नई दिल्ली। अमेरिका-ईरान के बीच शुरू हुई लड़ाई इस खतरनाक मोड़ तक पहुंच चुकी है कि सिर्फ सैन्य ठिकाने नहीं बल्कि अब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी इसकी जद में आ चुकी है. पहले तो अमेरिका ने ईरान के वॉटर प्लांट पर हमला करके उसके 30 गांवों को प्यासा मारना शुरू कर दिया, बदले में ईरान ने जो किया है, वो इस युद्ध का टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकता है.
खाड़ी के जल शुद्धीकरण प्लांट पर ईरान का हमला.
ईरान-अमेरिका की लड़ाई के बीच खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्ष ने एक खतरनाक मोड़ ले लिया है. अब तक ईरान जहां अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर चुन-चुनकर हमले कर रहा था, वहीं अब उसने टार्गेट बदलते हुए पहली बार बहरीन में जल शुद्धिकरण संयंत्र यानि वॉटर डिसेलिनेशन प्लांट को निशाना बनाया है. शुरुआत 7 मार्च को अमेरिका और इजराइल की ईरान के दक्षिणी केश्म द्वीप पर स्थित एक वॉटर प्लांट पर हमले से हुई, जिससे 30 गांवों की जल आपूर्ति बाधित हो गई. अब ईरान ने इसका बदला लेते हुए बहरीन में मौजूद पानी के प्लांट को टार्गेट किया है.
ईरान ने पहले बहरीन में अमेरिकी नौसेना बेस पर हमला किया और फिर एक ईरानी ड्रोन ने बहरीन के डिसेलिनेशन प्लांट को क्षतिग्रस्त कर दिया, जिसमें 3 लोगों के जख्मी होने की भी खबर है. बहरीन ने इसे संघर्ष का नया चरण बताया क्योंकि खाड़ी देश पानी के शुद्धीकरण पर ज्यादा निर्भर हैं. यह घटना क्षेत्रीय जल सुरक्षा को खतरे में डाल रही है, जहां ये संयंत्र लोगों की मूलभूत आवश्यकता को पूरा करते हैं. इसे नुकसान पहुंचने से खाड़ी में पानी का संकट जरूर आएगा.
क्या है पानी के बदले पानी की जंग?
अमेरिकी हमले और ईरानी प्रतिशोध की पृष्ठभूमि ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि केश्म आइलैंड के फ्रेशवॉटर डिसेलिनेशन प्लांट पर हमला एक स्पष्ट और हताश अपराध है, जिसने 30 गांवों की जल आपूर्ति प्रभावित की. अमेरिका ने जिस प्लांट पर हमला किया, यह संयंत्र ईरान के दक्षिणी क्षेत्र में महत्वपूर्ण था, जहां पानी की कमी पहले से ही एक बड़ी समस्या है.
ईरान ने इस हमले को नागरिक सुविधाओं पर आक्रमण बताया और गंभीर परिणामों की चेतावनी दी थी. इसका बदला लेने के लिए ईरान ने बहरीन के जुफायर में अमेरिकी बेस पर मिसाइल हमले किए. फिर उसने बहरीन के जल शुद्धीकरण प्लांट पर ड्रोन हमला किया, जो सीधे पानी को निशाना बनाने का पहला बड़ा मामला है. इससे पहले, ईरान ने दुबई के जबेल अली बंदरगाह और अन्य ऊर्जा सुविधाओं पर हमले किए, जो वॉटर प्लांट के पास थे, लेकिन अब सीधे निशाना बनाना एक नई रणनीति को जन्म देता है, जो और भी ज्यादा घातक है.
जिसका डर था, आखिरकार वही हो गया!
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी हमले ने ईरान को खाड़ी देशों की जल कमजोरियों का फायदा उठाने के लिए प्रेरित किया और अब वही हो रहा है, जिसका डर था. खाड़ी में खाड़ी सहयोग परिषद देश- सऊदी अरब, UAE, कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान है, जो दुनिया के सबसे सूखे क्षेत्रों में हैं, जहां प्राकृतिक जल स्रोत सीमित हैं. ऐसे में ये देश इन प्लांट्स पर काफी निर्भर हैं, जो समुद्री जल को पीने योग्य बनाते हैं.
विश्व में खारे पानी को पीने लायक पानी बनाने की क्षमता का लगभग 60 फीसदी अरब प्रायद्वीप में है और फारस की खाड़ी के आसपास के संयंत्र दुनिया के 30 प्रतिशत डिसेटिलाज्ड वॉटर का उत्पादन करते हैं.
GCC देशों में कुल डिसेलिनेशन प्लांट की संख्या 400 से ज्यादा है, जो मुख्य रूप से फारस की खाड़ी, लाल सागर और अरब सागर के तट पर स्थित हैं. इनकी कुल क्षमता 2022 में 68 मिलियन क्यूबिक मीटर प्रतिदिन थी, जो 2030 तक दोगुनी हो सकती है.
ये आंकड़े दिखाते हैं कि पानी के इन प्लांट्स के बिना ये देश जल संकट में फंस सकते हैं. फिलहाल तो ये सिर्फ एक प्लांट पर हमला है लेकिन अगर ईरान ये हमले वॉटर प्लांट्स को निशाना बनाकर जारी रखता है तो खाड़ी देशों में जल संकट पैदा हो जाएगा. सऊदी अरब के जुबैल और रस अल खैर जैसे संयंत्र दुनिया के सबसे बड़े हैं, जो प्रतिदिन लाखों क्यूबिक मीटर जल उत्पादित करते हैं.
ईरानी हमलों से संभावित नुकसानईरान के हमलों से खाड़ी देशों को भारी क्षति हो सकती है, क्योंकि ये संयंत्र ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों की पहुंच में हैं. अगर एक बड़ा संयंत्र क्षतिग्रस्त होता है, तो शहरों में कुछ दिनों में जल की कमी हो सकती है. लाखों लोग पीने के जल से वंचित हो सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य संकट और पलायन बढ़ेगा. ब्राइन डिस्चार्ज और तेल रिसाव से समुद्री जीवन प्रभावित हो सकता है, जो लंबे समय तक जल उत्पादन को बाधित करेगा. एक्पर्ट्स का कहना है कि यह संघर्ष पानी को सबसे मूल्यवान संसाधन रहा है, कहीं न कहीं तेल से भी ज्यादा कीमती.







