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Home राजनीति

जम्‍मू-कश्‍मीर में विधानसभा चुनाव हारकर भी कैसे ‘जीत’ गई बीजेपी?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
October 8, 2024
in राजनीति, राज्य
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kashmir bjp
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नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर की 90 विधानसभा सीटों पर वोटों की गिनती जारी है. दोपहर दो बजे तक की मतगणना में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन बहुत आराम से बहुमत के आंकड़े को पार करती नजर आ रही है. ये गठबंधन अभी 50 सीटों पर आगे चल रहा है. वहीं, बीजेपी 26 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. महबूबा मुफ्ती की पीडीपी पांच सीटों पर ही आगे चल रही है. निर्दलीय और छोटी पार्टियां 9 सीटों पर आगे हैं. जम्मू पहले की तरह बीजेपी को बढ़त मिलती दिख रही है. जम्मू रीजन में जब सीटों की सख्या कम होती थी तब भी बीजेपी लगातार कई चुनावों से 25 से 26 सीटों को जीतती रही है. 2014 और 2007 में जब सीटें बढ़ाकर 43 सीटें कर दी गई तो भी बीजेपी 26 पर ही आगे है. जबकि, कश्मीर घाटी में बीजेपी एक भी सीट पर आगे नहीं है. मतलब साफ है कि बीजेपी अनुच्छेद 370 को जम्मू कश्मीर से हटाकर भी जहां थी वही हैं. बीजेपी के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है पर एक देश और राष्ट्र के रूप में यह खुशी की वजह है.

1- धारा 370 हटाने के बाद, चुनाव का कामयाब संचालन किया

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मोदी सरकार ने वादा किया था कि वह जम्‍मू-कश्‍मीर को अलग-थलग पड़ने नहीं दिया जाएगा. सरकार बहुत पहले  से कहती रही है कि जम्मू कश्मीर में चुनाव जल्द ही होंगे. इस बीच सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ गया कि जम्मू कश्मीर में सरकार अतिशीघ्र चुनाव करवाए. सरकार चाहती तो कानून व्यवस्था का हवाला देकर चुनाव में अड़ंगा लगा सकती थी. पर सरकार ने न चाहते हुए भी अपना वादा पूरा किया. सरकार जानती थी कि चुनाव जीतने के उनकी पार्टी ने उचित तैयारी अभी नहीं हो सकी है फिर भी कश्मीर मे चुनाव संपन्न करवाया गया. बीजेपी भले ही जम्मू कश्मीर में सरकार नहीं बना पा रही है पर एक राष्ट्र के निर्माण के रूप में कश्मीर में सफलतापूर्वक चुनाव करवाना दुनिया भर को संदेश है कि भारत ने कश्मीर पर अवैध कब्जा नहीं किया हुआ है. कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव होते हैं और सभी को अपना मनपसंद जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार है.

2- कोई बायकॉट कॉल नहीं, बंपर वोटिंग हुई

जम्मू कश्मीर में पिछले कई दशकों से जो चुनाव हो रहे हैं वो आतंक के साये में होते रहे हैं. तमाम आतंकी गुटों की दहशत के साये में चुनाव सही मायने में चुनाव नहीं थे.क्योंकि बहुत से लोग वोट नहीं करते और बहुत से लोग चुनाव नहीं लड़ते थे. कई बार वोटिंग परसेंटेज इतना कम होता था कि वो पूरी आबादी का 10 परसेंट भी नहीं कहा जा सकता था. बीजेपी के ‘नया कश्मीर’ में सुरक्षा पर ज्यादा जोर दिया गया. सरकार ने आतंकवाद, अलगाववाद और पत्थरबाजी के खिलाफ जो कार्रवाई की, उसका लोगों ने स्वागत किया. हालांकि बीजेपी को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. क्योंकि बहुत से लोगों को ऐसा भी महसूस किया गया कि अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया जा रहा है.बीजेपी इस आम धारणा को बदलने में कामयाब नहीं हो सकी कि असहमति को दबाने के लिए डराया जा रहा है.आतंकी गुटों को भी लगा कि अगर निष्पक्ष चुनाव हो रहें हैं तो उसका लाभ उठाना चाहिए.

3- पुराने अलगाववादी नेताओं को चुनाव प्रक्रिया में ले आना

बीजेपी पर प्रतिबंधित जमाते इस्लामी को कश्मीर में बढ़ावा देने, टेरर फंडिंग के आरोपित सांसद इंजीनियर रशीद की पर्दे के पीछे मदद करने का भी आरोप लगा पर चुनाव में हर पक्ष को अपनी बात कहने का मौका मिला. प्रतिबंधित जमात-ए- इस्लामी जो चुनाव बहिष्कार का हिस्सा रही है, वह अब लोकतंत्र का गुणगान करती देखी गई. तमाम प्रतिबंधित संगठनों के ऐसे लोग जो पहले आतंकवादी कार्यवाही में लिप्त रहे हैं उन्हेंं भी लोकतंत्र के इस उत्सव में भाग लेने का मौका मिला. सबसे बड़ी बात ये रही कि जिन लोगों को भारतीय संविधान में विश्वास नहीं था कम से कम इस चुनाव के बहाने उन्होंने भारतीय संविधान को स्वीकार किया . चुनावी फायदे के लिए बीजेपी ने अल्ताफ बुखारी की अपनी पार्टी और सज्जाद लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस जैसी पार्टियों के साथ गठबंधन कर नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी का खास दबदबा कम करने की कोशिश की. हालांकि इन पार्टियों के साथ गठबंधन बीजेपी के लिए कुछ खास फायदेमंद साबित नहीं रहा.

4-यह पहले से अधिक लोकतांत्रिक भागीदारी वाला चुनाव

अनुच्छेद 370 की समाप्त कर केंद्र ने जम्मू कश्मीर के चुनावों को पहले से अधिक लोकतांत्रिक बना दिया. पहली बार जम्मू कश्मीर में अनुसूचित जनजातियों के लिए नौ सीटें आरक्षित की गईं हैं, जबकि अनुसूचित जातियों के लिए सात सीटें आरक्षित की गईं हैं. यही नहीं जम्मू कश्मीर के चुनावों में वाल्मीकि, गुरखा, भारत पाक विभाजन के समय पश्चिमी पाकिस्तान से आकर बसे नागरिकों को वोट डालने का अधिकार नहीं था.कोई भी लोकतंत्र अगर अपने सभी नागरिकों को वोटिग राइट नहीं देता है तो वह अधूरा ही कहलाएगा.

5-1987 में जम्मू कश्मीर में हुए चुनाव धांधली ने आतंकवाद को पहुंचाया था खाद पानी

इंडियन एक्सप्रेस में  छपी एक स्टोरी की माने तो अमेरिकी कांग्रेस को सौंपी गई 2022 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि राजीव गांधी की सरकार ने 1987 में कश्मीरी मुस्लिम आबादी को चुनाव में वोट देने से वंचित कर दिया था. कश्मीर में संघर्ष के पीछे के कारकों में से एक बहुत बड़ा कारण था. 1987 में चुनावों में की गई ज़बरदस्त हेराफेरी, उन कई कारकों में से एक थी, जिनमें पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा की गई हेराफेरी भी शामिल थी, जिसके कारण जम्मू-कश्मीर में व्यापक आक्रोश पैदा हुआ और परिणामस्वरूप 1989 तक घाटी में उग्रवाद और आतंकवाद का उदय हुआ.

दरअसल जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल जगमोहन ने 1986 में गुलाम मोहम्मद शाह के नेतृत्व वाली अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार को बर्खास्त कर दिया, जिससे घाटी में गुस्सा भड़क उठा. जगमोहन की कार्रवाई को कश्मीर की मुस्लिम बहुल पहचान को कमजोर करने के रूप में देखा गया. इन चुनावों में इतने बड़े पैमाने पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने धांधली करवाई थी कि सज्जाद लोन के पिता अब्दुल गनी लोन ने दुखी होकर कहा, इससे भारत सरकार के खिलाफ लोगों की भावनाएं और गहरी होंगी. अगर लोगों को वोट डालने की अनुमति नहीं दी जाएगी, तो उनका जहर राष्ट्र-विरोधी भावनाओं की अभिव्यक्ति के अलावा और कहां जाएगा?

घाटी के विभिन्न भागों से जिला आयुक्तों के कार्यालयों में चुनावी धांधली की खबरें आईं. घाटी के विभिन्न भागों में पार्टी मुख्यालयों और जिला आयुक्तों के कार्यालयों में चुनावी हेराफेरी और बलपूर्वक तरीकों की खबरें आती रहीं. इंडिया टुडे में इंद्रजीत बधवार की रिपोर्ट कहती है कि पट्टन में मतदान केंद्रों से नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए पूर्व-मुद्रित सम्पूर्ण मतपत्र पुस्तिकाएं बरामद की गईं, जिनमें से सभी मतपत्रों के काउन्टरफॉयल मौजूद थे. रिपोर्ट के अनुसार, इसी प्रकार की पूर्व-स्टाम्प लगी हुई पुस्तकें एमयूएफ एजेंटों को ईदगाह, हंदवाड़ा और चौदुरा में मतदान अधिकारियों से मिलीं.

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