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अनादि समर : छावा के बलिदान से जाग उठा हिन्दू

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
April 13, 2026
in विशेष
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अनादि समर
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lokendra singhडॉ. लोकेन्द्र सिंह


लेखक गिरीश जोशी की पुस्तक ‘अनादि समर’ छत्रपति शंभूराजे की जीवनी मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के उस महत्वपूर्ण कालखंड का विश्लेषण है, जिसे सही ढंग से सामने नहीं लाया गया है। इस पुस्तक की पृष्ठभूमि की जानकारी मुझे ज्ञात है, इसलिए बताना चाहूँगा कि जब सुपरहिट फिल्म ‘छावा’ आई थी, तब छत्रपति शंभूराजे अर्थात् संभाजी महाराज के बारे में जानने की इच्छा लोगों के मन में अत्यंत प्रबल थी। यह एक सहज जिज्ञासा थी कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान के बाद क्या हुआ होगा? क्योंकि फिल्म की पटकथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए छत्रपति शंभूराजे के बलिदान पर खत्म हो जाती है।

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उस समय लेखक गिरीश जोशी जी को यह दायित्व बोध हुआ कि फिल्म जहाँ खत्म होती है, उसके आगे की कहानी वे सुनाएँगे। लोगों को यह अवश्य ही जानना चाहिए कि छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने किस प्रकार हिन्दुत्व की ज्वाला को और तीव्र किया। ‘अनादि समर’ के माध्यम से लेखक गिरीश जोशी ने छत्रपति शंभूराजे के मुगलों के साथ संघर्ष, उनके बलिदान और उस बलिदान के परिणामस्वरूप उपजे ‘लोकयुद्ध’ के वास्तविक इतिहास को सामने लाने का साधु कार्य किया है।

पुस्तक ‘अनादि समर’ की शुरुआत यवन आक्रांताओं, विशेषकर औरंगजेब की क्रूरता और छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा ‘हिंदवी स्वराज्य’ की स्थापना की पृष्ठभूमि से होती है। छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद हिन्दवी स्वराज्य पर पुर्तगालियों, जंजीरा के सिद्दी, अंग्रेजों और मुगलों ने एक साथ नजरें गड़ाईं। ऐसे में हिन्दवी स्वराज्य की बागडोर छत्रपति शंभूराजे ने संभाली। बाहर की टेढ़ी नजरों के साथ-साथ उन्होंने दरबारी षड्यंत्रों का भी डटकर सामना किया।

पुस्तक में जंजीरा किले को जीतने के लिए समुद्र में रास्ता बनाने की योजना और पुर्तगालियों को घुटने टेकने पर मजबूर करने जैसे प्रसंग छत्रपति शंभूराजे के सैन्य कौशल को दर्शाते हैं। लेखक ने स्पष्ट किया है कि संभाजी महाराज केवल एक वीर योद्धा ही नहीं थे, बल्कि 13 भाषाओं के ज्ञाता, उत्कृष्ट विचारक और ‘बुधभूषण’ जैसे संस्कृत ग्रंथ के रचयिता भी थे। अर्थात् लेखक ने छत्रपति शंभूराजे के बहुआयामी व्यक्तित्व को भी सामने लाने का सफल प्रयास किया है।

जिस पराक्रमी योद्धा को आमने-सामने की लड़ाई में परास्त करना संभव नहीं था, उसे पकड़ने के लिए मुगलों ने छल का जाल बिछाया। संगमेश्वर में अपने ही साले गणोजी शिर्के की गद्दारी के कारण छत्रपति शंभूराजे मुगलों की कैद में आ गए। उसके बाद हम सब जानते हैं कि क्रूर औरंगजेब ने इस्लाम कबूलने का दबाव डालने के लिए छत्रपति शंभूराजे को घोर शारीरिक यातनाएँ दीं। उनकी आँखें फोड़ दीं, जीभ खींच ली, जख्मों पर नमक छिड़का; औरंगजेब जितनी क्रूरता दिखा सकता था, उसने दिखाई। इसके बावजूद वह धर्मवीर शंभूराजे को झुका नहीं सका। छत्रपति शंभूराजे ने फाल्गुन अमावस्या (11 मार्च, 1690) को धर्म के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

‘अनादि समर’ इससे आगे की कहानी हमें सुनाती है। अत्याचारी औरंगजेब को लगा था कि इस हत्या से हिन्दू समाज दहल जाएगा, लेकिन इसका उल्टा असर हुआ। छत्रपति शंभूराजे के बलिदान ने प्रत्येक हिन्दू नागरिक को सैनिक बना दिया। राजाराम, महारानी ताराबाई, संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव के नेतृत्व में मुगलों की जो दुर्दशा हुई, उसका वर्णन कम ही किया जाता है। दक्खन जीतने के लिए आया औरंगजेब यहाँ ऐसा उलझा कि वह जिंदा आगरा नहीं लौट सका। मराठा शूरवीरों ने दक्खन में ही उसकी कब्र खोद दी। लेखक गिरीश जोशी ने औरंगजेब की हताश मृत्यु का बहुत सटीक और विस्तृत वर्णन ‘अनादि समर’ में किया है।

लेखक ने ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ वास्तविक इतिहास लिखा है। ऐतिहासिक पत्रों को मूल रूप में शामिल करके पाठकों को उनका विश्लेषण करने का अवसर भी दिया गया है। संकट के समय समर्थ रामदास स्वामी द्वारा छत्रपति शंभूराजे को लिखा गया प्रेरक पत्र (मूल मराठी एवं हिंदी अर्थ सहित) और शंभूराजे द्वारा आमेर के राजा राम सिंह को लिखा गया संस्कृत पत्र, सबको पढ़ना चाहिए। ये पत्र उनके व्यापक दृष्टिकोण और स्वधर्म निष्ठा को उजागर करते हैं। इसके साथ ही, लेखक ने मराठों की युद्धनीति और साहस को वर्तमान संदर्भों से जोड़ते हुए, छत्रपति शिवाजी महाराज और शंभूराजे के पराक्रम की तुलना आधुनिक भारतीय सेना की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की परंपरा से की है।

वामपंथी एवं मुस्लिम इतिहासकारों ने एक बड़ा झूठ यह स्थापित किया कि अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत पर मुस्लिम बादशाह का शासन था। यह बहुत बड़ा झूठ है। यह पुस्तक इस तथ्य को मजबूती से स्थापित करती है कि भारत का शासन अंग्रेजों ने मुगलों से नहीं, बल्कि मराठों से लिया था। स्मरण रहे कि अंग्रेजों ने मराठों के साथ 1818 में तीसरे युद्ध में जीत के साथ भारत पर अपना प्रभाव जमाया था। उस समय कथित मुगल बादशाह तो मराठों का पेंशनभोगी मात्र था। लेखक ने विदेशी यात्रियों (जैसे निकोलाओ मनुची) और मुगल इतिहासकारों (जैसे भीमसेन सक्सेना और साकी मुस्तैद खान) के उद्धरणों का उपयोग करके औरंगजेब की छावनी में फैली भुखमरी, बीमारी और गंदगी का यथार्थवादी चित्रण किया है।

कहना होगा कि लेखक गिरीश जोशी की लेखन शैली अत्यंत प्रवाहपूर्ण, देशभक्तिपूर्ण और ओजस्वी है। वे पाठकों के मन में छत्रपति शंभूराजे के प्रति श्रद्धा और उनके बलिदान के प्रति सम्मान जगाने में पूरी तरह सफल रहे हैं। भाषा का प्रवाह सरल-सहज है, जिससे यह इतिहास आम जनमानस तक आसानी से पहुँच सकता है। ‘अनादि समर’ जैसी पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि किसी राष्ट्र की नींव को मजबूत करने के लिए कैसे एक ‘छावा’ (शेर के बच्चे) को अपना सब कुछ मिटाकर नींव का पत्थर बनना पड़ता है। इतिहास के विद्यार्थियों, युवाओं और राष्ट्रप्रेमियों के लिए यह एक अत्यंत पठनीय और प्रेरणादायक पुस्तक है।

अनादि समर

  • पुस्तक : अनादि समर
  • लेखक : गिरीश अवधूत जोशी
  • प्रकाशक : अर्चना प्रकाशन, भोपाल
  • मूल्य : 80 रुपये

समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

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