नई दिल्ली: ईरान के सर्वोच्च नेता के भारत में प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही के एक बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है. वाराणसी में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने साफ कहा कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं चाहिए, क्योंकि इस्लाम में इसे हराम माना गया है. उनके इस बयान के बाद वैश्विक स्तर पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही बहस के बीच माहौल कुछ नरम होता दिखाई दे रहा है.
डॉ. हकीम इलाही ने कहा कि ईरान ने तीन दशक पहले ही दुनिया के सामने अपना रुख स्पष्ट कर दिया था. उन्होंने कहा कि करीब 30 साल पहले हमने साफ और स्पष्ट रूप से ऐलान किया था कि हम परमाणु हथियार नहीं चाहते. हमारे सर्वोच्च नेता द्वारा जारी फतवे के अनुसार परमाणु हथियार रखना इस्लाम में हराम है. इसलिए हम इन्हें न पहले चाहते थे और न अब चाहते हैं.
संवर्धित यूरेनियम सौंपेगा ईरान
ईरानी प्रतिनिधि का यह बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका, इजरायल और पश्चिमी देशों के साथ लंबे समय से तनाव बना हुआ है. हाल के महीनों में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच कई दौर की बातचीत हुई है, जिसमें परमाणु गतिविधियों को सीमित करने और क्षेत्रीय तनाव कम करने पर चर्चा चल रही है.
इसी बीच न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान अमेरिका के साथ उभरते समझौते के तहत अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम के भंडार को छोड़ने पर सहमत हो गया है. रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि यह यूरेनियम कई परमाणु हथियार बनाने के लिए पर्याप्त हो सकता था. यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो इसे अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को कम करने की दिशा में बड़ी सफलता माना जाएगा.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका ने ईरान को साफ चेतावनी दी थी कि यदि उसने यूरेनियम के मुद्दे पर समझौता नहीं किया, तो सैन्य कार्रवाई फिर से शुरू हो सकती है. हालांकि दोनों देशों के बीच युद्धविराम और तनाव कम करने को लेकर बातचीत भी जारी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी कई बार ईरान के यूरेनियम भंडार को न्यूक्लियर डस्ट बता चुके हैं. ट्रंप का कहना रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना अमेरिका की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है.
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरानी प्रतिनिधि के ताजा बयान से पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की कोशिशों को बल मिल सकता है. साथ ही यह बयान उन देशों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है, जो लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहे हैं. फिलहाल दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ताओं पर टिकी हुई है. यदि दोनों पक्ष किसी स्थायी समझौते पर पहुंचते हैं, तो यह पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.







