नई दिल्ली। अग्नि-5 मिसाइल का यह परीक्षण शुक्रवार (8 मई 2026) को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम आइलैंड से किया गया. रक्षा मंत्रालय के मुताबिक इस टेस्ट के दौरान मिसाइल को कई पेलोड के साथ लॉन्च किया गया और हिंद महासागर क्षेत्र में अलग-अलग जगहों पर मौजूद टारगेट को सफलतापूर्वक निशाना बनाया गया. मंत्रालय ने कहा कि मिशन के सभी लक्ष्य पूरी तरह सफल रहे. मिसाइल की लॉन्च पर लगातार नजर रखने के लिए जमीन और समुद्र में मौजूद कई ट्रैकिंग सिस्टम और टेलीमेट्री स्टेशनों का इस्तेमाल किया गया. इन सिस्टम ने मिसाइल के लॉन्च होने से लेकर लक्ष्य तक पहुंचने की पूरी जानकारी रिकॉर्ड की.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी बधाई
इस सफल परीक्षण के बाद भारत ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वह एक ही मिसाइल से कई ठिकानों पर हमला करने की क्षमता रखता है. हालांकि सरकार की तरफ से यह नहीं बताया गया कि अग्नि-5 का MIRV वर्जन कितने वॉरहेड ले जा सकता है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह चार या पांच वॉरहेड ले जाने में सक्षम हो सकता है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता पर DRDO और सेना को बधाई दी. उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि देश की सुरक्षा तैयारियों को और मजबूत करेगी और बढ़ते खतरों से निपटने में मदद करेगी.
MIRV तकनीक वाली अग्नि-5 मिसाइल
भारत ने पहली बार मार्च 2024 में MIRV तकनीक वाली अग्नि-5 मिसाइल का परीक्षण किया था. उस मिशन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिशन दिव्यास्त्र नाम दिया था. इस तकनीक के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया जिनके पास MIRV मिसाइल सिस्टम है. इस सूची में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन जैसे देश शामिल हैं. अग्नि-5 मिसाइल की रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्यादा है. इसमें तीन चरण वाला सॉलिड फ्यूल इंजन इस्तेमाल किया गया है. MIRV तकनीक वाली मिसाइलें सामान्य मिसाइलों से ज्यादा ताकतवर मानी जाती हैं क्योंकि इनमें एक साथ कई न्यूक्लियर वॉरहेड ले जाने की क्षमता होती है.
DRDO अग्नि मिसाइल के कई दूसरे वर्जन
DRDO ने अग्नि मिसाइल के कई दूसरे वर्जन भी बनाए हैं. इनमें अग्नि-1 की रेंज 700 किलोमीटर, अग्नि-2 की 2,000 किलोमीटर, अग्नि-3 की 3,000 किलोमीटर और अग्नि-4 की 4,000 किलोमीटर है.अग्नि-5 के MIRV सिस्टम में पूरी तरह स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. इसमें भारतीय एवियोनिक्स और हाई एक्यूरेसी सेंसर लगाए गए हैं. खास बात यह है कि 2024 में हुए पहले परीक्षण का नेतृत्व DRDO की एक महिला वैज्ञानिक ने किया था और उस टीम में कई महिला वैज्ञानिक शामिल थीं.
भारत की न्यूक्लियर नीति नो फर्स्ट यूज पर आधारित
भारत की न्यूक्लियर नीति नो फर्स्ट यूज पर आधारित है. इसका मतलब है कि भारत पहले न्यूक्लियर हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर भारत पर न्यूक्लियर हमला होता है तो उसका जवाब बहुत बड़े स्तर पर दिया जाएगा. भारत में न्यूक्लियर हथियारों के इस्तेमाल का फैसला केवल राजनीतिक नेतृत्व ही ले सकता है. प्रधानमंत्री न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी की पॉलिटिकल काउंसिल के प्रमुख होते हैं. भारत के पास जमीन, हवा और समुद्र तीनों रास्तों से न्यूक्लियर हमला करने की क्षमता है.
हाल ही में भारतीय नौसेना ने अपनी तीसरी न्यूक्लियर पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन INS अरिदमन को सेवा में शामिल किया है. इससे भारत की समुद्री सुरक्षा और न्यूक्लियर ताकत और मजबूत हुई है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2025 तक भारत के पास करीब 180 न्यूक्लियर वॉरहेड थे. रिपोर्ट में चीन के पास 600 और पाकिस्तान के पास 170 न्यूक्लियर वॉरहेड होने का अनुमान लगाया गया है.







