तुष्टिकरण की राजनीति से जुड़ा यह प्रश्न नया नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 9 दिसम्बर 2006 को राष्ट्रीय विकास आयोग की 52वीं बैठक को संबोधित करते हुए इसे बयां किया था। इसके बूते वक्फ बोर्ड देश भर में हजारों एकड़ जमीन पर अवैध कब्जेदार बनी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का सवाल भी इसकी परिधि से बाहर नहीं है। इक्कीस बनाम सत्ताईस की जंग में उलझे इमाम और पुजारी की मुक्ति मार्ग प्रशस्त हो। इसके लिए संविधान के इन दोनों अनुच्छेदों को ध्यान में रखकर युक्तिसंगत प्रयास करना होगा।

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